श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 22

 
श्लोक
त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहृत्प्रियव-
च्चरति तथोन्मुखे त्वयि हिते प्रिय आत्मनि च ।
न बत रमन्त्यहो असदुपासनयात्महनो
यदनुशया भ्रमन्त्युरुभये कुशरीरभृत: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
त्वत्—तुम; अनुपथम्—सेवा के लिए उपयोगी; कुलायम्—शरीर; इदम्—यह; आत्म—स्वयं; सुहृत्—मित्र; प्रिय—तथा प्रिय; वत्—सदृश; चरति—कार्य करता है; तथा—तो भी; उन्मुखे—उन्मुख; त्वयि—तुममें; हिते—सहायक; प्रिये—प्रिय; आत्मनि—आत्मा; च—तथा; न—नहीं; बत—हाय; रमन्ति—आनन्द लूटते हैं; अहो—ओह; असत्—असत्य की; उपासनया—पूजा द्वारा; आत्म—स्वयं को; हन:—मारना; यत्—जिस (असत्य की पूजा) में; अनुशया:—जिनकी निरन्तर इच्छा है; भ्रमन्ति—घूमते रहते हैं; उरु—अत्यधिक; भये—भयावह (जगत) में; कु—निम्न; शरीर—शरीर; भृत:—धारण किये ।.
 
अनुवाद
 
 जब यह मानवीय शरीर आपकी पूजा के निमित्त काम में लाया जाता है, तो यह आत्मा, मित्र तथा प्रेमी की तरह कार्य करता है। किन्तु दुर्भाग्यवश, यद्यपि आप बद्धजीवों के प्रति सदैव कृपा प्रदर्शित करते हैं और हर तरह से स्नेहपूर्वक सहायता करते हैं और यद्यपि आप उनके असली आत्मा हैं, किन्तु सामान्य लोग आप में आनन्द नहीं लेते। उल्टे वे माया की पूजा करके आध्यात्मिक आत्महत्या करते हैं। हाय! असत्य के प्रति भक्ति करके, वे निरन्तर सफलता की आशा करते हैं, किन्तु वे विविध निम्न शरीर धारण करके इस अत्यन्त भयावह जगत में निरन्तर इधर-उधर भटकते रहते हैं।
 
तात्पर्य
 जो लोग सर्वदयामय भगवान् की सेवा न करके माया में रहते रहना चाहते हैं, उनके लिए वेद बड़े ही कटु शब्दों का प्रयोग करते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् का कथन है (४.३.१५)— आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चन। न तम् विदाथ य इमा जनानान्यद्युष्माकम् अन्तरं बभूव। नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप उक्थशासश्चरन्ति—“हर व्यक्ति उस स्थान को देख सकता है, जहाँ अपने आनन्द हेतु इस जगत में भगवान् ने अपने आपको प्रकट किया, तो भी कोई उन्हें नहीं देख पाता। जिन्होंने इन समस्त जीवों को उत्पन्न किया, उन्हें आप में से कोई नहीं जानता। अतएव तुम्हारी तथा भगवान् की दृष्टि में बहुत बड़ा अन्तर है। माया के कुहासे से आवृत तुम वैदिक अनुष्ठानकर्ता व्यर्थ की बातों में लगे रहते हो और अपनी इन्द्रियों की तुष्टि के लिए ही जीते हो।”
भगवान् इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं, जैसाकि वे भगवद्गीता (९.४) में कहते हैं मया ततं इदं सर्वं जगत्। इस जगत की कोई भी वस्तु, यहाँ तक कि मिट्टी का अत्यन्त तुच्छ पात्र या वस्त्र का टुकड़ा भी उनकी उपस्थिति से रहित नहीं है। चूँकि वे अपने को ईर्ष्यालु आँखों से अदृश्य (अव्यक्तमूर्तिना ) रखते हैं, अतएव भौतिकतावादी उनकी भौतिक शक्ति से गुमराह होकर यह सोचते हैं कि भौतिक सृष्टि का स्रोत परमाणुओं तथा भौतिक शक्तियों का मिश्रण है।

ऐसे मूर्ख भौतिकतावादियों पर अनुग्रह प्रदर्शित करते हुए साक्षात् वेद इस स्तुति में उन्हें जीवन के असली उद्देश्य को स्मरण रखने की सलाह देते हैं यह उद्देश्य है अपने सबसे बड़े हितैषी प्रभु की प्रेमाभक्ति द्वारा सेवा करना। मनुष्य-शरीर आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने के लिए आदर्श सुविधा है इसके अंग—कान, जीभ, आँखें इत्यादि—भगवान् के विषय में श्रवण करने, उनके यश का कीर्तन करने, उनकी पूजा करने तथा अन्य सभी आवश्यक भक्ति-कार्य करने के लिए अतीव उपयुक्त हैं। मनुष्य का भौतिक शरीर कुछ ही समय तक ठीक-ठाक रहने वाला है अतएव इसे कुलायम् कहा गया है—पृथ्वी में विलीन होते हुए (कौलीयते )। तो भी यदि इसे उचित ढंग से उपयोग में लाया जाय, तो यह मनुष्य का श्रेष्ठ मित्र हो सकता है। किन्तु जब मनुष्य भौतिक चेतना में निमग्न रहता है, तो शरीर झूठा मित्र बन जाता है और मोहग्रस्त जीव को अपने असली स्वार्थ से हटा देता है। जो लोग अपने अपने पतियों अथवा पत्नियों, अपनी सन्तानों, पालतू पशुओं इत्यादि के शरीरों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं, वे अपनी भक्ति को माया अर्थात् असद् उपासना की ओर निर्देशित करते हैं। इस तरह से ऐसे लोग आध्यात्मिक आत्महत्या करते हैं, जैसाकि श्रुतियों ने यहाँ पर कहा है। इससे वे मानवीय जीवन के उच्चतर कर्तव्यों का पालन न करने के लिए भावी दण्ड के भागी होते हैं। ईशोपनिषद् (३) में घोषणा की गई है—

असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता:।

तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना: ॥

“आत्मा को मारने वाला चाहे जो भी हो उसे श्रद्धाविहीन (असूर्या) नामक लोक में जाना होगा, जो अंधकार तथा अज्ञान से पूर्ण है।”

जो लोग इन्द्रिय-तृप्ति के प्रति अत्यधिक आसक्त हैं या जो लोग झूठे भौतिकतावादी शास्त्रों तथा दर्शनों के रूप में अस्थायी की पूजा करते हैं, वे उन इच्छाओं को बनाये रखते हैं, जो उन्हें क्रमश: निम्न से निम्नतर शरीरों में ले जाती हैं। चूँकि वे सदा के लिए संसार-चक्र में फँसे रहते हैं, अत: उनके उद्धार की एकमात्र आशा यही है कि भगवद्भक्तों के द्वारा दी गई दयापूर्ण शिक्षाओं को सुनने का अवसर पा सकें।

श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

त्वय्यात्मनि जगन्नाथे मन्मनो रमतामिह।

कदा ममेदृशं जन्म मानुषं सम्भविष्यति ॥

“मुझे कब वह मनुष्य-जन्म प्राप्त होगा, जिसमें मेरा मन परमात्मा एवं जगत के ईश्वर आपमें आनन्द ले सकेगा?”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥