श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 23

 
श्लोक
निभृतमरुन्मनोऽक्षद‍ृढयोगयुजो हृदि य-
न्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययु: स्मरणात् ।
स्‍त्रिय उरगेन्द्रभोगभुजदण्डविषक्तधियो
वयमपि ते समा: समद‍ृशोऽङ्‍‍घ्रिसरोजसुधा: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
निभृत—वशीभूत; मरुत्—श्वास लेते हुए; मन:—मन; अक्ष—तथा इन्द्रियों समेत; दृढ-योग—स्थिर योग में; युज:—लगा हुआ; हृदि—हृदय में; यत्—जो; मुनय:—मुनिगण; उपासते—पूजा करते हैं; तत्—वह; अरय:—शत्रुगण; अपि—भी; ययु:—प्राप्त किया; स्मरणात्—स्मरण करने से; स्त्रिय:—स्त्रियाँ; उरग-इन्द्र—राजसी सर्प के; भोग—शरीर (सदृश); भुज—बाँहें; दण्ड— डंडे जैसी; विषक्त—आसक्त; धिय:—जिनके मन; वयम्—हम; अपि—भी; ते—तुमको; समा:—समान; सम—समान; दृश:—जिनकी दृष्टि; अङ्घ्रि—चरणों के; सरोज—कमलवत्; सुधा:—अमृत (का पान करते हुए) ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के शत्रुओं ने भी, निरन्तर मात्र उनका चिन्तन करते रहने से, उसी परम सत्य को प्राप्त किया, जिसे योगीजन अपने श्वास, अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में करके योग-पूजा में स्थिर कर लेते हैं। इसी तरह हम श्रुतियाँ, जो सामान्यत: आपको सर्वव्यापी देखती हैं, आपके चरणकमलों से वही अमृत प्राप्त कर सकेंगी, जिसका आनन्द आपकी प्रियतमाएँ, आपकी विशाल सर्प सदृश बाहुओं के प्रति अपने प्रेमाकर्षण के कारण लूटती हैं, क्योंकि आप हमें तथा अपनी प्रियतमाओं को एक ही तरह से देखते हैं।
 
तात्पर्य
 आचार्य श्री जीव गोस्वामी के अनुसार कुछ श्रुतियाँ, जैसे कि गोपालतापनी उपनिषद् जो गोप कृष्ण एवं उच्चतम परब्रह्म को एक मानती हैं अभी तक बोलने के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करती रहीं। किन्तु अन्य श्रुतियों को खुलकर भगवान् की प्रशंसा करते सुन कर ये घनिष्ठ श्रुतियाँ अधिक समय तक धैर्य धारण नहीं रख सकीं, अतएव अपनी बारी आये बिना ही इस श्लोक में बोल पड़ीं।
योगमाया के मार्ग के अनुयायी श्वास रोक कर तथा कठिन तपस्या द्वारा अपनी इन्द्रियों तथा मन को वश में करते हैं। यदि वे इस प्रकार से अपने को पूरी तरह शुद्ध बना पाते हैं, तो वे अन्त में अपने हृदय में ब्रह्म के साकार रूप परमात्मा का साक्षात्कार करने लगते हैं। और यदि वे दीर्घकाल तक बिना किसी अवरोध के यह ध्यान चालू रखते हैं, तो अन्त में उन्हें असली ईश-चेतना प्राप्त हो सकती है। किन्तु इस कठिन एवं अनिश्चित विधि से जो लक्ष्य प्राप्त होता है, उसी को उन असुरों ने भी प्राप्त किया, जिन्हें भगवान् कृष्ण ने इस धरा पर अपनी लीलाओं के दौरान मारा था। कंस तथा शिशुपाल जैसे असुरों ने जो कृष्ण के प्रति ईर्ष्या से भरे हुए थे भगवान् द्वारा मात्र वध किये जाने पर शीघ्र मोक्ष प्राप्त किया।

किन्तु साक्षात् वेद अपनी बात बतलाते हुए यहाँ कहते हैं कि वे भगवान् कृष्ण के विश्वस्त भक्तों विशेष रूप से व्रज की युवा गोपियों से भगवान् कृष्ण के प्रति समर्पण का अनुकरण करके भगवत्प्रेम उत्पन्न करना श्रेयस्कर समझेंगे। यद्यपि ये गोपियाँ भगवान् के शारीरिक सौन्दर्य एवं बल से आकृष्ट सामान्य स्त्रियाँ प्रतीत होती थीं, किन्तु ये व्रज की देवियाँ ध्यान की सर्वोच्च पूर्णता प्रदर्शित कर सकीं। श्रुतियाँ उन्हीं की तरह बनना चाहती हैं।

इस सन्दर्भ में ब्रह्माजी निम्नलिखित ऐतिहासिक विवरण सुनाते हैं, जो बृहद्वामन पुराण के पूरक में है—

ब्रह्मानन्दमयो लोको व्यापी वैकुण्ठसंज्ञित:।

तल्लोकवासी तत्रस्थै स्तुतो वेदै परात्पर: ॥

“आध्यात्मिक आनन्द का अनन्त जगत वैकुण्ठ कहलाता है। वहाँ पर परम सत्य साक्षात् वेदों द्वारा प्रशंसित होकर रहते हैं और वहीं वेद भी रहते हैं।”

चिरं स्तुत्वा ततस्तुष्ट: परोक्षं प्राह तान् गिरा।

तुष्टोऽस्मि ब्रूता भो प्राज्ञा वरं यं मनसेप्सितम् ॥

“जब वेद उनकी खूब प्रशंसा कर चुके, तो एक बार भगवान् अपने आप में विशेष रूप से तुष्ट अनुभव करने लगे और उनसे ऐसी वाणी में बोले, जिसका स्रोत अदृश्य बना रहा: “हे मुनियो! मैं तुम सबों से अतीव प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे कोई वर माँगो, जिसे तुम गुप्त रीति से चाहते हो।”

श्रुतय ऊचु: यथा तल्लोकवासिन्य: कामतत्त्वेन गोपिका:।

भजन्ति रमणं मत्वा चिकीर्षाजनि नस्तथा ॥

“श्रुतियों ने उत्तर दिया: हममें मर्त्यलोक की गोपियों जैसा बनने की इच्छा जागृत हुई है, जो काम से प्रोत्साहित होकर प्रेमी के भाव में आपकी पूजा करती हैं।”

श्रीभगवान् उवाच दुर्लभो दुर्घटश्चैव युष्माकं स मनोरथ:।

मयानुमोदित: सम्यक् सत्यो भवितुमर्हति ॥

“तब भगवान् ने कहा: “तुम लोगों की इस इच्छा को पूरा कर पाना कठिन है। प्राय: असम्भव है। लेकिन क्योंकि मैं वर दे रहा हूँ, इसलिए तुम लोगों की यह इच्छा अवश्य पूरी होगी।” आगामिनि विरिञ्चौ तु जाते सृष्ट्यार्थमुदिते।

कल्पं सारस्वतं प्राप्य व्रजे गोप्यो भविष्यथ ॥

“जब अगला ब्रह्मा सृजन-कर्म के अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक पूरा करने के लिए जन्म लेगा और जब उसके जीवन का दिन—सारस्वत कल्प—आयेगा तो तुम लोग व्रज में गोपियों के रूप में उत्पन्न होंगी।”

पृथिव्यां भारते क्षेत्रे माथुरे मम मण्डले ॥

वृन्दावने भविष्यामि प्रेयान् वो रासमण्डले ॥

“पृथ्वी पर भारतभूमि में अपने ही जनपद मथुरा में, वृन्दावन जंगल में, मैं रास-नृत्य के मण्डल में तुम्हारा प्रिय बनूँगा।”

जारधर्मेण सुस्नेहं सुदृढ़ं सर्वतोऽधिकम्।

मयि सम्प्राप्य सर्वेऽपि कृतकृत्या भविष्यथ ॥

“इस तरह तुम मुझे अपने परपति (जार) के रूप में पाकर पुन: मेरा सर्वोच्च एवं दृढ़ विशुद्ध प्रेम प्राप्त कर सकोगी और इस तरह तुम अपनी सारी कामनाएँ पूरी कर सकोगी।”

ब्रह्मोवाच श्रुत्वैतच्चिन्तयन्त्यस्ता रूपं भगवतश्चिरम्।

उक्तकालं समासाद्य गोप्यो भूत्वा हरिं गता: ॥

“ब्रह्मा ने कहा: इन शब्दों को सुनकर श्रुतियाँ दीर्घकाल तक भगवान् के सौन्दर्य का ध्यान करती रहीं। जब अन्तत: नियत समय आया, तो वे सब गोपियाँ बन गईं और उन्होंने कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त किया।”

पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड में भी ऐसा ही विवरण मिलता है, जिसमें बतलाया गया है कि गायत्री मंत्र भी गोपी बन गया।

भक्ति के विकास के सम्बन्ध में भगवान् कृष्ण गोपालतापनी उपनिषद् (उत्तर ४) में इसके आगे कहते हैं—अपूत: पूतो भवति यं मां स्मृत्वा, अव्रती व्रती भवति यं मां स्मृत्वा, निष्काम: सकामो भवति यं मां स्मृत्वा, अश्रोत्री श्रोत्री भवति यं मां स्मृत्वा—“मेरा स्मरण करने से अशुद्ध भी शुद्ध बन जाता है। मेरा स्मरण करने से कोई भी व्रत न लेने वाला व्रतधारी बन जाता है। मेरा स्मरण करने से जो निष्काम है, वह [मेरी सेवा करने की] इच्छा से युक्त (सकाम) हो जाता है। मेरा स्मरण करने से वैदिक मंत्रों का अध्ययन न करने वाला वेदों का निपुण ज्ञाता बन जाता है।”

बृहदारण्यक उपनिषद् (४.५.६) में कृष्णभावनाभावित होने के क्रमिक पदों का वर्णन हुआ है— आत्मा वा अरे दृष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य:—आत्मा का ही प्रेक्षण, श्रवण, चिंतन तथा स्थिर चित्त से ध्यान किया जाना चाहिए। भाव यह है कि मनुष्य को चाहिए कि परमात्मा को निम्नलिखित विधियों से अपने पूर्ण व्यक्तित्व में सीधे दृश्य मान कर साक्षात् करे: सर्वप्रथम परमात्मा के किसी योग्य प्रतिनिधि से उपदेश सुने और ऐसे गुरु की विनम्र सेवा करते हुए तथा सभी प्रकार से उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हुए उसके वचनों को हृदयंगम करे। फिर अपने संशयों तथा भ्रान्तियों को दूर करने के उद्देश्य से गुरु के दिव्य संदेश पर निरन्तर मनन करे। तभी वह पूरे संकल्प एवं दृढ़ विश्वास के साथ भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करना प्रारम्भ कर सकता है।

तथाकथित ज्ञानी यह सोच सकते हैं कि उपनिषदों में ब्रह्म की निर्विशेष अनुभूति को सविशेष पूजा से अधिक पूर्ण तथा अन्तिम मान कर प्रशंसा की गई है। किन्तु सारे निष्ठावान वैष्णव परमेश्वर की भक्ति में लगे रहते हैं और उनके अत्यन्त अद्भुत विविध गुणों का आनन्दपूर्वक ध्यान करते हैं। श्रुति मंत्रों के अनुसार—यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्—परमात्मा जिस व्यक्ति को चुनता है, उसे वह उपलब्ध हो जाता है। उसे ही परमात्मा अपना साकार रूप प्रकट करता है। (कठ उपनिषद् १.२.२३ तथा मुण्डक उपनिषद् ३.२.३) श्रील श्रीधर स्वामी निम्नलिखित स्तुति से टीका समाप्त करते हैं—

चरणस्मरणं प्रेम्णा तव देव सुदुर्लभम्।

यथा कथञ्चिद् नृहरे मम भूयाद् अहर्निशम् ॥

“हे प्रभु! आपके चरणकमलों का प्रेमपूर्ण स्मरण बड़ी मुश्किल से हो पाता है। हे नरहरि! आप ऐसा करें कि रात-दिन मैं उनका स्मरण कर सकूँ।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥