श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 24

 
श्लोक
क इह नु वेद बतावरजन्मलयोऽग्रसरं
यत उदगाद‍ृषिर्यमनु देवगणा उभये ।
तर्हि न सन्न चासदुभयं न च कालजव:
किमपि न तत्र शास्‍त्रमवकृष्य शयीत यदा ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
क:—कौन; इह—इस संसार में; नु—निस्सन्देह; वेद—जानता है; बत—ओह; अवर—अर्वाचीन; जन्म—जिसका जन्म; लय:—तथा संहार; अग्र-सरम्—पहले आया हुआ; यत:—जिससे; उदगात्—उत्पन्न हुआ; ऋषि:—ऋषि, ब्रह्मा; यम् अनु— जिसके (ब्रह्मा के) पीछे पीछे; देव-गणा:—देवताओं का समूह; उभये—दोनों (जो इन्द्रियों को वश में रखते हैं और जो स्वर्गलोक के भी ऊपर वाले क्षेत्रों में रहते हैं); तर्हि—उस समय; न—नहीं; सत्—स्थूल पदार्थ; न—नहीं; च—भी; असत्— सूक्ष्म पदार्थ; उभयम्—जो दोनों से युक्त है (अर्थात् भौतिक शरीर); न च—न तो; काल—समय का; जव:—प्रवाह; किम् अपि न—किसी भी तरह से नहीं; तत्र—वहाँ; शास्त्रम्—शास्त्र को; अवकृष्य—निकाल कर के; शयीत—(भगवान्) सो जाता है; यदा—जब ।.
 
अनुवाद
 
 इस जगत का हर व्यक्ति हाल ही में उत्पन्न हुआ है और शीघ्र ही मर जायेगा। अतएव यहाँ का कोई भी व्यक्ति, उसे कैसे जान सकता है, जो हर वस्तु के पूर्व से विद्यमान है और जिसने प्रथम विद्वान ऋषि ब्रह्मा को और उसके बाद के छोटे तथा बड़े देवताओं को जन्म दिया है? जब वह लेट जाता है और हर वस्तु को अपने भीतर समेट लेता है, तो कुछ भी नहीं बचता—न तो स्थूल या सूक्ष्म पदार्थ, न ही इनसे बने शरीर, न ही काल की शक्ति और न शास्त्र।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर श्रुतियाँ परम पुरुष को जानने की कठिनाई बतलाती हैं। साक्षात् वेदों द्वारा इन श्लोकों में भक्तियोग का जैसा वर्णन हुआ है, वह भगवान् को जानने तथा मोक्ष पाने का सबसे सुगम तथा निश्चित मार्ग है। इसकी तुलना में ज्ञानयोग अत्यन्त कठिन है, यद्यपि यह भौतिक जीवन से ऊबे हुओं को, जो अब भी भगवान् की शरण में नहीं जाना चाहते, प्रिय है। जब तक जीव भगवान् की सर्वश्रेष्ठता से ईर्ष्या रखता है, तब तक भगवान् उसे दर्शन नहीं देते। जैसाकि भगवद्गीता (९.२५) में भगवान् ने कहा है—
नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत:।

मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥

“मैं मूर्ख तथा अज्ञानी के सामने कभी प्रकट नहीं होता। उनके लिए मैं अपनी अन्तरंगा शक्ति से ढका रहता हूँ, इसलिए वे यह नहीं जानते कि मैं अजन्मा तथा अच्युत हूँ।” ब्रह्मा के शब्दों में (ब्रह्मसंहिता ५.३४)—

पन्थास्तु कोटिशतवत्सरसम्प्रगम्यो वायोरथापि मनसो मुनिपुंगवानाम्।

सोऽप्यस्ति यत्प्रपदसिम्न्यविचिन्त्यतत्त्वे गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

“मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, जिनके चरणकमलों के अँगूठे के छोर तक ही वे योगीजन पहुँच पाते हैं, जो ब्रह्म की कामना करते हैं और श्वास खींचकर प्राणायाम करते हैं या वे ज्ञानीजन जो करोड़ों वर्षों तक संसार का निषेध करके विभेद रहित ब्रह्म की खोज में लगे रहते हैं।”

इस ब्रह्माण्ड के प्रथम जन्मा जीव ब्रह्मा प्रथम ऋषि भी हैं। उनका जन्म नारायण से हुआ है और उनसे उत्पन्न हैं तमाम देवता, जिनमें पृथ्वी के कार्यों के नियन्ता तथा स्वर्ग के शासक भी सम्मिलित हैं। ये सारे शक्तिमान तथा बुद्धिमान जीव भगवान् की सर्जक शक्ति के अर्वाचीन उत्पाद हैं। ब्रह्मा ही वेदों के पहले वक्ता हैं, अतएव उन्हें वेदों का तात्पर्य जानना चाहिए, कम-से-कम इतना जितना और कोई अधिकारी जानता है, किन्तु वे भी भगवान् को थोड़ा ही समझते हैं। श्रीमद्भागवत (१.३.३५) में कहा गया है—वेद गुह्यानि हृत्पते:—हृदय का स्वामी वैदिक ध्वनि की गुप्त कन्दराओं की गहराई में अपने को छिपा लेता है। यदि ब्रह्मा तथा उनसे उत्पन्न देवता उन परमेश्वर को आसानी से नहीं जान पाते, तो भला मर्त्य प्राणी किस तरह उनके स्वतंत्र ज्ञान की खोज में सफल होने की आशा कर सकते हैं? जब तक यह सृष्टि चलती है जीवों को ज्ञान के मार्ग में अनेक बाधाएँ आती हैं। चूँकि वे अपने को शरीर, मन तथा अहंकार से निर्मित भौतिक आवरण मान बैठते हैं, इसलिए उनमें नाना प्रकार के पूर्वाग्रह तथा भ्रान्तियाँ जन्म लेती हैं। चाहे शास्त्र ही उनका मार्गदर्शन क्यों न करें और कर्म, ज्ञान तथा योग की संस्तुत विधियों को अपनाने का उन्हें अवसर क्यों न दिया जाय, बद्धजीवों में ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त कर सकने की तनिक भी क्षमता नहीं होती। जब प्रलय का समय आता है, तो वैदिक शास्त्र तथा उनके विधि-विधान सब लुप्त हो जाते हैं और निष्क्रिय जीव नितान्त अंधकार में रह जाता है। इसलिए भक्ति से रहित ज्ञान के लिए व्यर्थ प्रयास करना छोड़ कर हमें ब्रह्मा का उपदेश मानकर अपने को भगवान् की कृपा पर छोड़ देना चाहिए।

ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्।

स्थाने स्थिता: श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि: ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ॥

“जो लोग अपने प्रतिष्ठित सामाजिक पदों पर बने रहते हुए भी अनुमानित ज्ञान की विधि का बहिष्कार कर देते हैं और मनसा वाचा कर्मणा आपके तथा आपके कार्यों के विवरणों का आदर करते हैं और इन कथाओं में जो कि आपके द्वारा तथा आपके शुद्ध भक्तों द्वारा उच्चारित होती हैं अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे अवश्य ही आपको जीत लेते हैं, यद्यपि आप तीनों लोकों में किसी के द्वारा जीते नहीं जा सकते (भागवत १०.१४.३)।

इस सन्दर्भ में तैत्तिरीय उपनिषद् का ब्रह्म विषयक उल्लेख (२.४.१) है—यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह—जहाँ शब्द नहीं रहते तथा जहाँ मन नहीं पहुँचता। ईशोपनिषद् (४) का कथन है—

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैतद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्शत्।

तद्धावतोऽन्यान् अत्येति तिष्ठत् तस्मिन् अपो मातरिष्वा दधाति ॥

“अपने धाम में स्थिर रहने पर भी भगवान् मन से भी अधिक तेज हैं और अन्य सारे धावकों को पछाड़ सकते हैं। शक्तिशाली देवता उनके पास फटक नहीं सकते। एक स्थान पर रहते हुए भी वे वर्षा तथा वायु की पूर्ति करने वालों को नियंत्रित करते हैं। वे श्रेष्ठता में सबसे बढक़र हैं।” ऋग्वेद (३.५४.५) में यह मंत्र आता है—

कोऽद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आयाता: कुत इयं विसृष्टि:।

अर्वाग् देवा विसर्जनेना था को वेद यत आ बभूव ॥

“इस जगत में ऐसा कौन है, जो वास्तव में जानता है और यह बतला सकता है कि यह सृष्टि कहाँ से आई? सारे देवता सृष्टि से छोटे हैं। तब कौन बतला सकता है कि यह जगत कहाँ से आया?” श्रील श्रीधर स्वामी इस प्रकार प्रार्थना करते हैं—

क्वाहं बुद्ध्यादिसंरुद्ध: क्व च भूमन्महस्तव।

दीनबन्धो दयासिन्धो भक्तिं मे नृहरे दिश ॥

“मैं क्या हूँ—सांसारिक बुद्धि इत्यादि के भौतिक आवरणों से बँधा-जीव? हे सर्वशक्तिमान! आपकी महिमा से इसकी क्या तुलना है? हे पतितों के मित्र, हे दया के सागर! भगवान् नरहरि! आप मुझे अपनी भक्ति का वर दें।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥