श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 25

 
श्लोक
जनिमसत: सतो मृतिमुतात्मनि ये च भिदां
विपणमृतं स्मरन्त्युपदिशन्ति त आरुपितै: ।
त्रिगुणमय: पुमानिति भिदा यदबोधकृता
त्वयि न तत: परत्र स भवेदवबोधरसे ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
जनिम्—सृष्टि; असत:—(अणुओं से बने) दृश्य जगत के; सत:—शाश्वत; मृतिम्—संहार; उत—भी; आत्मनि—आत्मा में; ये—जो; च—तथा; भिदाम्—द्वैत; विपणम्—सांसारिक व्यापार; ऋतम्—असली; स्मरन्ति—घोषित करते हैं; उपदिशन्ति— शिक्षा देते हैं; ते—वे; आरुपितै:—सत्य पर चढ़ाया गया मोह; त्रि—तीन; गुण—गुणों से; मय:—निर्मित; पुमान्—जीव; इति—इस प्रकार; भिदा—द्वैत की धारणा; यत्—जो; अबोध—अज्ञान से; कृता—उत्पन्न; त्वयि—तुममें; न—नहीं; तत:— उससे; परत्र—परे; स:—वह (अज्ञान); भवेत्—रह सकता है; अवबोध—पूर्ण चेतना; रसे—संरचना में ।.
 
अनुवाद
 
 माने हुए विद्वान जो यह घोषित करते हैं कि पदार्थ ही जगत का उद्गम है, कि आत्मा के स्थायी गुणों को नष्ट किया जा सकता है, कि आत्मा तथा पदार्थ के पृथक् पक्षों से मिलकर आत्मा बना है या कि भौतिक व्यापारों से सच्चाई बनी हुई है—ऐसे विद्वान उन भ्रान्त विचारों पर अपनी शिक्षाओं को आधारित करते हैं, जो सत्य को छिपाते हैं। यह द्वेत धारणा कि जीव प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न है, अज्ञानजन्य मात्र है। ऐसी धारणा का आपमें कोई आधार नहीं है, क्योंकि आप समस्त भ्रम (मोह) से परे हैं और पूर्ण चेतना का भोग करने वाले हैं।
 
तात्पर्य
 परम पुरुष की वास्तविक स्थिति अत्यन्त रहस्यमय है और उसी तरह जीवात्मा की अधीनावस्था भी। अधिकांश विचारक इन सच्चाइयों के विषय में किसी न किसी हद तक भ्रमित हैं, क्योंकि आत्मा को आच्छादित करने वाली अनेक मिथ्या उपाधियाँ हैं, जो भ्रम उत्पन्न कर सकती हैं। मूर्ख बद्धजीव इन भ्रमों को तो स्वीकार करते ही हैं, लेकिन बड़े बड़े दार्शनिकों तथा योगियों तक की बुद्धि को माया की भ्रामक शक्ति उलट सकती है। इसलिए सत्य के मूल सिद्धान्तों को प्रतिपादित करने वाले अनेक परस्पर विरोधी सिद्धान्त हैं।
परम्परागत भारतीय दर्शन में वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग तथा मीमांसा दर्शनों के अनुयायी अपने-अपने भ्रान्तिमूलक विचार रखते हैं, जिसकी ओर साक्षात् वेद इस स्तुति में इंगित कर रहे हैं। वैशेषिकजन कहते हैं कि इस दृश्य ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति परमाणुओं की मूलराशि से हुई (जनिम् असत:)। जैसाकि कणाद ऋषि के वैशेषिक सूत्रों (७.१.२०) में कहा गया है नित्यं परिमण्डलम्प परमाणु जो सबसे लघु आकार का है, नित्य है। कणाद तथा उनके अनुयायी अन्य अ-परमाणुक जीवों के लिए, जिनमें वे आत्माएँ सम्मिलित हैं, जो देहधारी बन जाती हैं, यहाँ तक कि परमात्मा तक के लिए नित्यता की कल्पना करते हैं। लेकिन वैशेषिक दर्शन में आत्माएँ तथा परमात्मा ब्रह्माण्ड की परमाणु रचना में प्रतीकात्मक भूमिका निभाते हैं। श्रील कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस मत की आलोचना अपने वेदान्त सूत्र (२.२.१२) में की है उभयथापि न कर्मातस्तदभाव:। इस सूत्र के अनुसार कोई यह दावा नहीं कर सकता कि सृष्टि के समय परमाणु पहले परस्पर संयोग करते हैं, क्योंकि वे उन्हीं में संलग्न किसी कर्म स्पन्दन से प्रेरित होते हैं। किन्तु संयोग करने के पूर्व परमाणुओं की आदि अवस्था में कोई ऐसा नैतिक उत्तरदायित्व नहीं होता, जिससे वे पाप तथा पुण्य अर्जित कर सकें। न ही परमाणुओं के आदि संयोग की विवेचना जीवों के शेष कर्म के प्रतिफल के रूप में की जा सकती है, क्योंकि ये प्रतिफल जीव के अपने होते हैं और वे एक जीव से दूसरे में स्थानान्तरित नहीं हो सकते, तो फिर निष्क्रिय परमाणुओं का तो कहना ही क्या।

विकल्प के रूप में जनिम् असत: से पतञ्जलि ऋषि के योगदर्शन का भाव लिया जा सकता है, क्योंकि उनके योगसूत्र में शिक्षा दी गई है कि किस तरह कोई आसन तथा ध्यान की यांत्रिक विधि से ब्रह्मत्व प्राप्त कर सकता है। पतञ्जलि की योग विधि को यहाँ असत् कहा गया है क्योंकि इसमें भक्ति के अनिवार्य पक्ष—परम पुरुष के प्रति आत्मसमर्पण—की अवहेलना की गई है। जैसाकि भगवान् कृष्ण ने भगवद्गीता (१७.२८) में कहा है—

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।

असदित्युच्यते पार्थ न च तत् प्रेत्य नो इह ॥

“हे पृथा-पुत्र! यज्ञ, दान या तप के रूप में श्रद्धा के बिना की गई कोई भी वस्तु अस्थायी है। वह असत् कहलाती है और इस जीवन में तथा अगले जीवन दोनों के लिए व्यर्थ होती है।” योगसूत्र प्रकारान्तर से भगवान् को केवल सहायक के रूप में स्वीकार करता है, जिसका उपयोग बढ़े-चढ़े योगी कर सकते हैं। ईश्वरप्रणिधानाद् वा—ईश्वर का भक्तिमय-ध्यान एकाग्रता पाने का एक अन्य साधन है। (योगसूत्र १.२३) इसके विपरीत बादरायण वेदव्यास के वेदान्त दर्शन में भक्ति को न केवल मोक्ष का मूल साधन माना गया है, अपितु मोक्ष से अभिन्न माना गया है। आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्—भगवान् की पूजा मोक्ष प्राप्त होने तक चलती रहती है और जैसाकि वेद बतलाते हैं मुक्तावस्था में भी चालू रहती है। (वेदान्त सूत्र ४.१.१२) गौतम ऋषि ने न्यायसूत्र में प्रस्तावित किया है कि मोह तथा दुख का निषेध करके मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है—दु:खजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानाम् उत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावाद् अपवर्ग:— मिथ्या धारणा, बुरा चरित्र, बन्धनकारी कर्म, पुनर्जन्म तथा दुख को क्रमश: दूर करने से ही अन्तिम मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है (न्यायसूत्र १.१.२)। क्योंकि एक के मिट जाने से दूसरा मिटने लगता है, लेकिन न्याय दर्शनवेत्ताओं का विश्वास है कि चेतना आत्मा का अनिवार्य गुण नहीं है इसलिए वे शिक्षा देते हैं कि मुक्तात्मा में कोई चेतना नहीं रहती। इस तरह मुक्ति का न्याय विचार आत्मा को मृत पत्थर की अवस्था में रखता है। न्याय दर्शनवेत्ताओं द्वारा आत्मा की आन्तरिक चेतना को मारने के प्रयास को ही यहाँ पर साक्षात् वेदों द्वारा सतो मृतिम् कहा गया है। लेकिन वेदान्त सूत्र (२.३.१७) एकस्वर से कहता है ज्ञोऽत एव—जीवात्मा सदैव ज्ञाता है।

यद्यपि आत्मा चेतन तथा सक्रिय दोनों है, किन्तु सांख्य दर्शन के समर्थक जीवनी शक्ति के इन दोनों कार्यों को गलती से पृथक् करते हैं (आत्मनि ये च भिदाम् ) और चेतना को आत्मा (पुरुष ) से तथा सक्रियता को प्रकृति से जोड़ते हैं। सांख्य कारिका के अनुसार (१९-२०)—

तस्माच्च विपर्यासात् सिद्धं साक्षित्वं पुरुषस्य।

कैवल्यं माध्यस्थ्यं द्रष्टृत्वम् अकर्तृभावश्च ॥

“इस प्रकार पुरुषों के मध्य जो अन्तर है, वह ऊपरी है (प्रकृति के गुणों द्वारा आवृत होने से), पुरुष की असली स्थिति साक्षी की है, जो पृथकत्व, अन्यमनस्कता, साक्षी होने के पद तथा उसकी निष्क्रियता से लक्षित है।”

तस्मात् तत्संयोगाद् अचेतनं चेतनावद् इव लिंगम्।

गुणकर्तृत्वेऽपि तथा कर्तेव भवत्युदासीन: ॥

“इस तरह आत्मा के संसर्ग से अचेतन सूक्ष्मजीव चेतन जान पड़ता है। जबकि आत्मा कर्ता प्रतीत होता है, यद्यपि वह प्रकृति के गुणों की सक्रियता से पृथक् है।“ श्रील व्यासदेव ने वेदान्त सूत्र (२.३.३१-३९) के एक अनुभाग में जो कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् से प्रारम्भ होता है, इस विचार का खण्डन किया है “जीवात्मा को कर्मों का कर्ता होना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों के आदेशों का कुछ प्रयोजन होता है।” आचार्य बलदेव विद्याभूषण ने गोविन्दभाष्य में बतलाया है कि “जीव कर्ता है न कि प्रकृति के गुण। क्यों? क्योंकि शास्त्रों के आदेशों का कुछ प्रयोजन होना चाहिए (शास्त्रार्थवत्त्वात् )। उदाहरणार्थ ऐसा शास्त्रीय आदेश कि स्वर्गकामो यजेत (स्वर्ग की कामना रखने वाले को यज्ञ करना चाहिए) तथा आत्मानम् एव लोकम् उपासीत (बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१५) (वैकुण्ठ प्राप्ति के उद्देश्य से पूजा करनी चाहिए) तभी सार्थक हैं, जब किसी चेतन कर्ता का अस्तित्व हो। यदि प्रकृति के गुण कर्ता हों, तो ऐसे कथनों से कोई काम नहीं सरेगा। शास्त्रीय आदेश जीव को नियत कर्मों को करने में इसीलिए लगाते हैं, जिससे उसे कुछ भोगने योग्य फल मिलें। अचेतन गुण में ऐसी प्रवृत्ति को जागृत नहीं किया जा सकता।”

जैमिनि ऋषि ने पूर्वमीमांसा सूत्र में भौतिक कर्म तथा उसके फल को सत्य रूप में (विपणम् ऋतम् ) प्रस्तुत किया है। वे तथा कर्म मीमांसा के अनेक धुरंधर यह शिक्षा देते हैं कि यह जगत असीम है और कोई मुक्ति नहीं है। उनके लिए कर्म चक्र शाश्वत है और अधिक से अधिक यह लक्ष्य बनाया जा सकता है कि देवताओं के बीच जन्म हो। अतएव वे यही कहते हैं कि वेदों का सारा उद्देश्य मनुष्यों को सद्कर्म उत्पन्न करने के लिए विधि-विधानों में लगाना है। इस तरह परिपक्व आत्मा का मुख्य कर्तव्य वेदों के यज्ञ विषयक आदेशों के सही अर्थ को समझना और उन्हें सम्पन्न करना है। चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म:—कर्तव्य वह है, जो वेदों के आदेशों द्वारा सूचित होता है। (पूर्वमीमांसा सूत्र १.१.२) किन्तु वेदान्त सूत्र के चतुर्थ अध्याय में, जिसमें जीवन के चरम लक्ष्य का वर्णन हुआ है, जन्म तथा मृत्यु से मोक्ष प्राप्त करने की आत्मा की क्षमता का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें यज्ञ के विधि विधानों को आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता में सहायता देने के अधीन माना गया है। जैसाकि वेदान्त सूत्र (४.१.१६) में कहा गया है अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद् दर्शनात् अग्निहोत्र तथा अन्य वैदिक यज्ञ ज्ञान उत्पन्न करने के निमित्त हैं, जैसाकि वेदों के कथन से दर्शित होता है। वेदान्त सूत्र (४.४.२२) के अन्तिम शब्दों में भी यही घोषणा है कि अनावृत्ति: शब्दात्—जैसाकि शास्त्र वचन देते हैं, मुक्तात्मा कभी इस जगत में वापस नहीं आता।

इस तरह अनुमान पर आधारित ज्ञानियों के भ्रमकारी निष्कर्ष सिद्ध करते हैं कि बड़े-बड़े विद्वान तथा मुनिजन भी प्राय: अपनी ईश्वरप्रदत्त बुद्धि के दुष्प्रयोग से मोहग्रस्त हो जाते हैं। कठ उपनिषद् का कथन है (१.२.५)—

अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमाना: स्वयं धीरा: पण्डितम्मन्यमाना:।

जंघन्यमाना: परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा: ॥

“अज्ञान के चंगुल में पड़ कर तथाकथित विशिष्टजन अपने आपको विद्वान मान लेते हैं। वे इस संसार में मूर्ख बनकर उसी तरह घूमते हैं, जैसे कि किसी एक अन्धे के द्वारा ले जाया जाने वाला अन्य अंधा।”

सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा तथा वेदान्त इन छ: परंपरागत वैदिक दर्शनों में से केवल बादरायण व्यास कृत वेदान्त ही त्रुटिरहित है और वह भी जब उसकी व्याख्या प्रामाणिक वैष्णव आचार्यों द्वारा हुई हो। तो भी इन छहों मतों में से हर एक का वैदिक शिक्षा के विषय में कुछ न कुछ योगदान है। नास्तिक सांख्य प्राकृतिक तत्त्वों का विकास सूक्ष्म तत्त्वों से स्थूल की ओर बतलाता है, पतञ्जलि का योग ध्यान की आठ विधियों का वर्णन करता है, न्याय तर्क की विधियाँ प्रस्तुत करता है, वैशेषिक सत्य की मूलभूत आध्यात्मिक कोटियों पर विचार करता है और मीमांसा शास्त्रों की व्याख्या के मानक उपकरण जुटाता है। इस छहों के अतिरिक्त भी बौद्ध, जैन तथा चार्वाक दर्शन हैं, जिनके शून्यवाद तथा भौतिकतावाद नित्य आत्मा की आध्यात्मिकता से इनकार करते हैं।

अन्ततोगत्वा केवल ईश्वर ही ज्ञान के विश्वसनीय स्रोत बचते हैं। भगवान् अवबोध-रस—अबाध दृष्टि के असीम आगार हैं। जो दृढ़ संकल्प के साथ उन पर निर्भर रहते हैं, उन्हें वे ज्ञान का दिव्य चक्षु प्रदान करते हैं। अन्य लोग जो अपने अपने सिद्धान्तों में लगे रहते हैं, उन्हें माया के धुंधले पर्दे से होकर सत्य को खोजना पड़ता है।

श्रील श्रीधर स्वामी स्तुति करते हैं—

मिथ्या तर्क सुकर्कशेरितमहा वादान्धकारान्तर भ्राम्यन्मन्दमतेरमन्दमहिमंस्त्वद्ज्ञानवर्त्मास्फुटम् ।

श्रीमन्माधव वामन त्रिनयन श्रीशंकर श्रीपते गोविन्देति मुदा वदन् मधुपते मुक्त: कदा स्यामहम् ॥

“मिथ्या तर्क की कटु विधियों द्वारा पल्लवित उन उच्च दर्शनों के अंधकार में घूमने वाली मोहग्रस्त आत्मा के लिए, हे दिव्य यश के स्वामी! आपका असली ज्ञान अलक्षित रहता है। हे मधुपति, लक्ष्मीपति! मैं माधव, वामन, त्रिनयन, श्रीशंकर, श्रीपति तथा गोविन्द आदि आपके नामों का प्रसन्नतापूर्वक उच्चारण करते हुए कब मुक्ति प्राप्त करूँगा?

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥