श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 26

 
श्लोक
सदिव मनस्‍त्रिवृत्त्वयि विभात्यसदामनुजात्
सदभिमृशन्त्यशेषमिदमात्मतयात्मविद: ।
न हि विकृतिं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतया
स्वकृतमनुप्रविष्टमिदमात्मतयावसितम् ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
सत्—सत्य; इव—मानो; मन:—मन (तथा इसके प्राकट्य); त्रि-वृत्—तीन (प्रकृति के गुण); त्वयि—तुममें; विभाति— प्रकट होता है; असत्—असत्य; आ-मनुजात्—मनुष्यों तक; सत्—सत्य स्वरूप; अभिमृशन्ति—वे मानते हैं; अशेषम्—सम्पूर्ण; इदम्—इस (जगत) को; आत्मतया—आत्मा से अभिन्न रूप में; आत्म-विद:—आत्मा को जानने वाले; न—नहीं; हि— निस्सन्देह; विकृतिम्—विकारों को; त्यजन्ति—परित्याग कर देते हैं; कनकस्य—स्वर्ण का; तत्-आत्मतया—जितना कि वे इससे अभिन्न हैं; स्व—अपने द्वारा; कृतम्—उत्पन्न; अनुप्रविष्टम्—तथा प्रविष्ट हुए; इदम्—इस; आत्मतया—अपने से अभिन्न; अवसितम्—सुनिश्चित ।.
 
अनुवाद
 
 इस जगत में सारी वस्तुएँ—सरलतम घटना से लेकर जटिल मानव-शरीर तक—प्रकृति के तीन गुणों से बनी हैं। यद्यपि ये घटनाएँ सत्य प्रतीत होती हैं, किन्तु वे आध्यात्मिक सत्य की मिथ्या प्रतिबिम्ब होती हैं, वे आप पर मन के अध्यारोपण हैं। फिर भी जो लोग परमात्मा को जानते हैं, वे सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि को सत्य तथा साथ ही साथ आपसे अभिन्न मानते हैं। जिस तरह स्वर्ण की बनी वस्तुओं को, इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे असली सोने की बनी हैं, उसी तरह यह जगत उन भगवान् से अभिन्न है, जिसने इसे बनाया और फिर वे उसमें प्रविष्ट हो गये।
 
तात्पर्य
 एक दृष्टि से दृश्य जगत सत्य (सत् ) है और दूसरे वह नहीं (असत् ) भी है। इस ब्रह्माण्ड का सार-तत्त्व यथार्थ है, क्योंकि वह भगवान् की बहिरंगा शक्ति है, किन्तु माया इस वस्तु को जो-जो स्वरूप धारण कराती है केवल वे नश्वर हैं। चूँकि ये स्वभौतिक स्वरूप क्षणिक (नाशवान्) हैं अतएव जो उन्हें स्थायी मानते हैं, वे भ्रम में हैं। किन्तु निर्विशेषवादी पंडित सत् तथा असत् के विभाजन की गलत व्याख्या करते हैं, वे सामान्य सच्चाई की अवहेलना करते हुए यह घोषित करते हैं कि न केवल भौतिक स्वरूप अपितु भौतिक वस्तु भी असत्य है और वे अपनी आत्मा को परम पूर्ण होने की गलती कर बैठते हैं। पिछली स्तुति में साक्षात् वेदों द्वारा कहे गये इन शब्दों त्रिगुणमय: पुमानिति भिदा को मायावादी दार्शनिक परमात्मा तथा जीवात्मा का अन्तर नहीं मानते। वे यह कहेंगे कि जीव का भौतिक स्वरूप तीन गुणों का क्षणिक प्रदर्शन है, अतएव जब ज्ञान द्वारा जीव का अज्ञान नष्ट हो जाता है, तो वह परमात्मा बन जाता है। बन्धन, मुक्ति तथा दृश्य जगत अज्ञान की ही असत्य सृष्टियाँ हैं। ऐसे विचारों के उत्तर स्वरूप वेद यहाँ पर सत् तथा असत् के वास्तविक सम्बन्ध को स्पष्ट करते हैं।
श्रुतियों में हमें यह कथन मिलता है असतोऽधिमनोऽसृज्यत, मन: प्रजापतिम् असृजत्, प्रजापति: प्रजा असृजत्, तद्वा इदं मनस्येव परमं प्रतिष्ठितं यदिदं किं च प्रारम्भ में परम मन की सृष्टि असत् से हुई। इस मन से प्रजापति की और प्रजापति से सारे जीवों की सृष्टि हुई। इस तरह इस जगत में विद्यमान सारी वस्तुओं की चरम नींव एकमात्र मन है। यद्यपि निर्विशेषवादी इसका यह अर्थ लगा सकते हैं कि सारा दृश्य जगत मोह की असत्यता (असत्) पर आधारित है, जबकि यहाँ पर असत् शब्द का वास्तविक अर्थ मूल कारण, परमेश्वर है, क्योंकि वे भौतिक जगत से परे (सत्) हैं। वेदान्त सूत्र का तर्क (२.१.१७) इस व्याख्या की पुष्टि करता है और निर्विशेषवादियों की गलत व्याख्या को नहीं मानता असद् व्यपदेशान् नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात्यदि किसी को यह आपत्ति है कि यह भौतिक जगत तथा इसका स्रोत एक ही वस्तु नहीं हो सकते, क्योंकि जगत को असत् कहा गया है, तो हमारा उत्तर होगा, “नहीं! क्योंकि यह कथन कि ब्रह्म असत् है, उनके गुण सृष्टि से भिन्न होने के कारण सार्थक है।” इस प्रकार तैत्तिरीय उपनिषद् (२.७.१) में कहा गया है असद् वा इदमग्र आसीत् इस सृष्टि के प्रारम्भ में केवल असत् विद्यमान था।

श्रील जीव गोस्वामी के मतानुसार उपर्युक्त अंश में आया हुआ अधिमन: शब्द ब्रह्माण्ड के संयुक्त मन के शासक, भगवान् अनिरुद्ध का द्योतक है, जो श्री नारायण के स्वांश रूप में तब प्रकट होता है, जब वे सृष्टि करना चाहते हैं। प्रजापति तो ब्रह्मा हैं और अन्य सभी उत्पन्न जीवों के पिता हैं। इसका वर्णन महानारायण उपनिषद् (१.४) में मिलता है अथ पुनरेव नारायण: सोऽन्यं कामं मनसा ध्यायेत। तस्य ध्यानान्त:स्थस्य ललनात् स्वेदोऽपतत्। ता इमा प्रतताप तासु तेजो हिरण्मयम् अण्डं तत्र ब्रह्मा चतुर्मुखोऽजायत। “तब नारायण ने अपनी दूसरी इच्छा का ध्यान किया और जब वे सोच रहे थे, तो उनके मस्तक से पसीने की एक बूँद गिरी। इसी बूँद के खमीर बनने से समस्त भौतिक सृष्टि का विकास हुआ। उसमें से अग्नि तुल्य ब्रह्माण्ड का सुनहरी अण्डा निकला और उसके भीतर चतुर्मुख ब्रह्मा ने जन्म लिया।”

जब कोई वस्तु बनाई जाती है, तो वह उसके अवयव कारण के विकार रूप में प्रकट होती है, जैसे कि सोने से बने आभूषण। जिस व्यक्ति को स्वर्ण की इच्छा होगी वह सोने के कुण्डलों या हार को ठुकरायेगा नहीं, क्योंकि ये वस्तुएँ भी स्वर्ण हैं, यद्यपि ये परिवर्धित हैं। इस सांसारिक उदाहरण में सच्चे ज्ञानी लोग पुरुष तथा उनके भौतिक और दिव्य दोनों प्रकार के अंशों में भेदाभेद साम्य देखते हैं। इस तरह यह दिव्य ज्ञान उन्हें मोह के बंधन से मुक्त कराता है, क्योंकि तब वे भगवान् की समूची सृष्टि में भगवान् का दर्शन पा सकते हैं।

श्री श्रीधर स्वामी स्तुति करते हैं—

यत् सत्त्वत: सदा भाति जगदेतद् असत् स्वत:।

सदाभासमसत्यस्मिन् भगवन्तं भजाम तम् ॥

“हम उन भगवान् की पूजा करें, जिनके भौतिक अस्तित्व से यह सृष्ट जगत शाश्वत रूप से विद्यमान प्रतीत होता है, यद्यपि यह असत् है। परमात्मा रूप में वे इस असत् के भीतर सत् का प्रतिनिधित्व करते हैं।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥