श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 27

 
श्लोक
तव परि ये चरन्त्यखिलसत्त्वनिकेततया
त उत पदाक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः ।
परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां-
स्त्वयि कृतसौहृदा: खलु पुनन्ति न ये विमुखा: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
तव—तुम्हारी; परि ये चरन्ति—जो पूजा करते हैं; अखिल—सबों के; सत्त्व—उत्पन्न जीव; निकेततया—आश्रय के रूप में; ते—वे; उत—केवल; पदा—अपने पैरों से; आक्रमन्ति—रखते हैं; अविगणय्य—अवहेलना करके; शिर:—सिर पर; निरृते:— मृत्यु के; परिवयसे—तुम बाँध देते हो; पशून् इव—पशुओं की तरह; गिरा—आपके (वेद के) शब्दों से; विबुधान्—चतुर; अपि—भी; तान्—उनके; त्वयि—जिसको; कृत—बनाने वाले; सौहृदा:—मैत्री; खलु—निस्सन्देह; पुनन्ति—पवित्र करते हैं; न—नहीं; ये—जो; विमुखा:—शत्रुतापूर्ण ।.
 
अनुवाद
 
 जो भक्त आपको समस्त जीवों के आश्रय रूप में पूजते हैं, वे मृत्यु की परवाह नहीं करते और उनके सिर पर आप अपना चरण रखते हैं, लेकिन आप वेदों के शब्दों से अभक्तों को पशुओं की तरह बाँध लेते हैं, भले ही वे प्रकाण्ड विद्वान क्यों न हों। आपके स्नेहिल भक्तगण ही अपने को तथा अन्यों को शुद्ध कर सकते हैं, आपके प्रति शत्रु-भाव रखने वाले नहीं।
 
तात्पर्य
 अब साक्षात् वेद अनेक विरोधी मतों के त्रुटिपूर्ण दर्शनों को एक तरफ रख देते हैं वैशेषिकों का असद् उत्पत्तिवाद, जो सृष्टि का स्रोत भौतिक मानते हैं, नैयायिकों का सद्विनाशवाद, जो मुक्तात्मा को चेतनारहित बताते हैं, सांख्यों का सगुणत्वभेदवाद, जो आत्मा को उसके ऊपरी गुणों से पृथक् कर देते हैं, मीमांसकों का विपणवाद, जो कर्म-व्यापार में आत्मा के नित्य संलग्न रहने की भर्त्सना करते हैं तथा मायावादियों का विवर्तवाद जो इस जगत में आत्मा के असली जीवन को मायाजाल (भ्रम) तक नीचे ला देते हैं। साक्षात् वेद इन सारे वादों को नकार कर अब भक्ति का दर्शन, परिचर्यावाद प्रस्तुत कर रहे हैं।
इस दर्शन को मानने वाले वैष्णव यह शिक्षा देते हैं कि जीवात्मा उस आध्यात्मिक पुरुष का एक परमाणु-कण है, जिसमें सूक्ष्म ज्ञान होता है, जो स्वतंत्र नहीं होता तथा जिसमें भौतिक गुण नहीं होते। सूक्ष्म होने से वह भौतिक शक्ति के वशीभूत हो सकता है, जहाँ वह भौतिक जीवन के कष्ट सहता है।

वह भगवान् की भक्ति करके ही अपने कष्टों को दूर कर सकता है तथा भगवान् की दिव्य अन्तरंगा शक्ति की शरण फिर से पा सकता है न कि सकाम कर्म, कल्पित ज्ञान या अन्य किसी विधि से। भगवान् कृष्ण अपने ही शब्दों में (भागवत ११.१४.२१) कहते हैं—

भक्त्याहमेकया ग्राह्य: श्रद्धयात्मा प्रिय: सताम्।

भक्ति: पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकान् अपि सम्भवात् ॥

“पूर्ण श्रद्धा के साथ मेरी अनन्य भक्ति करके ही मनुष्य मुझ भगवान् को प्राप्त कर सकता है। मैं स्वभावत: अपने भक्तों को प्रिय हूँ, जो मुझे अपनी प्रेमपूर्ण सेवा का एकमात्र लक्ष्य समझते हैं। ऐसी शुद्ध भक्ति में लगने से चाण्डाल भी अपने अधम जन्म के कल्मष को धो डालते हैं।”

भगवान् के भक्त उनकी पूजा प्रत्येक विद्यमान वस्तु (अखिल सत्त्व) के आश्रय (निकेत ) के रूप में करते हैं। ये वैष्णव भक्त अखिल-सत्त्व-निकेत कहे जा सकते हैं, क्योंकि इनका धाम तथा आश्रय भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही जगतों की सत्यता (सत्त्वम् ) का दार्शनिक सत्य होता है। इसीलिए श्रीपाद मध्वाचार्य ने अपने वेदान्त सूत्र भाष्य में यह श्रुतिमंत्र उद्धृत किया है सत्यं ह्येवेदं विश्वमसृजत उसने इस जगत की सत्य रूप में रचना की। श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कंध (७.१.११) में प्रधान पुम्भ्यां नरदेव सत्यकृत अर्थात् परमेश्वर को पदार्थ तथा जीवों के असली ब्रह्माण्ड का स्रष्टा कहा है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अखिल-सत्त्व-निकेत का एक अन्य ही गुह्य अर्थ सुझाया है कि भगवान् के निजी धाम किसी तरह भी खिल अर्थात् अपूर्ण नहीं हैं, अतएव वैकुण्ठ अर्थात् चिन्ता तथा सीमा से मुक्त प्रदेश कहलाते हैं। भगवान् ने कृपा करके जिन वैष्णवों की भक्ति स्वीकार कर ली है वे भगवान् द्वारा अपनी सुरक्षा के प्रति इतने निश्चिन्त रहते हैं कि वे मृत्यु से डरते नहीं। मृत्यु उनके लिए अपने नित्य धाम वापस जाने की सहज सीढ़ी बन जाती है।

किन्तु क्या मृत्यु-भय से मुक्ति के हेतु भगवद्भक्त ही योग्य होते हैं? अन्य सभी योगी और विद्वान क्यों अयोग्य हैं? यहाँ पर श्रुतियाँ उत्तर देती हैं“जो भी विमुख है, अर्थात् जिसने उनकी कृपा पाने के लिए उनकी ओर अपना मुख भी नहीं फेरा वह वेदों के उन्हीं शब्दों के द्वारा मोहबद्ध हो जाता है, जो शरणागत भक्तों को प्रकाशित करते हैं।” वेद स्वयं चेतावनी देते हैं तस्य वाक्तन्तिर्नामानि दामानि। तस्येदं वाचा तन्त्या नामभिर्दामभि: सर्वं सितम् “इस दिव्य ध्वनि के धागों से पवित्र नामों की डोरी बनती है, किन्तु इन्हीं से बाँधने की रस्सियाँ भी। सारे वेद अपने आदेशों की रस्सी से सम्पूर्ण संसार को बाँध देते हैं, जिससे सारे जीव मिथ्या उपाधि से जकड़ जाते हैं।”

आत्मा तथा परमात्मा की सत्यता अपरोक्ष -बोधगम्य है, किन्तु केवल उसके लिए जिसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हो। अशुद्ध हृदय वाले दार्शनिकजन भूलवश मान बैठते हैं कि यह सत्य परोक्ष है अर्थात् इसका चिन्तन तो किया जा सकता है, प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया जा सकता। ऐसे विचारकों का ज्ञान सत्य के छोटे-छोटे पक्षों के विषय में उनके संन्देहों और भ्रांतियों को दूर करने में सहायता कर सकता है, किन्तु भौतिक मोह को लाँघने तथा ब्रह्म के निकट पहुँचने के लिए यह व्यर्थ है। समान्यतया केवल वे भक्त अपरोक्ष ज्ञान के रूप में उनकी महानता और अद्भुत दया का सीधा साक्षात्कार प्राप्त करते रहते हैं, जो पूर्ण शुद्धि पाने तक भगवान् की प्रेमाभक्ति करते रहते हैं। हाँ, भगवान् चाहें तो अयोग्य पर भी कृपा प्रदान कर सकते हैं, जैसाकि वे आक्रमणकारी असुरों का वध करते समय करते हैं, किन्तु वे मायावादियों तथा अन्य नास्तिक दार्शनिकों को आशीर्वाद नहीं देना चाहते।

किन्तु यह नहीं सोचना चाहिए कि विष्णु के भक्त अज्ञानी हैं, क्योंकि वे दार्शनिक विश्लेषण तथा तर्क में दक्ष नहीं भी हो सकते। आत्मा का पूर्ण साक्षात्कार केवल अपने प्रयासों से मानसिक चिंतन के द्वारा नहीं, अपितु भगवान् की दया प्राप्त करके किया जा सकता है। यह बात हमें वैदिक प्रमाण में (कठ उपनिषद् २.२.२३ तथा मुण्डक उपनिषद् ३.२.३) सुनाई पड़ती है—

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥

“इस परमात्मा तक न तो तर्क द्वारा, न ही स्वतंत्र मस्तिष्क-शक्ति लगाकर, न अनेक शास्त्रों का अध्ययन करके पहुँचा जा सकता है। प्रत्युत वह व्यक्ति ही उसे पा सकता है, जिसको वह स्वयं कृपा करने के लिए चुन ले। उस व्यक्ति को आत्मा अपना असली साकार स्वरूप प्रकट कर देता है।”

श्रुति में अन्यत्र भक्त की सफलता का वर्णन मिलता है—देहान्ते देव: परमं ब्रह्म तारकं व्यचष्टे इस शरीर का अन्त होने पर पवित्र आत्मा परमेश्वर को उतना ही स्पष्ट देखता है, जितना आकाश के तारे दिखते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद् के अन्तिम कथन में (६.२३) कामना करने वाले वैष्णवों को यह प्रोत्साहन दिया गया है—

यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।

तस्यैते कथिता ह्यर्था: प्रकाशन्ते महात्मन: ॥

“जिन महात्माओं को भगवान् तथा गुरु में अटूट श्रद्धा होती है उन्हें ही वैदिक ज्ञान के सारे भावार्थ स्वत: प्रकट होते हैं।”

इस सम्बन्ध में श्रील जीव गोस्वामी श्वेताश्वतर उपनिषद् के अन्य श्लोक (४.७-८ तथा ४.१३) उद्धृत करते हैं—

जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशम् अस्य महिमानमिति वीतशोक: ॥

ऋचोऽक्षरे परे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदु:।

यस्तं वेद किम् ऋचा करिष्यति य इत् तद् विदुस्त इमे समासते ॥

“परमेश्वर वह है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद के मंत्रों में होता है, जो सर्वोच्च नित्य आकाश में रहता है तथा जो अपने सन्त-भक्तों को उसी पद की साझेदारी करने के लिए ऊँचे उठाता है। जिसने उसके प्रति शुद्ध प्रेम उत्पन्न कर लिया है और जो उनकी अद्वितीयता को समझता है, वह तब उनके यश की प्रशंसा करता है तथा दुख से मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति उस परमेश्वर को जानता है भला उसका ऋग्वेद के मंत्र और कौन-सा कल्याण कर सकते हैं? जो कोई भी उन्हें जान लेता है परमगति को प्राप्त होता है।

यो वेदानां अधिपो यस्मिंल्लोका अधिश्रिता:।

य ईशोऽस्य द्विपदश्चतुष्पदस्तस्मै देवाय हविषा विधेम् ॥

“जो सारे वेदों के स्वामी हैं, जिनमें सारे लोक टिके हैं, जो समस्त ज्ञात जीवों, दो पैर वालों तथा चौपायों के स्वामी हैं, हम उन्हीं भगवान् की पूजा घी की आहुतियों से करते हैं।”

श्रील श्रीधर स्वामी मुमुक्षुओं का उल्लेख करते हुए प्रार्थना करते हैं—

तपन्तु तापै प्रपतन्तु पर्वताद् अटन्तु तीर्थानि पठन्तु चागमान्।

यजन्तु यागैर्विवदन्तु वादैर्हरिम् विना नैव मृतिम् तरन्ति ॥

“भले ही वे तपस्या करें, अपने को पर्वत की चोटियों से गिरायें, तीर्थस्थलों की यात्रा करें, शास्त्र पढ़ें, अग्नि यज्ञों से पूजा करें और अनेक दर्शनों के विषय में तर्क करें, किन्तु हरि के बिना वे मृत्यु से आगे तैर नहीं सकते।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥