श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 28

 
श्लोक
त्वमकरण: स्वराडखिलकारकशक्तिधर-
स्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्त्यजयानिमिषा: ।
वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो
विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिता: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम; अकरण:—भौतिक इन्द्रियों से विहीन; स्व-राट्—आत्म तेजोमय; अखिल—समस्त; कारक—एन्द्रिय कार्यों की; शक्ति—शक्तियों के; धर:—धारण करने वाले; तव—तुम्हारी; बलिम्—भेंट; उद्वहन्ति—ले जाते हैं; समदन्ति—हिस्सा बँटाते हैं; अजया—प्रकृति के साथ; अनिमिषा:—देवतागण; वर्ष—राज्य के जनपदों के; भुज:—शासक; अखिल—समस्त; क्षिति—पृथ्वी के; पते:—स्वामी के; इव—सदृश; विश्व—ब्रह्माण्ड के; सृज:—स्रष्टा; विदधति—सम्पन्न करते हैं; यत्र— जिसमें; ये—वे; तु—निस्सन्देह; अधिकृता—नियत; भवत:—आपका; चकिता:—भयभीत ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि आपकी भौतिक इन्द्रियाँ नहीं हैं, किन्तु आप हर एक की इन्द्रिय-शक्ति के आत्म- तेजवान धारणकर्ता हैं। देवता तथा प्रकृति स्वयं आपकी पूजा करते हैं, जबकि अपने पूजा करने वालों द्वारा अर्पित भेंट का भोग भी करते हैं, जिस तरह किसी राज्य के विविध जनपदों के अधीन शासक अपने स्वामी को, जो कि पृथ्वी का चरम स्वामी होता है, भेंटें प्रदान करते हैं और साथ ही स्वयं अपनी प्रजा द्वारा प्रदत्त भेंट का भोग भी करते हैं। इस तरह आपके भय से ब्रह्माण्ड के स्रष्टा अपने अपने नियत कार्यों को श्रद्धापूर्वक सम्पन्न करते हैं।
 
तात्पर्य
 सारे बुद्धिमान जीवों को भगवान् की सर्वसत्ता स्वीकार करनी चाहिए और स्वेच्छा से उनकी भक्ति में संलग्न होना चाहिए। साक्षात् वेदों का यही एकमत है। किन्तु इन स्तुतियों को सुनते समय नारायण ने ठीक ही पूछा होगा, “चूँकि इन्द्रियों तथा अंगों से युक्त मेरा भी शारीरिक रूप है, तो फिर क्या मैं दूसरा कर्ता तथा भोक्ता नहीं हूँ? विशेषरूप से तब जबकि मैं परमात्मा रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में रहकर असंख्य अंगों-प्रत्यंगों का निरीक्षण करता हूँ, तो यह कैसे हो सकता है कि मैं सबों की समूची इन्द्रिय-तृप्ति में न गिना जाऊँ?” समवेत श्रुतियाँ यहाँ मिलकर कहती हैं, “नहीं। आपके भौतिक इन्द्रियाँ नहीं हैं, तो भी आप सबों के परम नियन्ता हैं।” जैसाकि श्वेताश्वतर उपनिषद् (३.१८) में व्यक्त हुआ है—
अपाणिपादो जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षु: स शृणोत्यकर्ण:।

स वेत्ति वेद्यं न च तस्य वेत्ता तमाहुरग्रयं पुरुषं पुराणम् ॥

“उसके पैर या हाथ नहीं हैं, फिर भी वह सबसे तेज दौडऩे वाला है और किसी भी वस्तु को पकड़ सकता है। यद्यपि वह आँखों या कानों से रहित है, तो भी वह देखता-सुनता है। उसे कोई नहीं जानता फिर भी वह ज्ञाता तथा ज्ञेय है। मुनिगण उसे परम आदि भगवान् के रूप में बतलाते हैं।”

परम पुरुष के हाथ, पाँव, आँखें तथा कान सामान्य बद्ध आत्मा जैसे नहीं होते, जो मिथ्या अहंकार से एवं भौतिक पदार्थ होते हैं। प्रत्युत भगवान् का दिव्य सुन्दर स्वरूप उनकी अन्तरंगा प्रकृति की अभिव्यक्ति है। इस प्रकार बद्धजीवों के आत्मा तथा शरीर से भिन्न भगवान् तथा उनका स्वरूप सभी प्रकार से एकरूप हैं। साथ ही, उनके कमल-हाथ, कमल-चरण, कमल-नेत्र तथा अन्य अंग अपने कार्यों तक सीमित नहीं होते। भगवान् द्वारा उत्पन्न प्रथम जीव ब्रह्मा ने इसीलिए उनका यशोगान किया है—

अंगानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरं जगन्ति।

आनन्दचिन्मयसदुज्जवलविग्रहस्य गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

“मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, जिनका दिव्य रूप आनन्द, सत्य तथा सार से पूर्ण है और जिससे अत्यन्त तेजपूर्ण प्रकाश निकलता है। उस दिव्य शरीर का प्रत्येक अंग सारे अंगों के सारे कार्यकलापों से युक्त होता है और आध्यात्मिक तथा भौतिक दोनों ही अनन्त ब्रह्माण्डों को नित्य देखता, पालन करता और प्रकट करता है।” (ब्रह्म-संहिता ५.३२) श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने अखिल शक्तिधर का दूसरा अर्थ भी दिया है भगवान् जिस शक्ति को अपने भीतर धारण करते हैं वह अखिल है अर्थात् खिल या निम्न तथा तुच्छ के प्रतिबन्धों से मुक्त है।

वह जीव की इन्द्रियों को शक्ति प्रदान करता है, जैसाकि केन उपनिषदथ (१.२) में कहा गया है श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचम्व “वह कान का कान, मन का मन और वाणी की वाणी शक्ति है।” और श्वेताश्वतर उपनिषद् में भी (६.८) घोषणा है—

न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥

“उन्हें कोई कार्य नहीं करना पड़ता, न ही उनके कोई भौतिक इन्द्रियाँ होती हैं, जिनसे यह कार्य किया जाय। न तो कोई उनके तुल्य है, न उनसे बढक़र है। वेदों से हम सुनते हैं कि भगवान् की नाना प्रकार की शक्तियाँ हैं यथा ज्ञान, बल तथा क्रिया की शक्तियाँ जिनमें से हर एक स्वतंत्र रूप से कार्य करती है।”

मर्त्य जीवों पर शासन करने वाले इन्द्र तथा अन्य देवता तो स्वयं भगवान् के दास हैं। वैसे ही इनसे भी श्रेष्ठ ब्रह्मा तथा उनके पुत्र भी दास हैं। ये सारे महान् देवता तथा ऋषिगण ब्रह्माण्ड का पालन करने तथा मानव जाति को धार्मिक मार्गदर्शन प्रदान करने के अपने अपने कार्य करके भगवान् की पूजा करते हैं।

ब्रह्माण्ड के शक्तिशाली नियन्ता भयपूर्ण आदर से परम नियन्ता श्री विष्णु की शरण ग्रहण करते हैं। जैसाकि तैत्तिरीय उपनिषद् (२.८.१) में कहा गया है—

भीषास्माद् वात: पवते भीषाद् एति सूर्य:।

भीषास्माद् अग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चम: ॥

“वायु उनके भय से चलता है। उनके ही भय से सूर्य गति करता है और अग्नि तथा इन्द्र अपना अपना कार्य करते हैं। और मृत्यु, जिसका स्थान पाँचवा है, उनके भय से भागता रहता है।” श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

अनिन्द्रियोऽपि यो देव: सर्वकारकशक्तिधृक्।

सर्वज्ञ: सर्वकर्ता च सर्वसेव्यं नमामि तम् ॥

“भगवान् के कोई इन्द्रिय नहीं है, फिर भी वह प्रत्येक जीव के ऐन्द्रिय कार्यों को नियंत्रित करता है। वे हर वस्तु के जानने वाले, समस्त कार्य के चरमकर्ता तथा हर एक की भक्ति के समुचित लक्ष्य हैं। मैं उनको नमस्कार करता हूँ।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥