श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 29

 
श्लोक
स्थिरचरजातय: स्युरजयोत्थनिमित्तयुजो
विहर उदीक्षया यदि परस्य विमुक्त तत: ।
न हि परमस्य कश्चिदपरो न परश्च भवेद्
वियत इवापदस्य तव शून्यतुलां दधत: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
स्थिर—जड़; चर—तथा चेतन; जातय:—योनियाँ; स्यु:—प्रकट हुईं; अजया—भौतिक शक्ति से; उत्थ—जागृत की गई; निमित्त—कारण (तथा ऐसे कारण से क्रियाशील बनाये गये सूक्ष्म शरीर); युज:—धारण करके; विहर:—खेल; उदीक्षया— आपकी टुक चितवन से; यदि—यदि; परस्य—उसका, जो पृथक् रहता है; विमुक्त—हे नित्य मुक्त; तत:—उससे; न—नहीं; हि—निस्सन्देह; परमस्य—परम का; कश्चित्—कोई; अपर:—पराया नहीं; न—न तो; पर:—पराया; च—भी; भवेत्—हो सकता है; वियत:—आकाश के लिए; इव—सदृश; अपदस्य—अनुभवगम्य गुणों से विहीन; तव—तुम्हारा; शून्य—शून्य; तुलाम्—तुलना; दधत:—जो धारण करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 हे नित्यमुक्त दिव्य भगवान्, आपकी भौतिक शक्ति विविध जड़ तथा चेतन जीव योनियों को उनकी भौतिक इच्छाएँ जगाकर प्रकट कराती है, लेकिन ऐसा तभी होता है, जब आप उस पर अल्प दृष्टि डालकर उसके साथ क्रीड़ा करते हैं। हे भगवान्, आप किसी को न तो अपना घनिष्ठ मित्र मानते हैं, न ही पराया, ठीक उसी तरह जिस तरह आकाश का अनुभवगम्य गुणों से कोई सम्बन्ध नहीं होता। इस मामले में आप शून्य के समान हैं।
 
तात्पर्य
 न केवल सारे जीव अपने पालन-पोषण तथा कल्याण के लिए सर्वशक्तिमान स्वतंत्र भगवान् पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं, अपितु उनका सारा देहधारी अस्तित्व उनकी अपार दया के ही कारण होता है। भगवान् को भौतिक व्यापारों में कोई रुचि नहीं रहती, क्योंकि उन्हें इस जगत के क्षुद्र आनन्दों से कुछ भी नहीं लेना होता। वे ईर्ष्या या वासना के किसी भी कल्मष से पूरी तरह मुक्त रहते हैं। वे अपनी दैवी शक्तियों के भीतरी लोक में अपने शुद्ध भक्तों के साथ गुह्य प्रेम-लीलाओं में पूरी तरह व्यस्त रहते हैं। अतएव यदि वे भौतिक सृष्टि के कार्य की ओर कभी मुड़ते हैं, तो उन पतितात्माओं को अपने नित्य आनन्द लोक में खींचकर लाने के लिए ऐसा करते हैं।
भगवान् से पृथक् जीवन बिताने के लिए विद्रोही आत्माओं को उपयुक्त शरीर तथा मोहमय परिवेश प्रदान किया जाना चाहिए, जिसमें वे स्वतंत्रतापूर्वक विलास-कार्य कर सकें। दयामय प्रभु उन्हें अपनी राह में चल कर अपने आप सीखने के लिए सहमत हो जाते हैं, अतएव वे अपनी भौतिक सृजन की शक्ति महामाया पर दृष्टि डालते हैं। इस दृष्टि के पडऩे से ही वह जाग जाती है और उनकी ओर से सारी व्यवस्था करने लगती है। वह तथा उसके सहायकगण देवताओं, मनुष्यों, पशुओं आदि के असंख्य स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर निर्मित करते हैं। उसी के साथ वे स्वर्ग तथा नरक-लोकों में असंख्य परिस्थितियाँ भी उत्पन्न करते हैं, जिससे बद्धजीवों को उनकी इच्छानुसार तथा योग्यतानुसार सुविधाएँ प्राप्त हो सकें।

भले ही कोई अनजान व्यक्ति प्राणियों के कष्ट के लिए ईश्वर को दोष दे, किन्तु वैदिक वाङ्मय का सच्चा अध्येता प्रत्येक आत्मा के लिए भगवान् की एकसमान चिन्ता की प्रशंसा किये बिना नहीं रहता। चूँकि उन्हें कुछ लेना-देना नहीं रहता, इसलिए वे मित्रों तथा विरोधियों में भेदभाव क्यों रखें? भले ही हम उनका विरोध करने की ठान लें और उन्हें भुलाने के सारे प्रयत्न करें, किन्तु वे हमें कभी नहीं भूलते, न ही वे हमें हमारी सभी आवश्यक वस्तुओं को देना तथा अदृश्य मार्गदर्शन देना बन्द करते हैं।

श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

त्वदीक्षणवशक्षोभमायाबोधितकर्मभि: ।

जातान् संसरत: खिन्नान् नृहरे पाहि न: पित: ॥

“हे पिता, हे नृसिंह! जो जन्म-मृत्यु के अन्तहीन चक्र में जन्म ले चुके हैं, उनकी रक्षा कीजिये। ये आत्माएँ अपने कर्म-बन्धन से दुखी हैं, जिसे माया ने तब जागृत किया, जब आपने उसे क्रियाशील बनाने के लिए अपनी दृष्टि डाली।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥