श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 33

 
श्लोक
विजितहृषीकवायुभिरदान्तमनस्तुरगं
य इह यतन्ति यन्तुमतिलोलमुपायखिद: ।
व्यसनशतान्विता: समवहाय गुरोश्चरणं
वणिज इवाज सन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
विजित—जीता हुआ; हृषीक—इन्द्रियों से; वायुभि:—तथा प्राण से; अदान्त—अवश; मन:—मन रूपी; तुर-गम्—घोड़े को; ये—जो; इह—इस जगत में; यतन्ति—प्रयास करते हैं; यन्तुम्—नियमित बनाने के लिए; अति—अत्यन्त; लोलम्—चलायमान; उपाय—उपायों से; खिद:—सताया हुआ; व्यसन—उत्पात; शत—सैकड़ों; अन्विता:—से युक्त; समवहाय—त्याग कर; गुरो:—गुरु के; चरणम्—चरणों को; वणिज:—व्यापारीगण; इव—सदृश; अज—हे अजन्मा; सन्ति—हैं; अकृत—ग्रहण न करके; कर्ण-धरा:—नाविक; जल-धौ—समुद्र में ।.
 
अनुवाद
 
 मन ऐसे उच्छृंखल घोड़े की तरह है, जिसको अपनी इन्द्रियों एवं श्वास को संयमित कर चुके व्यक्ति भी वश में नहीं कर सकते। इस संसार में वे लोग, जो अवश मन को वश में करना चाहते हैं, किन्तु अपने गुरु के चरणों का परित्याग कर देते हैं, उन्हें विविध दुखदायी विधियों के अनुशीलन में सैकड़ों बाधाओं का सामना करना पड़ता है। हे अजन्मा भगवान्, वे समुद्र में नाव पर बैठे उन व्यापारियों के समान हैं, जो किसी नाविक को भाड़े पर नहीं लेते।
 
तात्पर्य
 ईश्वर का प्रेम, जो कि मुक्ति का पक्व फल है, प्राप्त करने के योग्य बनने के लिए सर्वप्रथम विद्रोही भौतिक मन को वश में लाना होता है। यद्यपि ऐसा कर पाना कठिन है, किन्तु जब मनुष्य इन्द्रिय-तृप्ति की अपनी लत को हटाकर आध्यात्मिक जीवन के उच्चतर आनंद का आस्वाद करने लगता है, तो वह ऐसा कर सकता है। किन्तु भगवान् के प्रतिनिधि गुरु की ही कृपा से यह उच्चतर आस्वाद प्राप्त किया जा सकता है।
गुरु दिव्य जगत के आश्चर्यों को देख सकने के लिए शिष्य की आँखें खोल देता है, जैसाकि गायत्री स्तुति में दैवी ज्ञान ऐं के बीज मंत्र में है।

मुण्डक उपनिषद् (१.२.१२) का कथन है—

तद्विज्ञानर्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।

“इन बातों की सही जानकारी प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अपने हाथ में समिधा लेकर गुरु के पास जाना चाहिए, जो वेदों में पारंगत होता है और परम सत्य में दृढ़-भक्ति रखता है।” तथा कठ उपनिषद् (२.९) की घोषणा है—

नैषा तर्केन मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।

“हे बालक! यह अनुभूति तर्क द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। इसे समझ सकने में सक्षम शिष्य से अत्यधिक योग्य गुरु को ही बतलाना चाहिए।”

प्राय: अवैष्णव जन गुरु के प्रति जो शिष्य परंपरा की प्रमाणित पंक्ति में चला आ रहा है, समर्पण भाव की महत्ता की अवहेलना करते हैं। इसके बजाय, अपनी योग्यता पर निर्भर रहकर अभिमानी योगी तथा ज्ञानीजन विश्व पर रोब जमाने के लिए ऊपर से दिखने वाली अपनी अपनी सफलता प्रदर्शित करते हैं, किन्तु उनका यह यश क्षणिक होता है—

युञ्जानानां अभक्तानां प्राणायामादिभिर्मन:।

अक्षीणवासनं राजन् दृश्यते पुनरुत्थितम् ॥

“जो अभक्त प्राणायाम् जैसी विधियों में अपने मनों को लगाते हैं, वे भौतिक इच्छाओं से पूरी तरह रहित नहीं हो पाते। अत: हे राजन्! उनके मन में भौतिक इच्छाएँ पुन: उदय होती देखी जाती हैं।” (भागवत १०.५१.६०) दूसरी ओर, भगवान् विष्णु तथा वैष्णवों का विनीत दृढ़-संकल्प भक्त अजेय मन पर आसानी से विजय पा लेता है। उसे मन को स्थिर बनाने के लिए न तो अष्टांग योग करने की आवश्यकता पड़ती है, न ही अन्य साधन अपनाने पड़ते हैं। सर्वं चैतद् गुरौ भक्त्या पुरुषो ह्यञ्जसा जयेत्—एकमात्र गुरु- भक्ति के द्वारा मनुष्य इन सारे लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है। अन्यथा एक अभक्त अपनी इन्द्रियों तथा प्राण-वायु को जीत कर भी अपने मन को वश में नहीं कर सकता, जो लगाम से छूटे घोड़े की तरह स्वच्छंद दौड़ता रहेगा। उसे अनेक आध्यात्मिक विधियों का पालन करने में अपार चिन्ता भोगनी पड़ेगी और अंत में वह इस विशाल भवसागर में पहले की ही तरह भूला-भटका रहता रहेगा। यहाँ पर दिया गया दृष्टान्त उपयुक्त है : वे व्यापारी जो महान् लाभ की इच्छा से जल्दी जल्दी में समुद्र-यात्रा करते हैं, किन्तु अपनी नाव के लिए योग्य नाविक नहीं लेते, उन्हें महान् कष्ट उठाना पड़ता है।

भागवत में अनेक स्थलों पर प्रामाणिक गुरु की महत्ता घोषित की गई है। यथा, ग्यारहवें स्कंध के निम्नलिखित श्लोक में (२०.१७)—

नृदेहमाद्यम् सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।

मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा ॥

“जीवन में सारे लाभ दिलाने वाला मनुष्य-शरीर प्रकृति के नियमों द्वारा स्वत: प्राप्त होता है, यद्यपि यह विरल उपलब्धि है। इस मनुष्य-शरीर की उपमा सुनिर्मित नाव से दी जा सकती है, जिसका कर्णधार गुरु होता है और भगवान् के आदेश मार्ग में अनुकूल वायु के तुल्य होते हैं। इन सभी लाभों पर विचार करके जो मनुष्य अपने मनुष्य-शरीर का उपयोग भवसागर को पार करने के लिए नहीं करता, उसे अपनी ही आत्मा का हत्यारा माना जाना चाहिए।” अतएव मनुष्य-जीवन का संजीदगी से उपयोग करने वाले का पहला कर्तव्य यह होता है कि वह ऐसे गुरु की खोज करे जो कृष्णभावनामृत में उसका मार्गदर्शन कर सके।

श्रील श्रीधर स्वामी स्तुति करते हैं—

यदा परानन्दगुरो भवत्पदे पदं मनो मे भगवल्लभेत।

तदा निरस्ताखिलसाधनश्रम: श्रयेय सौख्यं भवत: कृपात: ॥

“हे दिव्य आनन्दमय गुरु! जब मेरा मन आपके चरणकमलों पर स्थान पा लेगा, तो मेरी आध्यात्मिक साधना का श्रम दूर हो जायेगा और आपकी कृपा से मुझे परम सुख का अनुभव होगा।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥