श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 34

 
श्लोक
स्वजनसुतात्मदारधनधामधरासुरथै-
स्त्वयि सति किं नृणां श्रयत आत्मनि सर्वरसे ।
इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां
सुखयति को न्विह स्वविहते स्वनिरस्तभगे ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
स्वजन—सेवकों; सुत—बच्चों; आत्म—शरीर; दार—पत्नी; धन—धन; धाम—घर; धरा—पृथ्वी; असु—प्राण; रथै:—तथा वाहनों से; त्वयि—जब तुम; सति—बन गये हो; किम्—क्या (लाभ); नृणाम्—मनुष्यों के लिए; श्रयत:—शरण में आये हुए; आत्मनि—उनकी आत्मा; सर्व-रसे—समस्त आनन्द के स्वरूप; इति—इस प्रकार; सत्—सत्य; अजानताम्—न जानने वालों के लिए; मिथुनत:—संभोग से; रतये—रति के लिए; चरताम्—करते हुए; सुखयति—सुख देता है; क:—क्या; नु—तनिक भी; इह—इस (जगत) में; स्व—अपने आप; विहते—विनाशशील; स्व—अपने आप; निरस्त—रहित; भगे—किसी सार से ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति आपकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें आप परमात्मा स्वरूप दिखते हैं, जो समस्त दिव्य-आनन्द स्वरूप है। ऐसे भक्तों के लिए अपने सेवकों, बच्चों या शरीरों, अपनी पत्नियों, धन या घरों, अपनी भूमि, स्वास्थ्य या वाहनों का क्या उपयोग रह जाता है? और जो आपके विषय में सच्चाई को समझने में असफल होते हैं तथा यौन-आनन्द के पीछे भागते रहते हैं, उनके लिए इस सम्पूर्ण जगत में, जो सदैव विनाशशील है और महत्त्व से विहीन है, ऐसा क्या है, जो उन्हें असली सुख प्रदान कर सके?।
 
तात्पर्य
 वह विष्णु-भक्ति शुद्ध मानी जाती है, जिसमें मनुष्य की एकमात्र इच्छा भगवान् को प्रसन्न करना हो। उस पूर्ण चेतना में स्थित वैष्णव को सांसारिक उपलब्धि में कोई रुचि नहीं रहती, इसलिए वह यज्ञ करने तथा योग का कठिन अभ्यास करने के किसी कर्तव्य से मुक्त कर दिया जाता है। जैसाकि मुण्डक उपनिषद् (१.२.१२) में कहा गया है—
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदम् आयान् नास्त्यकृत: कृतेन ॥

“जब ब्राह्मण यह जान लेता है कि स्वर्ग जाना कर्म का दूसरा संचय मात्र ही है, तो वह विरक्त हो जाता है और अपने कर्मों से दूषित नहीं होता।” बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.९) तथा कठ उपनिषद् (६.१४) से इसकी पुष्टि होती है—

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रीता:।

अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥

“जब कोई व्यक्ति अपने हृदय की सारी पापपूर्ण इच्छाएँ त्याग देता है, तो मृत्यु के बदले वह शाश्वत आध्यात्मिक जीवन लेता है और ब्रह्म में असली सुख पाता है। गोपालतापनी उपनिषद् (पूर्व १५) में यह निष्कर्ष दिया गया है कि भक्तिरस्य भजनं तदिहामुत्रोपाधिनैरास्येन् आमुष्मिन् मन:कल्पनम् एतदेव नैष्कर्म्यम्—“भक्ति तो परमेश्वर की पूजा करने की विधि है। इसमें सारी भौतिक उपाधियों से चाहे वे इस जीवन की हों या अगले की, मुँह मोड़ कर उन्हीं पर मन को स्थिर करना होता है। यही असली वैराग्य है।”

श्रुतियों ने यहाँ पर जिन वस्तुओं के नाम गिनाये हैं, वे सभी सांसारिक सफलता के मापदण्ड हैं— स्वजना: (सेवक), आत्मा (सुन्दर शरीर), सुता: (गर्व करने योग्य पुत्र), दारा: (सुन्दर आकर्षक पत्नी), धनम् (धन), धाम (प्रतिष्ठापूर्णघर), धरा (भूमि), असव: (स्वास्थ्य तथा शक्ति) तथा रथा: (मोटर-कार तथा अन्य वाहन जो प्रतिष्ठा को प्रदर्शित करते हैं)। किन्तु जिसने भक्ति के आनन्द का अनुभव करना प्रारम्भ कर दिया है, वह इन सारी वस्तुओं का आकर्षण त्याग देता है, क्योंकि उसे समस्त आनन्द के आगार भगवान् में, जो अपने आनन्द को अपने सेवकों में बाँटते हैं असली तुष्टि मिलती है।

हममें से हर व्यक्ति अपना जीवन-मार्ग चुनने के लिए स्वतंत्र है—हम चाहें तो अपना शरीर, मन, वचन, प्रतिभा तथा धन भगवान् के यश को अर्पित कर दें या फिर हम उनकी उपेक्षा करके अपने निजी सुख के लिए संघर्ष करें। यह दूसरा मार्ग यौन तथा अभिलाषा की दासता की ओर ले जाने वाला है, जिसमें आत्मा को कभी असली संतोष नहीं मिलता, अपितु वह निरन्तर कष्ट उठाता रहता है। वैष्णवजन भौतिकतावादियों को इस तरह भोगते देखकर दुखी होते हैं, अतएव वे उन्हें प्रबोधित करने का प्रयास करते रहते हैं।

श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

भजतो हि भवान् साक्षात् परमानन्दचिद्धन:।

आत्मैव किमत: कृत्यं तुच्छदारसुतादिभि: ॥

“जो आपकी पूजा करते हैं उनके लिए आप उनकी आत्मा और सर्वोच्च आनन्द के आध्यात्मिक कोष बन जाते हैं। उन्हें संसारी पत्नियों, बच्चों इत्यादि से क्या काम?”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥