श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 35

 
श्लोक
भुवि पुरुपुण्यतीर्थसदनान्यृषयो विमदा-
स्त उत भवत्पदाम्बुजहृदोऽघभिदङ्‍‍घ्रिजला: ।
दधति सकृन्मनस्त्वयि य आत्मनि नित्यसुखे
न पुनरुपासते पुरुषसारहरावसथान् ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
भुवि—पृथ्वी पर; पुरु—अत्यधिक; पुण्य—पवित्र; तीर्थ—तीर्थस्थान; सदनानि—तथा भगवान् के निजी धाम; ऋषय:— ऋषिगण; विमद:—मिथ्या गर्व से रहित; ते—वे; उत—निस्सन्देह; भवत्—आपके; पद—पाँव; अम्बुज—कमलवत्; हृद:— जिनके हृदयों में; अघ—पाप; भित्—विनाश करने वाले; अङ्घ्रि—जिनके चरणों (को धोने से); जला:—जल; दधति— बदल जाता है; सकृत्—एक बार भी; मन:—जिनके मन; त्वयि—तुममें; ये—जो; आत्मनि—परमात्मा के प्रति; नित्य—सदैव; सुखे—सुख में; न पुन:—फिर कभी नहीं; उपासते—पूजा करते हैं; पुरुष—मनुष्य के; सार—आवश्यक गुण; हर—हर लेते हैं; आवसथान्—उनके संसारी घर ।.
 
अनुवाद
 
 ऋषिगण मिथ्या गर्व से रहित होकर पवित्र तीर्थस्थानों तथा जहाँ जहाँ भगवान् ने अपनी लीलाएँ प्रदर्शित की हैं, उनका भ्रमण करते हुए इस पृथ्वी पर निवास करते हैं। चूँकि ऐसे भक्त आपके चरणकमलों को अपने हृदयों में रखते हैं, अत: उनके पाँवों को धोने वाला जल सारे पापों को नष्ट कर देता है। जो कोई अपने मन को एक बार भी समस्त जगत के नित्य आनन्दमय आत्मा आपकी ओर मोड़ता है, वह घर पर ऐसे पारिवारिक जीवन के अधीन नहीं रहता, जिससे मनुष्य के अच्छे गुण छीन लिये जाते हैं।
 
तात्पर्य
 महत्त्वाकांक्षी ऋषि का गुण यह है कि उसने आदर्श विद्वानों से परम सत्य के विषय में सीखा होता है और वैराग्य का सौम्य भाव विकसित कर लिया होता है। अनावश्यक एवं आवश्यक में भेद करने की क्षमता विकसित करने के लिए ही ऐसा व्यक्ति प्राय: एक पवित्र स्थान से दूसरे पवित्र स्थान में घूमता रहता है और इन स्थानों में बसने वाले या आने वाले महात्माओं की संगति का लाभ उठाता है। यदि अपनी यात्राओं के दौरान ऐसा ऋषि अपने हृदय के भीतर भगवान् के चरणकमलों की अनुभूति करना आरम्भ कर सकता है, तो वह मिथ्या अहंकार के मोह से तथा काम, ईर्ष्या एवं लोभ के दुखद बन्धन से छूट जायेगा। यद्यपि वह तब भी अपने पाप धो डालने के लिए तीर्थस्थानों में जा सकता है, किन्तु अब इस शुद्ध संत में अपने चरणोदक से और अपने अनुभवजनित उपदेशों से अन्यों को पवित्र बनाने की शक्ति आ जाती है। ऐसे एक ऋषि का वर्णन मुण्डक उपनिषद् (२.२.९) में मिलता है—
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥

“जब वह परमेश्वर को सर्वत्र, सभी उच्च तथा निम्न जीवों के भीतर, देखता है, तो हृदय-ग्रन्थि का भेदन हो जाता है, सारे संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सकाम कर्मों की शृंखला टूट जाती है।” इस अवस्था को प्राप्त ऋषियों को अपना नमस्कार करते हुए मुण्डक उपनिषद् (३.२.११) में कहा गया है—नम: परमर्षिभ्य:, नम: परमर्षिभ्य:—परम ऋषियों को नमस्कार है, परम ऋषियों को नमस्कार है। सन्त वैष्णवजन स्त्रियों, बच्चों, मित्रों तथा अनुयायियों की प्रिय संगति छोड़ कर उन पवित्र धामों की यात्रा करते रहते हैं, जहाँ परमेश्वर की पूजा सफलतापूर्वक सम्पन्न की जा सके—ऐसे स्थान जैसे वृन्दावन, मायापुर तथा जगन्नाथ पुरी या फिर जहाँ कहीं भगवान् विष्णु के निष्ठावान भक्त एकत्र होते हैं। यहाँ तक कि ऐसे वैष्णव भी जिन्होंने संन्यास ग्रहण नहीं किया और अब भी अपने घर में या अपने गुरु के आश्रम में रह रहे हैं, किन्तु जिन्होंने भक्ति के दिव्य आनन्द की एक बूँद एक बार भी चखी है, वे भौतिकतावादी गृहस्थ-जीवन के आनन्दों का चिन्तन करने में तनिक भी रुचि नहीं रखेंगे, क्योंकि गृहस्थ-जीवन मनुष्य से उसका विवेक, संकल्प, गम्भीरता, सहिष्णुता तथा मन:शान्ति को हर लेता है। श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

मुञ्चन्नंग तदंगसंगमनीशं त्वामेव सञ्चितयन् सन्त: सन्ति यतो यतो गतमदास्तान् आश्रमान् आवसन्।

नित्यं तन्मुखपंकजाद् विगलितत्वत्पुण्यगाथामृत स्रोत:सम्प्लवसम्प्तुो नरहरे न स्याम् अहं देहभृत् ॥

“हे प्रभु! जब मैं अपनी सारी इन्द्रिय-तृप्ति त्याग दूँगा और निरन्तर आपका ध्यान धरने में लग जाऊँगा और जब मैं मिथ्या गर्व से रहित सन्त सदृश भक्तों की कुटियाओं में निवास करने लगूँगा, तब मैं आपकी पवित्र कथाओं का उच्चारण कर रहे भक्तों के कमल-मुखों से निकली अमृत की बाढ़ में पूरी तरह डूब जाऊँगा। और हे नरहरि! तब मुझे पुन: भौतिक शरीर धारण नहीं करना होगा।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥