श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 37

 
श्लोक
न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना-
दनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे ।
अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथै-
र्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधा: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; यत्—क्योंकि; इदम्—यह (ब्रह्माण्ड); अग्रे—प्रारम्भ में; आस—था; न भविष्यत्—न होगा; अत:—अत:; निधनात् अनु—इसके संहार के बाद; मितम्—प्राप्त; अन्तरा—इस बीच; त्वयि—तुममें; विभाति—प्रकट होता है; मृषा—झूठा; एकरसे—जिसका आनन्द का अनुभव अपरिवर्तित रहता है; अत:—इस प्रकार; उपमीयते—तुलना से जाना जाता है; द्रविण— भौतिक वस्तु का; जाति—कोटियों में; विकल्प—विकारों के; पथै:—किस्मों से; वितथ—तथ्य से विपरीत; मन:—मन; विलासम्—विलास; ऋतम्—असली, सत्य; इति—ऐसा; अवयन्ति—सोचते हैं; अबुध:—बुद्धिहीन, अज्ञानी ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि यह ब्रह्माण्ड अपनी सृष्टि के पूर्व विद्यमान नहीं था और अपने संहार के बाद विद्यमान नहीं रहेगा, अत: हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मध्यावधि में यह आपके भीतर दृश्य रूप में कल्पित होता है, जिनका आध्यात्मिक आनन्द कभी नहीं बदलता। हम इस ब्रह्माण्ड की तुलना विविध भौतिक वस्तुओं के विकारों से करते हैं। निश्चय ही, जो यह विश्वास करते हैं कि यह छोटी-सी कल्पना सत्य है, वे अल्पज्ञ हैं।
 
तात्पर्य
 इस प्रकार अनुष्ठानवादियों द्वारा भौतिक सृष्टि की सत्यता स्थापित करने के सारे प्रयासों को विफल करने के बाद साक्षात् वेद इसके विरोध में साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं—कि यह संसार असत्य है, क्योंकि क्षणिक है। ब्रह्माण्ड की सृष्टि के पूर्व तथा इसके संहार के बाद एकमात्र दिव्य भगवान्, उनके धाम तथा साज-सामान की सत्यता ही बची रहती है। श्रुतियाँ इसकी पुष्टि करती हैं—आत्मा वा इदम् एक एवाग्र आसीत्—इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि के पूर्व एकमात्र आत्मा विद्यमान था। (ऐतरेय उपनिषद् १.१) नासद् आसीन् नो सद् आसीत् तदानीम्—उस समय पदार्थ के न तो सूक्ष्म, न ही स्थूल पक्ष वर्तमान थे। (ऋग्वेद १०.१२९.१) सृष्टि की सापेक्षता को एक दृष्टान्त द्वारा समझा जा सकता है। जब मिट्टी तथा धातु को विभिन्न आकार की वस्तुओं में ढाल दिया जाता है. तो बनी हुई वस्तुएँ मिट्टी तथा धातु से केवल नाम तथा रूप के कारण पृथक् विद्यमान रहती हैं। उनकी मूलभूत वस्तु तो वही रहती है। इसी तरह से जब भगवान् की शक्तियाँ इस जगत की ज्ञात वस्तुओं में बदल जाती हैं, तो ये वस्तुएँ केवल नाम तथा रूप में भगवान् से पृथक् उपस्थित रहती हैं। छान्दोग्य उपनिषद् (६.१.४-६) में उद्दालक ऋषि ऐसा ही दृष्टान्त देकर अपने पुत्र को समझाते हैं—यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्—हे बालक! उदाहरणार्थ, मिट्टी के एक ढेले को समझ लेने पर मिट्टी से बनी हर वस्तु को समझा जा सकता है। रूपान्तरित पदार्थों की उपस्थिति केवल भाषा की उपज है, उपाधियाँ प्रदान करने की बात है—केवल मिट्टी ही सत्य है।
निष्कर्ष के रूप में कोई ऐसा विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिलता कि इस जगत की वस्तुएँ शाश्वत हैं, जबकि उनके नश्वर होने तथा मिथ्या उपाधियों से बद्ध होने के अनेक प्रमाण हैं। इसलिए अज्ञानी व्यक्ति ही पदार्थ के काल्पनिक रूपों को सत्य मान सकते हैं।

श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

मुकुटकुंडलकंकणकिंकिणीपरिणतं कनकं परमार्थत:।

महदहंकृतिखप्रमुखं तथा नरहरेर्न परं परमार्थत: ॥

“मुकुट, कुण्डल, चूडिय़ाँ तथा नूपुर जैसे स्वर्ण के रूपान्तर स्वर्ण से पृथक् नहीं हैं। इसी तरह से महत्, मिथ्या अहंकार तथा आकाश इत्यादि भौतिक तत्त्व अन्तत: भगवान् नरहरि से पृथक् नहीं हैं।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥