श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 38

 
श्लोक
स यदजया त्वजामनुशयीत गुणांश्च जुषन्
भजति सरूपतां तदनु मृत्युमपेतभग: ।
त्वमुत जहासि तामहिरिव त्वचमात्तभगो
महसि महीयसेऽष्टगुणितेऽपरिमेयभग: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (जीव); यत्—क्योंकि; अजया—भौतिक शक्ति के प्रभाव से; तु—लेकिन; अजाम्—वह भौतिक शक्ति; अनुशयीत—लेट जाती है; गुणान्—अपने गुणों को; च—तथा; जुषन्—धारण करके; भजति—ग्रहण करता है; स रूपताम्—(प्रकृति के गुणों के) सदृश रूप; तत्-अनु—उसके पीछे; मृत्युम्—मृत्यु; अपेत—रहित; भग:—सम्पत्ति का; त्वम्—तुम; उत—दूसरी ओर; जहासि—छोड़ देते हो; ताम्—उस (भौतिक शक्ति) को; अहि:—सर्प; इव—सदृश; त्वचम्— अपनी (पुरानी) खाल, केंचुल; आत्त-भग:—समस्त सम्पत्ति से युक्त; महसि—आपकी आध्यात्मिक शक्तियों में; महीयसे— आपकी महिमा गाई जाती है; अष्ट-गुणिते—आठगुनी; अपरिमेय—असीम; भग:—महानता ।.
 
अनुवाद
 
 मोहिनी प्रकृति सूक्ष्म जीव को, उसका आलिंगन करने के लिए आकृष्ट करती है और फलस्वरूप जीव उसके गुणों से बने रूप धारण करता है। बाद में वह अपने सारे आध्यात्मिक गुण खो देता है और उसे बारम्बार मृत्यु भोगनी पड़ती है। किन्तु आप भौतिक शक्ति से अपने को उसी तरह बचाते रहते हैं, जिस तरह सर्प पुरानी केंचुल त्यागता है। आप आठ योगसिद्धियों से महिमायुक्त स्वामी हैं और असीम ऐश्वर्य का भोग करते हैं।
 
तात्पर्य
 यद्यपि जीव शुद्ध आत्मा है और गुणात्मक दृष्टि से परमेश्वर के ही समान है, किन्तु वह भौतिक मोह (माया) के अज्ञान का आलिंगन करने से नीचे गिरता रहता है। जब वह माया के बहकावों में फँस जाता है, तो वह ऐसे शरीर तथा इन्द्रियाँ अपनाता है, जो उसे विस्मृति की ओर ले जाने वाले होते हैं। माया के तीन गुणों—सतो, रजो, तमो—रूपी कच्चे माल से बने ये शरीर आत्मा को नाना प्रकार के दुखों में फँसा देते हैं, जिनका अन्त मृत्यु तथा पुनर्जन्म में होता है। परमात्मा तथा आत्मा एक ही आध्यात्मिक प्रकृति में साझेदार हैं, किन्तु परमात्मा अपने सूक्ष्म साथी की तरह अज्ञान के जाल में नहीं फँसता। भले ही धुआँ ताँबे के छोटे-से पिघले हुए गोले की चमक को छिपा ले, किन्तु सूर्य का विशाल मंडल उसी प्रकार से आच्छादित नहीं हो सकता। आखिर माया भगवान् की आज्ञाकारिणी दासी है और उनकी अन्तरंगा शक्ति योगमाया का बाहरी अंश है। श्री नारद पञ्चरात्र में श्रुति तथा विद्या के मध्य बातचीत में कहा गया है—
अस्या आवरिकाशक्तिर्महामायाखिलेश्वरी।

यया मुग्धं जगत् सर्वं सर्वे देहाभिमानिन: ॥

“उससे निकली आवरण शक्ति महामाया है, जो प्रत्येक भौतिक वस्तु की नियामक है। सारा ब्रह्माण्ड उसके द्वारा मोहग्रस्त हो जाता है और इस तरह प्रत्येक जीव अपनी पहचान गलती से अपने भौतिक शरीर से करता है।”

जिस प्रकार सर्प अपनी पुरानी केंचुल यह जानते हुए भी निकाल फेंकता है कि यह उसकी असली पहचान का भाग नहीं है, उसी तरह भगवान् भी अपनी बहिरंगा शक्ति माया से सदैव अपने को बचाते हैं। उनके आठ प्रकार के योग-ऐश्वर्यों—यथा अणिमा (सूक्ष्म होने की शक्ति), महिमा (परम विशाल होने की शक्ति) आदि में न तो कोई कमी है, न ही कोई सीमा। अतएव उनकी अद्वितीय तेजस्वी महिमा में भौतिक अंधकार की छाया के प्रवेश करने की गुंजाईश नहीं रह जाती।

जिनमें आध्यात्मिक जीवन की अनुभूति धीरे-धीरे जागृत हो रही होती है उनके लिए कभी कभी उपनिषद् आत्मा या ब्रह्म जैसे सामान्य शब्दों का प्रयोग करते हैं—वे परमात्मा तथा जीवात्मा के भेद को खुल कर स्पष्ट नहीं करते। किन्तु प्राय: वे इस द्वैत को स्पष्ट शब्दों में कहते हैं— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥

“एक ही पीपल वृक्ष की शरण में दो संगी पक्षी बैठते हैं, उनमें से एक वृक्ष के फलों का आस्वाद ले रहा है, जबकि दूसरा खाने से विमुख रह कर अपने मित्र को देखता रहता है।” (श्वेताश्वतर उपनिषद् ४.६) इस दृष्टान्त में दो पक्षी आत्मा तथा परमात्मा हैं, वृक्ष शरीर है और फलों का स्वाद नाना प्रकार के इन्द्रिय-सुख हैं।

श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

नृत्यन्ती तव वीक्षणांगणगता कालस्वभावादिभिर् भावान् सत्त्वरजस्तमोगुणमयान् उन्मीलयन्ती बहून्।

मामाक्रम्य पदा शिरस्यतिभरं सम्मर्दयन्त्यातुरं माया ते शरणं गतोऽस्मि नृहरे त्वामेव तां वारय ॥

“आप अपनी प्रेयसी पर वह दृष्टि डालते हैं, जो काल, जीवों की भौतिक लालसाओं इत्यादि से युक्त है। यह दृष्टि उसके मुख पर नाचती है और इस तरह असंख्य उत्पन्न जीवों को जगाने वाली है, जो सतो, रजो तथा तमो गुणों में जन्म लेते हैं। हे भगवान् नरहरि! आपकी माया ने अपना पाँव मेरे सिर पर रख दिया है और वह मुझे बुरी तरह दबा रही है, जिससे मुझे अपार कष्ट हो रहा है। अब मैं आपके पास शरण के लिए आया हूँ। कृपया उसे रोकें।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥