श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 39

 
श्लोक
यदि न समुद्धरन्ति यतयो हृदि कामजटा
दुरधिगमोऽसतां हृदि गतोऽस्मृतकण्ठमणि: ।
असुतृपयोगिनामुभयतोऽप्यसुखं भगव-
न्ननपगतान्तकादनधिरूढपदाद् भवत: ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
यदि—यदि; न समुद्धरन्ति—उखाड़ नहीं फेंकते; यतय:—संन्यासी लोग; हृदि—अपने हृदयों में; काम—कामेच्छा के; जटा:— चिह्न; दुरधिगम:—साक्षात्कार करना असम्भव; असताम्—अशुद्ध के लिए; हृदि—हृदय में; गत:—प्रवेश करके; अस्मृत— विस्मृत; कण्ठ—गर्दन पर; मणि:—मणि; असु—प्राण; तृप—तृप्ति करने वाला; योगिनाम्—योगियों के लिए; उभयत:— दोनों (संसारों) में; अपि—भी; असुखम्—दुख; भगवन्—हे भगवान्; अनपगत—नहीं गया हुआ; अन्तकात्—मृत्यु से; अनधिरूढ—अप्राप्त; पदात्—जिसका राज्य; भवत:—आपसे ।.
 
अनुवाद
 
 सन्यास-आश्रम के जो सदस्य अपने हृदय से भौतिक इच्छा को समूल उखाड़ कर फेंक नहीं देते, वे अशुद्ध बने रहते हैं और इस तरह आप उन्हें अपने को समझने नहीं देते। यद्यपि आप उनके हृदयों में वर्तमान रहते हैं, किन्तु उनके लिए आप उस मणि की तरह हैं, जिसे मनुष्य गले में पहने हुए भी भूल जाता है कि वह गले में है। हे प्रभु, जो लोग केवल इन्द्रिय-तृप्ति के लिए योगाभ्यास करते हैं, उन्हें इस जीवन में तथा अगले जीवन में भी उस मृत्यु से, जो उन्हें नहीं छोड़ेगी, दण्ड मिलना चाहिए और आपसे भी, जिनके धाम तक, वे नहीं पहुँच सकते।
 
तात्पर्य
 वैराग्य के दिखावा मात्र से कोई व्यक्ति भगवद्धाम में प्रवेश नहीं पा सकता। उसे पूरी तरह से अपना हृदय परिवर्तित करना होगा, जिससे इन्द्रिय-तृप्ति की आत्मनाशी, सूक्ष्म तथा स्थूल, आदतें पूरी तरह नष्ट हो जाँय। असली ऋषि को न केवल अवैध यौन, मांसाहार, नशा तथा जुआ खेलने के विचार तक से दूर रहना चाहिए, अपितु उसे ख्याति तथा पद की इच्छाओं को भी त्यागना होगा। ये सारी बातें भयानक चुनौती स्वरूप हैं, लेकिन कृष्णभावनामृत में असली वैराग्य का फल जीवन-भर प्रयास करते रहने के योग्य है।
मुण्डक उपनिषद् (३.२.२) से इस श्लोक के कथन की पुष्टि होती है—कामान् य: कामयते मन्यमान: स कर्मभिर्जायते तत्र तत्र—यदि एक विचारशील संन्यासी भी सांसारिक इच्छाएँ रखता है, तो उसे विभिन्न परिस्थितियों में अपने कर्मफलों के अनुसार बारम्बार जन्म लेने के लिए विवश होना पड़ेगा। दार्शनिक तथा योगीजन जन्म-मृत्यु से मुक्त होने के लिए कठिन श्रम करते हैं, लेकिन अपनी गर्वीली स्वतंत्रता को समर्पित न करने की इच्छा के कारण उनका ध्यान भगवद्भक्ति से रहित होता है और इस तरह वे संन्यास की सिद्धि से—शुद्ध भगवत्प्रेम से—विहीन रह जाते हैं। यही शुद्ध प्रेम सच्चे वैष्णवों का एकमात्र लक्ष्य होता है, अतएव उसे लाभ, प्रशंसा तथा ख्याति के स्वाभाविक लोभों का सचेत रह कर सामना करना चाहिए। साथ ही निर्विशेष में तादाकार होने की आन्तरिक इच्छा का भी विरोध करना चाहिए जैसाकि श्रील रूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृतसिंधु (१.१.११) में कहा है—

अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्।

आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥

“जब उच्च कोटि की भक्ति उत्पन्न हो, तो मनुष्य को समस्त भौतिक इच्छाओं, एकेश्वरवाद से प्राप्त ज्ञान तथा सकाम कर्म से रहित होना चाहिए। भक्त को चाहिए कि वह कृष्ण की सदैव अनुकूल सेवा करे, जैसाकि कृष्ण चाहते हैं।”

जो लोग अपनी इन्द्रियों को प्रसन्न रखने के लिए ही कठिन योगाभ्यास करते हैं, उन्हें दीर्घकालीन कष्ट भोगना ही पड़ेगा। भूख, रोग, बुढ़ापा, दुर्घटना से चोट, अन्यों से हिंसा—ये कष्ट के असंख्य प्रकारों में से कुछेक कष्ट हैं, जिन्हें इस संसार में कम-ज्यादा मात्रा में उठाना पड़ सकता है। अन्तत: मृत्यु प्रतीक्षा करती रहती है, जिसके बाद पाप कार्यों के लिए पीड़ाजनक दंड मिलता है। विशेष रूप से वे, जो अन्यों के जीवन के बल पर स्वतंत्र रूप से ऐन्द्रिय भोग-विलास करते हैं, वे कल्पनातीत कठोर दण्ड की आशा रख सकते हैं। लेकिन भौतिक जीवन का सबसे बड़ा कष्ट इस जीवन में दुर्भाग्य या मृत्यु के बाद नरक भेजा जाना न होकर, भगवान् से अपने नित्य सम्बन्ध की विस्मृति से उत्पन्न रिक्तता है।

श्रील श्रीधर स्वामी स्तुति करते हैं—

दम्भन्यासमिषेण वञ्चितजनं भोगैकचिन्तातुरं सम्मुह्यन्तमहरनिशं विरचितोद्योगक्लमैराकुलम्।

आज्ञालंघिनमज्ञमज्ञजनता सम्माननासन्मदं दीनानाथ दयानिधान परमानन्द प्रभो पाहि माम् ॥

“जो वञ्चक संन्यास के बहाने अपने को धोखा देता है, वह केवल इन्द्रिय-भोग का चिन्तन करने के कारण निरन्तर कष्ट पाता रहता है। वह दिन-रात मोहग्रस्त हुआ अपने लिए किए गए अथक प्रयासों के विफल होने से निराश होता है। यह मूर्ख आपके नियमों का उल्लंघन करता है और अन्य मूर्खों से आदर पाने के लोभ में भ्रष्ट हो जाता है। हे पतितों के रक्षक, हे दया के देने वाले, हे परम आनन्दमय स्वामी! आप उस व्यक्ति को, जो कि मैं हूँ, बचाइये।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥