श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 40

 
श्लोक
त्वदवगमी न वेत्ति भवदुत्थशुभाशुभयो-
र्गुणविगुणान्वयांस्तर्हि देहभृतां च गिर: ।
अनुयुगमन्वहं सगुण गीतपरम्परया
श्रवणभृतो यतस्त्वमपवर्गगतिर्मनुजै: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
त्वत्—तुम्हें; अवगमी—जानने वाला; न वेत्ति—परवाह नहीं करता; भवत्—आप से; उत्थ—उठ कर; शुभ-अशुभयो:—शुभ तथा अशुभ का; गुण-विगुण—अच्छे-बुरे का; अन्वयान्—लक्षणों को; तर्हि—फलस्वरूप; देह-भृताम्—देहधारी जीवों का; च—भी; गिर:—शब्द; अनु-युगम्—हर युग में; अनु-अहम्—प्रतिदिन; स-गुण—हे गुणों से युक्त; गीत—गीत की; परम्परया—परम्परा से; श्रवण—सुन कर के; भृत:—ले जाया गया; यत:—इसके कारण; त्वम्—तुम; अपवर्ग—मोक्ष का; गति:—चरम लक्ष्य; मनुजै:—मनुष्यों द्वारा, मनु के वंशजों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 जब मनुष्य आपका साक्षात्कार कर लेता है, तो वह अपने विगत पवित्र तथा पापमय कर्मों से उदित होने वाले अच्छे तथा बुरे भाग्य की परवाह नहीं करता, क्योंकि इस अच्छे तथा बुरे भाग्य को नियंत्रित करने वाले एकमात्र आप हैं। ऐसा स्वरूपसिद्ध भक्त इसकी भी परवाह नहीं करता कि सामान्य जन उसके विषय में क्या कह रहे हैं। वह प्रतिदिन अपने कानों को आपके यशों से भरता रहता है, जो हर युग में मनु के वंशजों की अविच्छिन्न परम्परा से गाये जाते हैं। इस तरह आप उसका चरम मोक्ष बन जाते हैं।
 
तात्पर्य
 श्लोक ३९ में स्पष्ट कहा गया है कि निर्विशेषवादी सन्यासियों को जन्म-जन्मांतर कष्ट भोगना होगा। कोई यह प्रश्न कर सकता है कि क्या यह कष्ट उचित है, क्योंकि उस संन्यासी में भक्ति की प्रवृत्ति हो या न हो, उसके पद के कारण उसे कष्ट से विमुक्त रखा जाना चाहिये? जैसाकि श्रुति मंत्र कहता है—एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्—ब्राह्मण की शाश्वत महिमा उसके किसी कर्म से कभी घटती-बढ़ती नहीं है (बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४-२८)। इस उठाये गये आक्षेप के प्रत्युत्तर में ही साक्षात् वेद यह स्तुति कर रहे हैं।
निर्विशेषवादी ज्ञानी तथा योगी कर्मफल से पूरी छूट पाने के योग्य नहीं होते, क्योंकि यह छूट तो केवल उनके लिए सुरक्षित होती है, जो त्वदवगमी हैं—अर्थात् शुद्ध भक्त जो भगवान् विषयक कथाओं को सुनने तथा उनका कीर्तन करने में निरन्तर लगे रहते हैं। ये भक्त अपने कठोर कृष्णभावनामृत के द्वारा भगवान् के चरणकमलों पर दृढ़ता से टिके रहते हैं, अतएव उन्हें वेदों की विधियों तथा निषेधों का दृढ़ता से पालन करने की आवश्यकता नहीं रहती। वे भगवान् की प्रसन्नता के लिए ही कर्म करते हैं, अतएव वे निर्भय होकर इन कर्मों के अच्छे तथा बुरे बाहरी फलों की उपेक्षा कर सकते हैं। इसी तरह वे अपनी बड़ाई या बुराई में कहे गये अन्यों के शब्दों की भी उपेक्षा कर सकते हैं। एक विनीत वैष्णव, जो कि संकीर्तन के आनन्द में लीन रहता है, अपनी प्रशंसा की जिसे वह गलत मानता है, परवाह नहीं करता, परन्तु अपनी आलोचना प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करता है, क्योंकि इसे वह उपयुक्त समझता है।

भगवान् की महिमा का प्रामाणिक कीर्तन “मनु के पुत्रों” से निष्ठापूर्वक सुन कर प्राप्त किया जाता है, क्योंकि यह युग-युगों से चली आ रही सन्त वैष्णवों की शिष्य-परम्परा है। ये ऋषि मनुष्य के पूर्वज स्वायंभुव मनु के उदाहरण का अनुकरण करते हैं—

अयातयामास्तस्यासन् यामा: स्वान्तरयापना:।

शृण्वतो ध्यायतो विष्णो: कुर्वतो ब्रुवत: कथा: ॥

“यद्यपि स्वायम्भुव का दीर्घ जीवन धीरे-धीरे समाप्त हो रहा था, जो एक मन्वन्तर युग का था, किन्तु वह व्यर्थ में नहीं बीता, क्योंकि वह भगवान् की लीलाओं को सुनने, मनन करने, लिखने तथा उच्चारण करने में सदैव लगा रहता था।” (भागवत ३.२२.३५) यदि कोई नवदीक्षित भक्त भी अपने पूर्व दुर्गुणों के कारण उचित आचरण के मानदण्ड से नीचे गिरता है, तब भी सर्व-दयामय भगवान् उसका परित्याग नहीं करेंगे। जैसाकि भगवान् कृष्ण कहते हैं— तैरहं पूजनीयो वै भद्रकृष्णनिवासिभि:।

तद्धर्मगतिहीना ये तस्यां मयि परायणा: ॥

कलिना ग्रसिता ये वै तेषां तस्यामवस्थिति:।

यथा त्वं सह पुत्रैश्च यथा रुद्रो गणै सह।

यथा श्रियाभियुक्तोऽहं तथा भक्तो मम प्रिय: ॥

“जो लोग भद्रकृष्ण (मथुरा जनपद) में रहते हैं, उनके लिए मैं ही पूजनीय हूँ। यदि उस स्थान के निवासी किसी पवित्र स्थान में पालन किये जाने वाले धार्मिक नियमों का ढंग से अनुशीलन नहीं भी करते, तो भी वे वहाँ रहने के कारण मेरी भक्ति में लगे रहते हैं। चाहे कलि (आधुनिक कलहपूर्ण युग) भी उन्हें अपने चंगुल में क्यों न कर ले, तो भी उन्हें इस स्थान में रहने का श्रेय मिलता है। मथुरावासी मेरा भक्त मुझे उतना ही प्रिय है, जितना कि आप (ब्रह्मा) तथा आपके पुत्र—रुद्र तथा उनके अनुयायी—एवं देवी लक्ष्मी तथा स्वयं मैं।”

श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

अवगमं तव मे दिश माधव स्फुरति यन्न सुखासुखसंगम:।

श्रवणवर्णनभावमथापि वा न हि भवामि यथा विधिकिंकर: ॥

“हे माधव! ऐसा करें कि मैं आपको समझूँ, जिससे मैं भौतिक सुख तथा दुख के पाश का और अधिक अनुभव न कर सकूँ। या फिर अच्छा हो कि आप अपने विषय में श्रवण तथा कीर्तन करने का आस्वाद मुझे प्रदान करें। उस स्थिति में मैं आनुष्ठानिक आधिदेशों का दास नहीं रह जाऊँगा।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥