श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 41

 
श्लोक
द्युपतय एव ते न ययुरन्तमनन्ततयात्वमपि यदन्तराण्डनिचया ननु सावरणा: ।
ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय-स्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधना: ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
द्यु—स्वर्ग के; पतय:—स्वामी; एव—भी; ते—तुम्हारा; न ययु:—नहीं पहुँच सकते; अन्तम्—अन्त; अनन्ततया—अनन्त होने से; त्वम्—तुम; अपि—भी; यत्—जिसको; अन्तर—भीतर; अण्ड—ब्रह्माण्डों के; निचया:—समूह; ननु—निस्सन्देह; स— सहित; आवरना:—अपने बाहरी खोल; खे—आकाश में; इव—सदृश; रजांसि—धूल के कण; वान्ति—इधर-उधर उड़ते हैं; वयसा सह—कालचक्र के साथ; यत्—क्योंकि; श्रुतय:—वेद; त्वयि—तुममें; हि—निस्सन्देह; फलन्ति—फलते हैं; अतत्— ब्रह्म से भिन्न है, जो, उसका; निरसनेन—निरस्त करने से; भवत्—आप में; निधना:—जिनका अन्तिम निष्कर्ष ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि आप असीम हैं, अत: न तो स्वर्ग के अधिपति, न ही स्वयं आप अपनी महिमा के छोर तक पहुँच सकते हैं। असंख्य ब्रह्माण्ड अपने अपने खोलों में लिपटे हुए कालचक्र के द्वारा आपके भीतर घूमने के लिए उसी तरह बाध्य हैं, जिस तरह कि आकाश में धूल के कण इधर- उधर उड़ते रहते हैं। श्रुतियाँ आपको अपने अन्तिम निष्कर्ष के रूप में प्रकट करके सफल बनती हैं, क्योंकि वे आपसे पृथक् हर वस्तु को अपनी निरसन विधि से विलुप्त कर देती हैं।
 
तात्पर्य
 अपनी अन्तिम स्तुति में साक्षात् वेद इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सारी श्रुतियाँ अपने विविध शाब्दिक तथा अलंकारिक संदर्भों द्वारा भगवान् की पहचान और उनके निजी गुणों तथा शक्तियों का ही वर्णन करती हैं। उपनिषद् तो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं—यद् ऊर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं भवच्च भविष्यच्च—हे गर्गपुत्री! उसकी महानता हमारे ऊपर स्वर्ग की प्रत्येक वस्तु को, पृथ्वी के नीचे की प्रत्येक वस्तु को, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच की प्रत्येक वस्तु को तथा प्रत्येक वस्तु, जो कभी थी, अब है या आगे होगी, उन सबको समाविष्ट करने वाली है (बृहदारण्यक उपनिषद् ३.८.४)।
श्रुतियों की इस अन्तिम स्तुति के अर्थ पर प्रकाश डालने के लिए श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर भगवान् नारायण तथा साक्षात् वेदों के बीच हुई निम्नलिखित वार्ता प्रस्तुत करते हैं— वेदों ने कहा: “ब्रह्मा तथा स्वर्गलोकों के अन्य शासक अभी तक आपके यश के अन्तिम छोर तक नहीं पहुँच पाये हैं। तो हम क्या कर सकते हैं, क्योंकि इन महान् देवताओं की तुलना में हम तुच्छ हैं?”

भगवान् नारायण ने कहा: “नहीं, तुम श्रुतियाँ इस ब्रह्माण्ड पर शासन करने वाले देवताओं की अपेक्षा अधिक दिव्यदृष्टि वाली हो। यदि तुम नहीं रुकोगी तो तुम मेरी महिमा का पार पा सकती हो।”

“लेकिन आप भी अपनी सीमा नहीं पा सकते।”

“यदि ऐसा ही है, तो फिर तुम सब मुझे सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान क्यों कहती हो?” “हमने तो यह निष्कर्ष निकाला है कि आप में ये गुण विद्यमान हैं; इस आधार पर निकाला है कि आप असीम हैं। निस्सन्देह यदि कोई व्यक्ति ऐसी वस्तु से अनजान है, जिसका अस्तित्व ही नहीं होता जैसे कि खरहे के सींग, तो इसके कारण वह अपनी सर्वज्ञता से विपथ नहीं होता और यदि वह ऐसी न होने वाली वस्तु को खोज नहीं पाता तो इससे उसकी सर्वशक्तिमत्ता सीमित नहीं हो जाती। आप इतने विशाल हैं कि आपके भीतर ब्रह्माण्डों के समूह के समूह तैरते रहते हैं। इनमें से हर ब्रह्माण्ड भौतिक तत्त्वों से बने सात आवरणों से घिरा रहता है और इनमें से प्रत्येक एक केन्द्रीय आवरण अपने से भीतर वाले से दस गुना बड़ा होता है। यद्यपि हम आपके विषय में सत्य का पूरा वर्णन कभी नहीं कर पायेंगी, किन्तु यह घोषित करके कि आप ही वेदों के असली विषय हैं, अपने अस्तित्व को सफल बनाती हैं।” “लेकिन तुम असन्तुष्ट क्यों लगती हो?”

“क्योंकि श्रील वेदव्यास ने वेदों में ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के दिव्य अस्तित्व के विषय में संक्षिप्त विवरण दिया है। जब उन्होंने ब्रह्म विषयक अपने वर्णन को विशद बनाने की आवश्यकता अनुभव की, तो उन्होंने ब्रह्म के निर्विशेष पक्ष को ही चुना जो तत् है और ब्रह्म का, उनसे भिन्न जो कुछ है, उसे नकार कर ही, वर्णन किया। जिस तरह किसी खेत में अकस्मात् बिखेरे गये मणियों को अनावश्यक पत्थर एवं घास-फूस हटा कर बटोरा जा सकता है, उसी तरह माया तथा उसकी सृष्टियों के दृश्य जगत में ब्रह्म को निरसन विधि द्वारा खोजा जा सकता है। चूँकि वेद जगत में प्रत्येक वस्तु, उसकी सत्ता, गुण इत्यादि को आदि से अन्त तक गिना नहीं सकते और चूँकि ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् विषयक सत्य इतने पर भी अछूता रहता रहेगा, अत: यदि हम सभी वस्तुओं का वर्णन भी करें और फिर उनको त्याग दें, तो भी हम जाँच-पड़ताल की इस विधि से आपकी अन्तिम परिभाषा तक नहीं पहुँच सकतीं। आपकी कृपा से ही हम परम अगम्य ब्रह्म आपके पास तक पहुँचने का प्रयास कर सकती हैं।”

श्रुतियों के ऐसे अनेक कथन हैं, जो अतन्निरसनम् अर्थात् अधम वस्तुओं से ब्रह्म को पहचानने और अलग बताने की विधि का कार्य करते हैं। उदाहरणार्थ, बृहदारण्यक उपनिषद् का कथन है (३.८.८)—अस्थूलमनणु अह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वनाकाशमसंगमरसमगन्धमचक्षुष्कम- श्रोत्रमगमनोऽतेजस्कमप्राणमसुखममात्रमनन्तरमबाह्यम्—“यह न तो बड़ा है न छोटा, न नाटा न लम्बा, न गर्म न ठंडा, न छाया में न अंधकार में। न ही यह वायु है न आकाश। यह किसी वस्तु के सम्पर्क में नहीं है। इसमें भीतर या बाहर कोई स्वाद, गंध, आँखें, कान, गति, शक्ति, प्राण, आनन्द, माप नहीं है।” केन उपनिषद (३) की घोषणा है—अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि—जो ज्ञात है और अभी जिसे ज्ञात होना है उससे ब्रह्म भिन्न है। तथा कठ उपनिषद् का कथन है (२.१४)—अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात्—ब्रह्म धर्म तथा अधर्म, पाप तथा पुण्यकर्मों के क्षेत्र से बाहर है। भाषाविज्ञान तथा तर्क के नियमों के अनुसार निषेध असीम नहीं हो सकता, इसका कोई प्रतिपक्ष भी होना चाहिए, जिसका यह निषेध होता है। वेदों के अतन्निरसनम् में उनके इस निषेध का कि कोई भी वस्तु पूर्णतया सत्य है, इसका प्रतिपक्ष भगवान् श्रीकृष्ण हैं।

श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

द्युपतयो विदुरन्तमनन्त ते न च भवान् न गिर: श्रुतिमौलय:।

त्वयि फलन्ति यतो नम इत्यतो जय जयेति भजे तव तत्पदम् ॥

“हे अनन्त! स्वर्ग के देवता आपकी सीमा नहीं जानते, यहाँ तक कि आप भी इसे नहीं जानते। चूँकि सर्वोच्च श्रुतियों के दिव्य शब्द आपको प्रकट करने से फलदायी हो जाते हैं, अतएव मैं आपको नमस्कार करता हूँ। इस तरह मैं “आपकी जय हो, आपकी जय हो” यह कह कर ब्रह्म के रूप में आपकी पूजा करता हूँ।”

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥