श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 43

 
श्लोक
इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रस: ।
समुद्‍धृत: पूर्वजातैर्व्योमयानैर्महात्मभि: ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; अशेष—समस्त; समाम्नाय—वेदों; पुराण—तथा पुराणों का; उपनिषत्—गुह्य रहस्य; रस:—रस; समुद्धृत:—निचोड़ा हुआ; पूर्व—विगत भूत में; जातै:—उत्पन्न हुओं से; व्योम—ब्रह्माण्ड के उच्चतर भागों में; यानै:—यात्रा करने वाले; महा-आत्मभि:—सन्त-पुरुषों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह उच्चतर स्वर्गलोकों में विचरण करने वाले प्राचीन सन्तों ने सारे वेदों तथा पुराणों के इस अमृतमय तथा गुह्य रस को निचोड़ लिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥