श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 44

 
श्लोक
त्वं चैतद् ब्रह्मदायाद श्रद्धयात्मानुशासनम् ।
धारयंश्चर गां कामं कामानां भर्जनं नृणाम् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम; च—तथा; एतत्—यह; ब्रह्म—ब्रह्मा के; दायाद—हे उत्तराधिकारी (नारद); श्रद्धया—श्रद्धापूर्वक; आत्म- आनुशासनम्—आत्मा के विषय में उपदेशों पर; धारयन्—ध्यान करते हुए; चर—विचरण करते हैं; गाम्—पृथ्वी पर; कामम्— अपनी इच्छानुसार; कामानाम्—भौतिक इच्छाओं को; भर्जनम्—जो जलाने वाले हैं; नृणाम्—मनुष्यों की ।.
 
अनुवाद
 
 और चूँकि तुम पृथ्वी पर इच्छानुसार विचरण करते हो, अत:, हे ब्रह्मा-पुत्र, तुम्हें आत्मविज्ञान विषयक इन उपदेशों पर श्रद्धापूर्वक ध्यान करना चाहिए, क्योंकि ये सारे मनुष्यों की भौतिक इच्छाओं को भस्म कर देते हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा के पुत्र नारद ने यह विवरण श्री नारायण ऋषि से सुना। ब्रह्मदायाद का यह भी अर्थ
है कि नारद ने बिना प्रयास के ही ब्रह्म पा लिया, मानो यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥