श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 46

 
श्लोक
श्रीनारद उवाच
नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलकीर्तये ।
यो धत्ते सर्वभूतानामभवायोशती: कला: ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-नारद: उवाच—श्री नारद ने कहा; नम:—नमस्कार; तस्मै—उस; भगवते—भगवान्; कृष्णाय—कृष्ण को; अमल— निष्कलुष; कीर्तये—जिसकी कीर्ति; य:—जो; धत्ते—प्रकट करता है; सर्व—सारे; भूतानाम्—जीवों के; अभवाय—मुक्ति हेतु; उशती:—सर्व-आकर्षक; कला:—अंश ।.
 
अनुवाद
 
 श्री नारद ने कहा : मैं उन निर्मल कीर्ति वाले भगवान् कृष्ण को नमस्कार करता हूँ, जो अपने सर्व-आकर्षक साकार अंशों को इसलिए प्रकट करते हैं, जिससे सारे जीव मुक्ति प्राप्त कर सकें।
 
तात्पर्य
 श्रील श्रीधर स्वामी की टिप्पणी है कि श्री नारायण ऋषि को नारद द्वारा भगवान् कृष्ण के अवतार रूप में सम्बोधित किया जाना सर्वथा उपयुक्त है, क्योंकि यह श्रीमद्भागवत के निम्न कथन (१.३.२८) के अनुकूल है—एते चांशकला: पुंस:/कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्—उपर्युक्त सारे अवतार (नारायण ऋषि सहित) या तो स्वांश हैं या भगवान् के स्वांश के अंश हैं, किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण आदि भगवान् हैं।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने इस श्लोक की टीका में भगवान् नारायण ऋषि द्वारा पुछवाया है, “तुम अपने समक्ष खड़े अपने गुरु मुझे नमस्कार न करके कृष्ण को क्यों नमस्कार कर रहे हो?” नारद अपने कार्य की यह कह कर व्याख्या करते हैं कि भगवान् कृष्ण बद्धजीवों के भौतिक जीवन का अन्त करने के लिए श्री नारायण ऋषि जैसे सर्वाकर्षक रूप में अवतरित होते हैं। अतएव श्रीकृष्ण को नमस्कार करने से नारद नारायण ऋषि तथा ईश्वर के अन्य समस्त स्वरूपों का भी आदर करते हैं।

नारद की यह स्तुति वह अमृत है, जिसे उन्होंने साक्षात् वेदों की स्तुतियों से निकाला है और ये स्तुतियाँ वेदों तथा पुराणों के समस्त रहस्यों के मधुर समुद्र से मंथन करके निकाली गई हैं। जैसी कि गोपालतापनी उपनिषद् (पूर्व ५०) की संस्तुति है—तस्मात् कृष्ण एव परो देवस्तं ध्यायेत् तं रसयेत् तं भजेत् तं यजेद् इति। ॐ तत्सत्। “इसलिए कृष्ण परम ईश्वर हैं। मनुष्य को चाहिए कि उन्हीं का ध्यान करे, उन्हीं से प्रेम के आदान-प्रदान का स्वाद ले, उन्हें ही पूजे और उन्हीं को यज्ञ अर्पित करे।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥