श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 50

 
श्लोक
योऽस्योत्प्रेक्षक आदिमध्यनिधने योऽव्यक्तजीवेश्वरो
य: सृष्ट्वेदमनुप्रविश्य ऋषिणा चक्रे पुर: शास्ति ता: ।
यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्त: कुलायं यथा
तं कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्रं हरिम् ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; अस्य—इस (ब्रह्माण्ड) का; उत्प्रेक्षक:—निगरानी रखने वाला; आदि—इसके प्रारम्भ में; मध्य—बीच में; निधने— तथा अन्त में; य:—जो; अव्यक्त—अप्रकट (प्रकृति) का; जीव—तथा जीवों का; ईश्वर:—स्वामी; य:—जो; सृष्ट्वा—उत्पन्न करके; इदम्—इस (ब्रह्माण्ड) में; अनुप्रविश्य—प्रवेश करके; ऋषिणा—जीवात्मा के साथ; चक्रे—उत्पन्न किया; पुर:— शरीर; शास्ति—नियमन करता है; ता:—उन्हें; यम्—जिसको; सम्पद्य—शरणागत होकर; जहाति—त्याग देता है; अजाम्— अजन्मा (प्रकृति) का; अनुशयी—आलिंगन करते हुए; सुप्त:—सोया पुरुष; कुलायम्—उसका शरीर; यथा—जिस तरह; तम्—उस पर; कैवल्य—अपनी शुद्ध आध्यात्मिक स्थिति से; निरस्त—दूर रखा हुआ; योनिम्—जन्म; अभयम्—निर्भयता के लिए; ध्यायेत्—ध्यान करना चाहिए; अजस्रम्—सतत; हरिम्—भगवान् कृष्ण को ।.
 
अनुवाद
 
 वह ही स्वामी है, जो इस ब्रह्माण्ड की निरन्तर निगरानी करता है, जो इसके प्रकट होने के पूर्व, उसके बीच में तथा उसके बाद विद्यमान रहता है। वह अव्यक्त भौतिक प्रकृति तथा आत्मा दोनों का स्वामी है। इस सृष्टि को उत्पन्न करके, वह इसके भीतर प्रवेश कर जाता है और प्रत्येक जीव के साथ रहता है। वहाँ पर वह भौतिक देहों की सृष्टि करता है और फिर उनके नियामक के रूप में रहने लगता है। उनकी शरण में जाकर मनुष्य माया के आलिंगन से बच सकता है, जिस तरह स्वप्न देख रहा व्यक्ति अपने शरीर को भूल जाता है। जो व्यक्ति भय से मुक्ति चाहता है, उसे चाहिए कि उस भगवान् हरि का निरन्तर ध्यान धरे, जो सदैव सिद्धावस्था में रहता है और कभी भी भौतिक जन्म नहीं लेता।
 
तात्पर्य
 जीवात्मा की सृष्टि करते समय भगवान् सुप्त ब्रह्माण्ड पर दृष्टि डाल कर उनकी सारी आवश्यकताएँ पूरी करते हैं। वे उन जीवों को जो सकाम कर्मी हैं भौतिक कार्य में सफलता पाने के लिए आवश्यक बुद्धि तथा इन्द्रियाँ प्रदान करते हैं। जो दिव्य ज्ञान की खोज करते हैं उन्हें वे वह बुद्धि प्रदान करते हैं, जिससे वे ईश्वर के आध्यात्मिक तेज में लीन होकर मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। और भक्तों को तो वे वह समझ देते हैं, जिससे उन्हें शुद्ध भगवद्भक्ति प्राप्त हो।
इन विविध सुविधाओं की व्यवस्था करने के लिए भगवान् प्रकृति को उत्प्रेरित करते हैं कि वह ब्रह्माण्ड के विकास का कार्य प्रारम्भ करे। इस प्रकार भगवान् सृष्टि के निमित्त कारणम् अर्थात् प्रभावी कारण हैं। वे इसके उपादान कारण अर्थात अवयव कारण भी हैं, क्योंकि प्रत्येक वस्तु उन्हीं से उद्भूत होती है और वे ही अकेले ऐसे हैं, जो सृजित जगत के पूर्व, बीच में तथा उसके अन्त में सदा-सर्वदा वर्तमान रहते हैं। चतु:श्लोकी भागवत में भगवान् नारायण स्वयं कहते हैं—

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत् सदसत्परम्।

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्यते सोऽस्म्यहम् ॥

“मैं ही वह भगवान् हूँ जो सृष्टि के पूर्व था जब मेरे सिवा और कुछ भी न था। न ही इस सृष्टि की कारणस्वरूप प्रकृति ही थी। इस समय जो तुम देखते हो, वह भी मैं भगवान् ही हूँ और प्रलय के बाद जो कुछ शेष रहेगा, वह भी मैं भगवान् ही हूँ।” (भागवत २.९.३३) आदि माया तथा जीवात्मा को क्रमश: सृष्टि के उपादान तथा निमित्त कारण कहा जा सकता है किन्तु भगवान् अन्तत: इन दोनों ही के उद्गम हैं।

जब तक जीवात्मा भगवान् की दया को स्वीकार नहीं करता वह अनुशयी है अर्थात् माया के आलिंगन में असहाय की तरह बँधा हुआ रहता है। जब वह भगवान् की पूजा करने लगता है, तो वह भिन्न अर्थ में अनुशयी रहता है—भगवान् के चरणकमलों में प्रणाम करने के लिए दण्ड की तरह गिरा हुआ रहता है। इस समर्पण से आत्मा अपने मोह को आसानी से उतार फेंकता है। यद्यपि मुक्तात्मा अब भी भौतिक शरीर में रहता प्रतीत होता है, किन्तु उससे उसका सम्बन्ध बाहरी दिखावे का ही रहता है। वह उसकी ओर उससे भी कम ध्यान देता है, जितना कि सोया हुआ व्यक्ति स्वप्नलोक में खोये रहने से अपने शरीर के प्रति देता है।

मनुष्य अपने भौतिक शरीर से अपनी झूठी पहचान करना छोडऩे से अज्ञान का परित्याग करता है। कभी कभी इस अवस्था को प्राप्त करने में कई जन्मों तक कठोर प्रयास करना पड़ सकता है, किन्तु किसी-किसी के साथ भगवान् अपनी विशेष कृपा दिखा सकते हैं और ऐसा करते समय वे इसकी परवाह नहीं करते कि उस जीवात्मा ने नियमित अभ्यास से कितना पुण्य संचित किया है। श्री भीष्मदेव के शब्दों में—यमिह निरीक्ष्य हता गता: स्वरूपम्—जिन्होंने कृष्ण को कुरुक्षेत्र युद्ध-स्थल में देखा उन्होंने मारे जाने के बाद अपना मूल स्वरूप प्राप्त कर लिया। (भागवत १.९.३९) अघ, बक तथा केशी जैसे असुरों को बिना कोई आध्यात्मिक अभ्यास किये ही कृष्ण ने मोक्ष प्रदान किया—यह इस बात का संकेत है कि वे आदि भगवान् के अद्वितीय पद पर स्थित हैं। यह जान कर हमें अपना सारा भय तथा संशय ताक पर रख कर भक्ति की प्रक्रिया में दत्तचित्त होना चाहिए।

इस अध्याय की टीका के अन्तिम शब्दों के रूप में श्रील श्रीधर स्वामी लिखते हैं— सर्वश्रुतिशिरोरत्ननीराजितपदाम्बुजम्।

भोगयोगप्रदं वन्दे माधवं कर्मिनम्रयो: ॥

“श्रुतियों में सर्वश्रेष्ठ श्रुतियाँ अपने तेज से भगवान् माधव के चरणकमलों की आरती उतारती हैं। मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ, जो भौतिक कर्मियों द्वारा सम्मानित भौतिक भोग प्रदान करने वाले हैं और जो उन्हें आदरपूर्वक शीश झुकाते हैं, उन्हें वे अपने साथ दिव्य सम्बन्ध प्रदान करते हैं।”

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर भी इस अवसर का लाभ उठाकर यह विनीत प्रार्थना करते हैं— हे भक्ता द्वार्ययं चञ्चद्वालधी रौति वो मनाक्।

प्रसादं लभतां यस्माद् विशिष्ट: श्वेवनाथति ॥

“हे भक्तो! यह निरीह प्राणी आपके द्वार पर अपनी पूँछ हिलाता और भौंकता हुआ खड़ा है। कृपा करके इसे थोड़ा प्रसादम् दे दें, जिससे यह कुत्तों में अद्वितीय बन कर अपने मालिक के तौर पर सर्वश्रेष्ठ स्वामी पा सके।” यहाँ पर आचार्य अपने ही नाम पर व्यंग्य करते हैं विश (इष्ट:) “अद्वितीय,” श्व (इव) “कुत्ते जैसा” नाथ (अति) “स्वामी वाला” वैष्णव दीनता की ऐसी पूर्णता है।

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध के अन्तर्गत “साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति” नामक सत्तासिवें अध्याय के श्रील भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के विनीत सेवकों द्वारा रचित तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥