श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 9

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
स्वायम्भुव ब्रह्मसत्रं जनलोकेऽभवत् पुरा ।
तत्रस्थानां मानसानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; स्वायम्भुव—हे स्व-जन्मा ब्रह्मा के पुत्र; ब्रह्म—दिव्य ध्वनि के उच्चारण से सम्पन्न; सत्रम्—यज्ञ; जन-लोके—जनलोक में; अभवत्—हुआ; पुरा—भूतकाल में; तत्र—वहाँ; स्थानाम्—वहाँ रहने वालों के; मानसानाम्—मन से उत्पन्न (ब्रह्मा) के; मुनीनाम्—मुनियों के मध्य; ऊर्ध्व—ऊपर की ओर (गति करने वाले); रेतसाम्—वीर्य वाले ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : हे स्वजन्मा ब्रह्मा के पुत्र, एक बार बहुत समय पहले, जनलोक में रहने वाले विद्वान मुनियों ने दिव्य ध्वनि का उच्चारण करते हुए एक महान् ब्रह्म यज्ञ सम्पन्न किया। ये सारे मुनि, जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, पूर्ण ब्रह्मचारी थे।
 
तात्पर्य
 श्रील श्रीधर स्वामी की व्याख्या है कि यहाँ पर सत्रम् शब्द वैदिक यज्ञ का द्योतक है, जिसमें भाग लेने वाले सारे लोग पुरोहित की
तरह कार्य करने के लिए समान रूप से पात्र होते हैं। यहाँ पर, जनलोक का प्रत्येक ऋषि ब्रह्म के विषय में अच्छी तरह बोल सकता था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥