श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में भगवान् नारायण के साकार तथा निर्विशेष पक्षों की महिमा गाने वाली, साक्षात् वेदों द्वारा स्तुतियाँ प्रस्तुत की गई हैं।
राजा परीक्षित ने श्रील शुकदेव गोस्वामी से पूछा कि वेद किस तरह परब्रह्म का प्रत्यक्ष रूप से उल्लेख कर सकते हैं, जबकि वेदों में तीन गुणों द्वारा नियंत्रित भौतिक जगत का वर्णन है और ब्रह्म इन तीनों गुणों से सर्वथा परे हैं। इसके उत्तर में शुकदेव गोस्वामी ने बदरिकाश्रम में श्री नारायण ऋषि तथा नारद मुनि के बीच हुई एक प्राचीन आकस्मिक भेंट का वर्णन किया। विचरण करते हुए उस पवित्र कुटिया में पहुँच कर नारद ने देखा कि भगवान् कलाप नामक निकटवर्ती ग्राम के उच्च स्तर के वासियों से घिरे हुए हैं। नारायण ऋषि तथा उनके संगियों को नमस्कार करके नारद ने उनसे यही प्रश्न पूछा। उत्तर में नारायण ऋषि ने इसका वर्णन किया कि किस तरह बहुत पहले जनलोक में रह रहे महर्षियों के बीच इसी प्रश्न पर वाद-विवाद हुआ था। एक बार परम सत्य के स्वभाव को जानने के इच्छुक, इन ऋषियों ने सनन्दन कुमार को इस विषय पर बोलने के लिए चुना था। सनन्दन ने उन्हें बतलाया कि किस तरह सृष्टि के पूर्व अनेक देहधारी वेदों ने, भगवान् नारायण के श्वास लेने से उत्पन्न प्रथम उद्भवों के रूप में, उनकी महिमा विषयक स्तुतियाँ कीं। तब सनन्दन ने ये विस्तृत स्तुतियाँ सुनाईं।

जनलोक के निवासी सनन्दन से देहधारी वेदों की स्तुतियाँ सुनकर परम प्रसन्न हुए। इन स्तुतियों ने परब्रह्म के असली स्वभाव के बारे में प्रकाश डाला। तब उन्होंने सनन्दन का आदर किया और उनकी पूजा की। नारद मुनि श्री नारायण ऋषि के मुख से यह वृत्तान्त सुनकर अतीव प्रसन्न हुए। इस तरह नारद ने भगवान् को नमस्कार किया और फिर अपने शिष्य वेदव्यास को देखने गये, जिनको उन्होंने सुनी हुई सारी बातें बतला दीं।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥