श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 9: माता यशोदा द्वारा कृष्ण का बाँधा जाना  »  श्लोक 11

 
श्लोक
कृतागसं तं प्ररुदन्तमक्षिणी
कषन्तमञ्जन्मषिणी स्वपाणिना ।
उद्वीक्षमाणं भयविह्वलेक्षणं
हस्ते गृहीत्वा भिषयन्त्यवागुरत् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
कृत-आगसम्—अपराधी; तम्—कृष्ण को; प्ररुदन्तम्—रोते हुए; अक्षिणी—उनकी आँखें; कषन्तम्—मलते हुए; अञ्जत्- मषिणी—जिसकी आँखों में लगा काजल आँसुओं के साथ सारे मुँह में फैल गया; स्व-पाणिना—अपने हाथ से; उद्वीक्षमाणम्— जो माता यशोदा द्वारा इस मुद्रा में देखे गये; भय-विह्वल-ईक्षणम्—अपनी माता के भय से जिसकी आँखें भयभीत दिखाई दीं; हस्ते—हाथ से; गृहीत्वा—पकड़ कर; भिषयन्ती—धमकाती हुई; अवागुरत्—बहुत धीमे से डाँटा ।.
 
अनुवाद
 
 माता यशोदा द्वारा पकड़े जाने पर कृष्ण और अधिक डर गये और उन्होंने अपनी गलती स्वीकार कर ली। ज्योंही माता यशोदा ने कृष्ण पर दृष्टि डाली तो देखा कि वे रो रहे थे। उनके आँसू आँखों के काजल से मिल गये और हाथों से आँखें मलने के कारण उनके पूरे मुखमण्डल में वह काजल पुत गया। माता यशोदा ने अपने सलोने पुत्र का हाथ पकड़ते हुए धीरे से डाँटना शुरू किया।
 
तात्पर्य
 माता यशोदा तथा कृष्ण के इन व्यवहारों से हम भगवान् की प्रेमाभक्ति में लगे शुद्ध भक्त की उच्च स्थिति को समझ सकते हैं। योगी, ज्ञानी, कर्मी तथा वेदान्तीजन कृष्ण के पास फटक भी नहीं पाते, उन्हें उनसे बहुत दूर दूर रह कर उनके शारीरिक तेज में प्रवेश करने का प्रयास करना होता है। किन्तु वे ऐसा भी कर पाने में असमर्थ रहते हैं। ब्रह्माजी तथा शिवजी जैसे बड़े बड़े देवता हमेशा ध्यान तथा सेवा द्वारा भगवान् की पूजा करते हैं। यहाँ तक कि सर्वाधिक शक्तिशाली यमराज भी कृष्ण से डरता है। अत:, जैसाकि अजामिल की कथा से ज्ञात है कि यमराज ने अपने सेवकों को भक्तों के पास तक न फटकने का आदेश दिया, उन्हें पकडऩे की बात
तो दूर रही। दूसरे शब्दों में, यमराज भी कृष्ण तथा कृष्ण-भक्तों से डरता है। फिर भी वही कृष्ण अपनी माता यशोदा पर इतने आश्रित हो गये कि उनके हाथ में सोटी देखकर उन्होंने अपने को अपराधी मान लिया और सामान्य बालक की तरह रोने लगे। माता यशोदा अपने प्रिय पुत्र को अधिक डाँटना भी नहीं चाह रही थीं अतएव तुरन्त ही छड़ी फेंकते हुए उन्होंने केवल इतना ही डाँटा, “अब मैं तुम्हें बाँध दूँगी जिससे तुम और उपद्रव न कर सको। न ही तुम अपने संगियों के साथ कुछ समय के लिए खेल पाओ।” इससे ज्ञानियों, योगियों तथा वैदिक अनुष्ठान के अनुयायियों से विपरीत शुद्ध भक्त की परम सत्य में दिव्य स्थिति प्रदर्शित होती है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥