श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 9: माता यशोदा द्वारा कृष्ण का बाँधा जाना  »  श्लोक 19

 
श्लोक
एवं सन्दर्शिता ह्यङ्ग हरिणा भृत्यवश्यता ।
स्ववशेनापि कृष्णेन यस्येदं सेश्वरं वशे ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; सन्दर्शिता—प्रदर्शित किया गया; हि—निस्सन्देह; अङ्ग—हे महाराज परीक्षित; हरिणा—भगवान् द्वारा; भृत्य-वश्यता—अपने सेवक या भक्त की अधीनता स्वीकार करने का गुण; स्व-वशेन—जो केवल अपने वश में रहे; अपि— निस्सन्देह; कृष्णेन—कृष्ण द्वारा; यस्य—जिसके; इदम्—सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड; स-ईश्वरम्—शिव तथा ब्रह्मा जैसे शक्तिशाली देवताओं सहित; वशे—वश में ।.
 
अनुवाद
 
 हे महाराज परीक्षित, शिवजी, ब्रह्माजी तथा इन्द्र जैसे महान् एवं उच्चस्थ देवताओं समेत यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान् के वश में हैं। फिर भी भगवान् का एक दिव्य गुण यह है कि वे अपने भक्तों के वश में हो जाते हैं। यही बात इस लीला में कृष्ण द्वारा दिखलाई गई है।
 
तात्पर्य
 कृष्ण की इस लीला को समझ पाना दुष्कर है किन्तु भक्तगण इसे समझ सकते हैं। इसीलिए कहा गया है—दर्शयंस्तद्विदां लोक आत्मनो भक्तवश्यताम् (भागवत १०.११.९)—भगवान् अपने भक्तों के वश में होने का गुण प्रदर्शित करते हैं। ब्रह्म-संहिता (५.३५) में कहा गया है— एकोऽप्यसौ रचयितुं जगदण्डकोटिं यच्छक्तिरस्ति जगदण्डचया यदन्त:।
अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

अपने एक अंश परमात्मा से भगवान् असंख्य ब्रह्माण्डों एवं उनके देवताओं को नियंत्रित करते हैं फिर भी वे अपने भक्त द्वारा नियंत्रित होने के लिए राजी हो जाते हैं। उपनिषदों में कहा गया है कि भगवान् मन से भी अधिक वेग से दौड़ सकते हैं किन्तु यहाँ हम देखते हैं कि अपनी माता द्वारा पकड़े जाने से बचने की इच्छा रखते हुए भी कृष्ण पराजित हुए और माता यशोदा द्वारा पकड़ लिये गये। लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानम्—कृष्ण की सेवा लाखों लक्ष्मियाँ करती हैं। फिर भी वे मक्खन की चोरी इस तरह करते हैं जैसे कि कोई भूख का मारा हो। यद्यपि सारे जीवों का नियंत्रक यमराज कृष्ण से भयभीत रहता है फिर भी कृष्ण अपनी माता की सोटी से भयभीत हैं। इन विरोधाभासों को अभक्त नहीं समझ सकता किन्तु भक्त समझ सकता है कि कृष्ण की अनन्य भक्ति कितनी बलवान है। यह इतनी बलवान् है कि कृष्ण को एक शुद्ध भक्त द्वारा नियंत्रण में रखा जा सकता है। इस भृत्यवश्यता का अर्थ यह नहीं है कि वे अपने दास के वश में हैं प्रत्युत वे दास के शुद्ध प्रेम के वश में रहते हैं। भगवद्गीता (१.२१) में कहा गया है कि कृष्ण अर्जुन के सारथी बने। अर्जुन ने उन्हें आदेश दिया—

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत—हे कृष्ण! आपने मेरा सारथी बनना और मेरे आदेशों का पालन करना स्वीकार किया है। अत: मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा करो। कृष्ण ने तुरन्त इस आदेश का पालन किया। अतएव यह तर्क दिया जा सकता है कि कृष्ण भी सदैव पूर्ण स्वतंत्र नहीं रहते। किन्तु यह तो मनुष्य का अपना अज्ञान है। कृष्ण सदा ही पूर्ण स्वतंत्र हैं। जब वे अपने भक्तों के वशीभूत हो जाते हैं, तो यह आनन्दचिन्मय-रस का प्रदर्शन होता है, जो उनके दिव्य आनन्द को बढ़ाने वाला होता है। हर व्यक्ति कृष्ण की पूजा भगवान् के रूप में करता है अतएव कभी कभी वे किसी अन्य द्वारा नियंत्रित होने की इच्छा करते हैं। ऐसा नियंत्रक एक शुद्ध भक्त के अतिरिक्त भला अन्य कोई कैसे हो सकता है?

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥