श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 9: माता यशोदा द्वारा कृष्ण का बाँधा जाना  »  श्लोक 20

 
श्लोक
नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्यङ्गसंश्रया ।
प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत्प्राप विमुक्तिदात् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; इमम्—यह उच्च पद; विरिञ्च:—ब्रह्मा; न—न तो; भव:—शिव; न—न तो; श्री:—लक्ष्मी; अपि—निस्सन्देह; अङ्ग संश्रया—भगवान् की अर्धांगिनी होकर भी; प्रसादम्—कृपा; लेभिरे—प्राप्त किया; गोपी—माता यशोदा; यत् तत्—जो जैसा है; प्राप—प्राप्त किया; विमुक्ति-दात्—इस जगत से मुक्ति दिलाने वाले कृष्ण से ।.
 
अनुवाद
 
 इस भौतिक जगत से मोक्ष दिलाने वाले भगवान् की ऐसी कृपा न तो कभी ब्रह्माजी, न शिवजी, न ही भगवान् की अर्धांगिनी लक्ष्मी ही प्राप्त कर सकती हैं, जैसी माता यशोदा ने प्राप्त की।
 
तात्पर्य
 यह माता यशोदा तथा अन्य भगवद्भक्तों का एक तुलनात्मक अध्ययन है। चैतन्य- चरितामृत (आदि ५.१४२) में कहा गया है—एकले ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य—कृष्ण ही एकमात्र ईश्वर हैं, शेष सब उनके दास हैं। कृष्ण में भृत्यवश्यता अर्थात् अपने भृत्य या दास के अधीन होने का दिव्य गुण पाया जाता है। यद्यपि सभी भृत्य हैं और कृष्ण में भृत्यवश्यता का गुण पाया जाता है किन्तु माता यशोदा का पद सर्वोच्च है। ब्रह्माजी कृष्ण के भृत्य तथा आदि कवि हैं (तेने ब्रह्म हृदा य आदि कवये )। फिर भी उन्हें माता यशोदा जैसी कृपा प्राप्त नहीं हो पाई। शिवजी तो सर्वश्रेष्ठ वैष्णव हैं (वैष्णवानां यथा शम्भु:)। ब्रह्माजी तथा शिवजी की कौन कहे, भगवान् की नित्य संगिनी लक्ष्मी को भी जो सदैव उनके शरीर के साथ रहती हैं, ऐसी कृपा प्राप्त नहीं हो सकी। इसीलिए महाराज परीक्षित यह सोच कर चकित थे कि, “आखिर माता यशोदा तथा नन्द महाराज ने अपने पूर्वजन्मों में क्या किया जिससे उन्हें कृष्ण के वत्सल माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हो सका?” इसी श्लोक
में तीन न आये हैं। जब किसी बात को तीन बार कहा जाय तो समझना चाहिए कि उस पर बल दिया जा रहा है। इस श्लोक में तीन बार न लेभिरे, न लेभिरे, न लेभिरे आया है। फिर भी माता यशोदा को सर्वोच्च पद प्राप्त है और इसीलिए कृष्ण पूरी तरह उनके वश में हो गये हैं। विमुक्तिदात् शब्द भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मुक्ति कई प्रकार की होती है—सायुज्य, सालोक्य, सारूप्य, सार्ष्टि तथा सामीप्य। किन्तु विमुक्ति का अर्थ है “विशेष मुक्ति।” जब कोई व्यक्ति मुक्ति पाप्त करके प्रेमभक्ति के पद पर होता है, तो वह विमुक्ति प्राप्त कहा जाता है। इसीलिए न शब्द आया है। प्रेमा के उस उच्च पद को श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रेमा पुमर्थो महान् कहा है और माता यशोदा प्रेम- व्यापार में ऐसे ही उच्च पद पर कार्य करती हैं। इसीलिए वे नित्यसिद्ध भक्त हैं—कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति की अंशरूप अर्थात् अपने विशेष भक्त रूपी अंशों द्वारा अपने दिव्य आनंद को भोगने की शक्ति (आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि:)। ऐसे भक्त साधनसिद्ध नहीं होते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥