श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 9: माता यशोदा द्वारा कृष्ण का बाँधा जाना  »  श्लोक 3

 
श्लोक
क्षौमं वास: पृथुकटितटे बिभ्रती सूत्रनद्धं
पुत्रस्‍नेहस्‍नुतकुचयुगं जातकम्पं च सुभ्रू: ।
रज्ज्वाकर्षश्रमभुजचलत्कङ्कणौ कुण्डले च
स्विन्नं वक्त्रं कबरविगलन्मालती निर्ममन्थ ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
क्षौमम्—केसरिया तथा पीला मिश्रित; वास:—माता यशोदा की साड़ी; पृथु-कटि-तटे—चौड़ी कमर के चारों ओर; बिभ्रती— हिलती हुई; सूत्र-नद्धम्—पेटी से बँधी; पुत्र-स्नेह-स्नुत—प्रगाढ़ पुत्र-प्रेम के कारण दूध से तर; कुच-युगम्—उसके दोनों स्तन; जात-कम्पम् च—क्योंकि वे सुन्दर ढंग से हिल-डुल रहे थे; सु-भ्रू:—सुन्दर भौंहों वाली; रज्जु-आकर्ष—मथानी की रस्सी को खींचने से; श्रम—परिश्रम के कारण; भुज—हाथों पर; चलत्-कङ्कणौ—हिलते हुए दोनों कड़े; कुण्डले—कान के दोनों कुण्डल; च—भी; स्विन्नम्—बादल जैसे काले बालों से वर्षा की तरह चूता हुआ पसीना; वक्त्रम्—पूरे मुखमण्डल में; कबर विगलत्-मालती—उसके बालों से मालती के फूल गिर रहे थे; निर्ममन्थ—माता यशोदा दही मथ रही थीं ।.
 
अनुवाद
 
 केसरिया-पीली साड़ी पहने, अपनी स्थूल कमर में करधनी बाँधे, माता यशोदा मथानी की रस्सी खींचने में काफी परिश्रम कर रही थीं, उनकी चूडिय़ाँ तथा कान के कुण्डल हिल-डुल रहे थे और उनका पूरा शरीर हिल रहा था। अपने पुत्र के प्रति प्रगाढ़ प्रेम के कारण उनके स्तन दूध से गीले थे। उनकी भौंहें अत्यन्त सुन्दर थीं और उनका मुखमण्डल पसीने से तर था। उनके बालों से मालती के फूल गिर रहे थे।
 
तात्पर्य
 जो कोई मातृ या पितृ-स्नेह में कृष्णभावनाभावित होने का इच्छुक हो उसे माता यशोदा के शारीरिक स्वरूप का चिन्तन करना चाहिए। हाँ, उसे यशोदा जैसा बनने की कामना नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा करना मायावाद है। हमें वात्सल्य-प्रेम या माधुर्य-प्रेम, सख्य या दास्य—किसी रूप में वृन्दावनवासियों के पदचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए, उनके समान बनने का प्रयास नहीं
करना चाहिये। इसीलिए यह विवरण यहाँ दिया गया है। उन्नत हो चुके भक्तों को इस वर्णन का स्मरण करना चाहिए और सदैव माता यशोदा के स्वरूप का, कि वे क्या पहने थीं, कैसे काम कर रही थीं तो पसीना निकल रहा था, किस तरह फूलों से उनके बाल सजे थे आदि आदि का चिन्तन करना चाहिए। कृष्ण के लिए मातृ-स्नेह में माता यशोदा का चिन्तन करते हुए इस विवरण का लाभ उठाना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥