श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 9: माता यशोदा द्वारा कृष्ण का बाँधा जाना  »  श्लोक 9

 
श्लोक
तामात्तयष्टिं प्रसमीक्ष्य सत्वर-
स्ततोऽवरुह्यापससार भीतवत् ।
गोप्यन्वधावन्न यमाप योगिनां
क्षमं प्रवेष्टुं तपसेरितं मन: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—माता यशोदा को; आत्त-यष्टिम्—हाथ में छड़ी लिए; प्रसमीक्ष्य—इस मुद्रा में उन्हें देखकर कृष्ण; सत्वर:—तेजी से; तत:—वहाँ से; अवरुह्य—उतर कर; अपससार—भगने लगा; भीत-वत्—मानो डरा हुआ हो; गोपी—माता यशोदा; अन्वधावत्—उनका पीछा करने लगीं; न—नहीं; यम्—जिसको; आप—पहुँच पाने में असफल; योगिनाम्—बड़े बड़े योगियों का; क्षमम्—उन तक पहुँचने में समर्थ; प्रवेष्टुम्—ब्रह्म तेज या परमात्मा में प्रवेश करने के लिए प्रयत्नशील; तपसा—तपस्या से; ईरितम्—उस कार्य के लिए प्रयत्नशील; मन:—ध्यान से ।.
 
अनुवाद
 
 जब भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी माता को छड़ी लिए हुए देखा तो वे तेजी से ओखली के ऊपर से नीचे उतर आये और इस तरह भागने लगे मानो अत्यधिक भयभीत हों। जिन्हें योगीजन बड़ी बड़ी तपस्याएँ करके ब्रह्म-तेज में प्रवेश करने की इच्छा से परमात्मा के रूप में ध्यान के द्वारा पकडऩे का प्रयत्न करने पर भी उन तक नहीं पहुँच पाते उन्हीं भगवान् कृष्ण को अपना पुत्र समझ कर पकडऩे के लिए यशोदा उनका पीछा करने लगीं।
 
तात्पर्य
 योगीजन कृष्ण को परमात्मा रूप में पा लेना चाहते हैं और बड़ी बड़ी तपस्याओं द्वारा उन तक पहुँचना चाहते हैं किन्तु वे ऐसा कर नहीं पाते। किन्तु यहाँ हम देख रहे हैं कि कृष्ण यशोदा द्वारा पकड़े जाने वाले हैं और वे भय के मारे दूर भाग रहे हैं। इससे भक्त तथा योगी का अन्तर पता चलता है। योगी कृष्ण तक नहीं पहुँच सकता किन्तु माता यशोदा जैसे भक्तों द्वारा कृष्ण पहले से ही पकड़े हुए हैं। कृष्ण
तो यशोदा जी की छड़ी तक से भयभीत थे। इसका उल्लेख महारानी कुन्ती ने अपनी स्तुति में किया है (भागवत १.८.३१)—भयभावनया स्थितस्य। कृष्ण अपनी माता यशोदा से भयभीत हैं और योगीजन कृष्ण से। योगीजन ज्ञानयोग तथा अन्य योगों द्वारा कृष्ण तक पहुँचने का प्रयास करते हैं किन्तु उन तक पहुँच नहीं पाते। माता यशोदा के स्त्री होते हुए भी कृष्ण उनसे भयभीत हैं, जैसाकि इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥