श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 1-2

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
न रोधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म एव च ।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥ १ ॥
व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमा: ।
यथावरुन्धे सत्सङ्ग: सर्वसङ्गापहो हि माम् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; न रोधयति—नियंत्रित नहीं करता; माम्—मुझको; योग:—अष्टांग योग पद्धति; न—न तो; साङ्ख्यम्—भौतिक तत्त्वों का वैश्लेषिक अध्ययन; धर्म:—अहिंसा जैसी सामान्य करुणा; एव—निस्सन्देह; च—भी; न— न तो; स्वाध्याय:—वेदों का उच्चारण; तप:—तपस्या; त्याग:—सन्यास-आश्रम; न—न तो; इष्टा-पूर्तम्—यज्ञ करना तथा कुएँ खुदवाना या वृक्ष लगाना जैसे आम जनता के कल्याण-कार्य; न—न तो; दक्षिणा—दान; व्रतानि—व्रत रखना तथा एकादशी का उपवास; यज्ञ:—देवताओं की पूजा; छन्दांसि—गुह्य मंत्रों का उच्चारण; तीर्थानि—तीर्थस्थानों का भ्रमण; नियमा:— आध्यात्मिक जीवन के लिए मुख्य आदेशों का पालन करना; यमा:—तथा गौण-विधान भी; यथा—जिस तरह; अवरुन्धे— अपने वश में करता है; सत्-सङ्ग:—मेरे भक्तों की संगति; सर्व—समस्त; सङ्ग—भौतिक संगति; अपह:—हटाने वाला; हि— निश्चय ही; माम्—मुझको ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : हे उद्धव, मेरे शुद्ध भक्तों की संगति करने से इन्द्रियतृप्ति के सारे पदार्थों के प्रति आसक्ति को नष्ट किया जा सकता है। शुद्धि करने वाली ऐसी संगति मुझे मेरे भक्त के वश में कर देती है। कोई चाहे अष्टांग योग करे, प्रकृति के तत्त्वों का दार्शनिक विश्लेष्ण करने में लगा रहे, चाहे अहिंसा तथा शुद्धता के अन्य सिद्धान्तों का अभ्यास करे, वेदोच्चार करे, तपस्या करे, संन्यास ग्रहण करे, कुँआ खुदवाने, वृक्ष लगवाने तथा जनता के अन्य कल्याण- कार्यों को सम्पन्न करे, चाहे दान दे, कठिन व्रत करे, देवताओं की पूजा करे, गुह्य मंत्रों का उच्चारण करे, तीर्थस्थानों में जाय या छोटे-बड़े अनुशासनात्मक आदेशों को स्वीकार करे, किन्तु इन सब कार्यों को सम्पन्न करके भी कोई मुझे अपने वश में नहीं कर सकता।
 
तात्पर्य
 इन दो श्लोकों पर श्रील जीव गोस्वामी की टीका का सारांश इस प्रकार है कोई व्यक्ति भगवद्भक्तों की औपचारिक पूजा द्वारा अथवा संगति करके उनकी सेवा कर सकता है। शुद्ध भक्तों की संगति आत्म-साक्षात्कार के लिए पर्याप्त है, क्योंकि ऐसे भक्तों से आध्यात्मिक प्रगति के विषय में हर बात सीखी जा सकती है। पूर्ण ज्ञान होने पर मनुष्य की मनोवांछित वस्तुएँ प्राप्त हो सकती हैं, क्योंकि भक्ति की प्रक्रिया से भगवान् का आशीर्वाद तुरन्त प्राप्त होता है। शुद्ध भक्ति प्रकृति के गुणों से परे है, अतएव इन गुणों द्वारा बद्ध किये गये आत्माओं को यह रहस्यमय प्रतीत होती है।
पिछले अध्याय में भगवान् ने कहा है हविषाग्नौ यजेत माम् घी की आहुति देकर मनुष्य अग्नि में मेरी पूजा कर सकता है (भागवत ११.११.४३)। पिछले अध्याय के श्लोक ३८ में यह उल्लेख हुआ है कि मनुष्यों को बाग-बगीचे, मनोरंजन स्थल, उद्यान, इत्यादि बनवाने चाहिए। इनसे लोग कृष्ण-मन्दिरों के प्रति आकृष्ट होते हैं, जहाँ पर वे भगवन्नाम का कीर्तन कर सकते हैं। ऐसी निर्माण योजनाओं को पूर्तम् कहा जाता है। यद्यपि इन दोनों श्लोकों में भगवान् कृष्ण यह उल्लेख करते हैं कि उनके शुद्ध भक्तों की संगति योग, दार्शनिक चिन्तन, यज्ञ तथा जन-कल्याण-कार्यों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है, किन्तु ये गौण कार्य भी भगवान् कृष्ण को प्रसन्न करने वाले हैं, यद्यपि कुछ कम मात्रा में। ये कार्य विशेष रूप से तब भगवान् को प्रसन्न करने वाले होते हैं जब सामान्य भौतिकतावादी लोगों द्वारा सम्पन्न न होकर भक्तों द्वारा किये जाते हैं। इसीलिए यथा तुलनात्मक शब्द का प्रयोग हुआ है। दूसरे शब्दों में, यज्ञ, तप तथा दार्शनिक अध्ययन जैसे कार्य मनुष्य को भक्ति करने के योग्य बना सकते हैं और जब ऐसे कार्य आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुक भक्तों द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं, तो वे भगवान् को अच्छे लगते हैं।

व्रतानि के उदाहरण अध्ययन किया जा सकता है। यह आदेश कि मनुष्य एकादशी व्रत समस्त वैष्णवों के लिए स्थायी व्रत है, अत: इन श्लोकों से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि एकादशी व्रत की उपेक्षा की जा सकती है। भगवत्प्रेम का फल प्रदान करने में सत्संग की श्रेष्ठता का यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि अन्य विधियों का परित्याग कर दिया जाय या कि ये गौण विधियाँ भक्तियोग के स्थायी कारक नहीं हैं। ऐसे अनेक वैदिक आदेश हैं, जो अग्निहोत्र यज्ञ करने का उपदेश देते हैं तथा चैतन्य महाप्रभु के आधुनिक अनुयायी भी कभी कभी अग्निहोत्र यज्ञ करते हैं। ऐसे यज्ञ की संस्तुति स्वयं भगवान् ने पिछले अध्याय में की है अतएव भगवद्भक्तों को इसका परित्याग नहीं करना चाहिए। वैदिक अनुष्ठान तथा शुद्धि-अनुष्ठान करने से मनुष्य क्रमश: भक्ति-पद तक ऊपर उठता है, जहाँ वह परम सत्य की प्रत्यक्ष पूजा कर सकता है। एक वैदिक आदेश है “छ: विभिन्न अवसरों पर एक एक मास का लगातार उपवास करने से जो फल प्राप्त होता है, वह भगवान् विष्णु को अर्पित मुट्ठी-भर चावल से मिल सकता है। यह सुविधा कलियुग में विशेष रूप से उपलब्ध है।” तो भी एकादशी पर नियमित व्रत रखना आध्यात्मिक प्रगति में बाधक नहीं है। प्रत्युत भक्ति का यह शाश्वत पक्ष है और इसे भगवान् कृष्ण तथा उनके भक्तों के पूजन के मुख्य सिद्धान्त का सहायक सिद्धान्त माना जा सकता है। चूँकि ऐसे गौण सिद्धान्तों से मनुष्य प्रारम्भिक भक्ति-विधियाँ पूरी करने के योग्य बनता है, अतएव वे भी अत्यन्त उपयोगी हैं। इसीलिए ऐसे गौण सिद्धान्तों का उल्लेख पूरे वैदिक वाङ्मय में पाया जाता है। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ऐसे गौण सिद्धान्त कृष्णभावनामृत की प्रगति के लिए अनिवार्य हैं, अतएव मनुष्य को व्रत का परित्याग नहीं करना चाहिए।

पिछले अध्याय (भागवत ११.११.३२) में श्रील श्रीधर स्वामी ने उल्लेख किया है कि आज्ञायैवं गुणान् दोषान् से यह सूचित होता है कि भक्त को चाहिए कि ऐसे वैदिक सिद्धान्तों का चुनाव करे, जिनका भगवद्भक्ति से कोई विरोध नहीं है। उपवास, देवपूजा तथा योगाभ्यास की अनेक जटिल विधियाँ तथा विस्तृत वैदिक अनुष्ठान श्रवणं कीर्तनं विष्णो: की विधि में बाधा उत्पन्न करते हैं, इसलिए वैष्णवजन उनका वहिष्कार करते हैं। किन्तु जो विधियाँ भक्ति में सहायक हों, उन्हें स्वीकार करना चाहिए। यहाँ पर महाराज युधिष्ठिर का उदाहरण दिया जा सकता है, जिन्हें मृत्यु-शय्या पर लेटे भीष्मदेव ने उपदेश दिया। श्रीमद्भागवत (१.९.२७) में भीष्म ने महाराज युधिष्ठिर को दान-धर्म, राज धर्म, मोक्ष-धर्म, स्त्री-धर्म तथा भागवत्-धर्म की शिक्षा दी। भीष्म ने अपना विवेचन भागवत धर्म तक ही सीमित नहीं रखा, क्योंकि कृष्ण ने महाराज युधिष्ठिर को राजा रूप में कार्य करने की भक्ति प्रदान की और इस सेवा को सम्पन्न करने के लिए महाराज युधिष्ठिर को नागरिक मामलों का विस्तृत ज्ञान आवश्यक था। किन्तु जो व्यक्ति समाज में ऐसी नियत भक्ति का सम्पादन नहीं करता है, उसे अनावश्यक रूप से भौतिक जगत में हाथ नहीं डालना चाहिए। भगवान् कृष्ण को तुष्ट करने के चरम उद्देश्य से उसे कोई रोक नहीं सकता।

नियत व्रतों को न त्यागने के सिद्धान्तों को महाराज अम्बरीष के उदाहरण से भी दर्शाया जा सकता है। श्रीमद्भागवत के नवें स्कन्ध में हम पाते हैं कि यद्यपि महाराज अम्बरीष ने विस्तृत वैदिक यज्ञ सम्पन्न किये थे, किन्तु उनका उद्देश्य भगवान् को सदैव तुष्ट रखना था। उनके राज्य के नागरिक स्वर्ग नहीं जाना चाहते थे, क्योंकि वे वैकुण्ठ की महिमा का श्रवण निरन्तर करते थे। अम्बरीष महाराज ने अपनी महारानी समेत एक वर्ष तक एकादशी तथा द्वादशी का व्रत रखा। चूँकि अम्बरीष महाराज को वैष्णवों का शिरोमणि माना जाता है और चूँकि उनका आचरण आदर्शमय था, अतएव यह निष्कर्ष निकलता है कि एकादशी पर उपवास रखने जैसे व्रत वैष्णवों के लिए अनिवार्य हैं। वैदिक वाङ्मय में यह भी कहा गया है “यदि लापरवाही से कोई वैष्णव एकादशी पर व्रत नहीं रखता, तो उसकी भगवान् विष्णु की पूजा व्यर्थ रहती है और वह नरक को जाता है।” इस्कॉन के सदस्यों को एकादशी के दिन अन्न तथा फलियाँ नहीं खानी चाहिए और सारे सदस्यों को यह व्रत सदा रखना चाहिए।

यदि कोई मिथ्या ही यह सोचता है कि वह महान् तपस्या, संस्कृत साहित्य के प्रखर अध्ययन, दान के वदान्य कर्मों द्वारा भगवान् कृष्ण की संगति प्राप्त कर सकता है, तो उसकी कृष्ण-चेतना विरूपित होकर क्षीण हो जायेगी। मनुष्य को चाहिए कि श्री चैतन्य महाप्रभु के उदाहरण को याद रखे, जिन्होंने भगवान् कृष्ण के विषय में निरन्तर श्रवण तथा कीर्तन द्वारा कृष्णभावनामृत का अभ्यास किया। यदि कोई व्यक्ति उपवास, अध्ययन, तपस्या, अथवा यज्ञ द्वारा चैतन्य महाप्रभु के संकीर्तन आन्दोलन में भाग लेने के लिए अधिक उपयुक्त बनता है, तो ऐसे कार्य भी भगवान् कृष्ण को प्रसन्न करने वाले होते हैं।

किन्तु यहाँ पर भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि भक्तियोग में ऐसे कार्य कभी भी केन्द्रीय महत्त्व के नहीं बन सकते। उन्हें सत्संग की परम विधि के सहायक के रूप में ही रहना पड़ेगा। श्रील मध्वाचार्य ने वैदिक साहित्य से उद्धरण दिया है कि यदि कोई व्यक्ति भगवद्भक्तों का अपमान करता है और उनकी संगति करना नहीं सीखता, तो भगवान् विष्णु ऐसे व्यक्ति के मार्ग में विघ्न डालते हैं, जिससे वह भगवान् की संगति प्राप्त न कर पाये।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥