श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 10

 
श्लोक
रामेण सार्धं मथुरां प्रणीते
श्वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ता: ।
विगाढभावेन न मे वियोग-
तीव्राधयोऽन्यं दद‍ृशु: सुखाय ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
रामेण—बलराम के; सार्धम्—साथ; मथुराम्—मथुरा नगरी के; प्रणीते—लाये गये; श्वाफल्किना—अक्रूर द्वारा; मयि—मुझमें; अनुरक्त—निरन्तर लिप्त; चित्ता:—चेतना वाले; विगाढ—प्रगाढ़; भावेन—प्रेम से; न—नहीं; मे—मेरी अपेक्षा; वियोग— विछोह का; तीव्र—गहन; आधय:—मानसिक कष्ट, चिन्ता आदि का अनुभव करने वाले; अन्यम्—अन्यों को; ददृशु:—देखा; सुखाय—उन्हें सुखी बनाने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 गोपियाँ इत्यादि वृन्दावनवासी गहन प्रेम से सदैव मुझमें अनुरक्त थे। अतएव जब मेरे चाचा अक्रूर मेरे भ्राता बलराम सहित मुझे मथुरा नगरी में ले आये, तो वृन्दावनवासियों को मेरे विछोह के कारण अत्यन्त मानसिक कष्ट हुआ और उन्हें सुख का कोई अन्य साधन प्राप्त नहीं हो पाया।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में वृन्दावन की गोपियों के मनोभावों का विशेष रूप से वर्णन हुआ है और यहाँ पर कृष्ण उनके द्वारा अनुभव किये जाने वाले अद्वितीय प्रेम को प्रकट करते हैं। जैसाकि दसवें स्कन्ध में बतलाया गया है कंस द्वारा भेजे गये भगवान् कृष्ण के चाचा अक्रूर वृन्दावन आये और कुश्ती दिखलाने के लिए कृष्ण तथा बलराम को मथुरा ले आये। गोपियाँ कृष्ण को इतना चाहती थीं कि उनकी अनुपस्थिति में उनकी चेतना उनके आध्यात्मिक
प्रेम में पूर्णतया लीन हो गई। इस तरह उनकी कृष्ण-चेतना जीवन की चरम सिद्धावस्था मानी जाती है। वे सदैव आशान्वित रहीं कि भगवान् कृष्ण असुरों को मारने का कार्य पूरा करके उनके पास लौट आयेंगे, अतएव उनकी चिन्ता उनके प्रेम की अत्यन्त हृदय विदारक अभिव्यक्ति थी। असली सुख चाहने वाले व्यक्ति को भगवान् के आनन्द के लिए प्रत्येक वस्तु का त्याग करते हुए गोपियों की तरह कृष्ण की भक्ति करनी चाहिए।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥