श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 12

 
श्लोक
ता नाविदन् मय्यनुषङ्गबद्ध-
धिय: स्वमात्मानमदस्तथेदम् ।
यथा समाधौ मुनयोऽब्धितोये
नद्य: प्रविष्टा इव नामरूपे ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
ता:—वे (गोपियाँ); न—नहीं; अविदन्—अवगत; मयि—मुझमें; अनुषङ्ग—घनिष्ठ सम्पर्क द्वारा; बद्ध—बँधी; धिय:—चेतना वाली; स्वम्—निजी; आत्मानम्—शरीर या आत्मा; अद:—दूर की वस्तु; तथा—इस तरह विचार करते हुए; इदम्—अत्यन्त निकट यह; यथा—जिस तरह; समाधौ—योग समाधि में; मुनय:—मुनिगण; अब्धि—सागर के; तोये—जल में; नद्य:—नदियाँ; प्रविष्टा:—प्रवेश करके; इव—सदृश; नाम—नाम; रूपे—तथा रूप ।.
 
अनुवाद
 
 हे उद्धव, जिस तरह योग समाधि में मुनिगण आत्म-साक्षात्कार में लीन रहते हैं और उन्हें भौतिक नामों तथा रूपों का भान नहीं रहता और जिस तरह नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं, उसी तरह वृन्दावन की गोपियाँ अपने मन में मुझसे इतनी अनुरक्त थीं कि उन्हें अपने शरीर की अथवा इस जगत की या अपने भावी जीवनों की सुध-बुध नहीं रह गई थी। उनकी सम्पूर्ण चेतना मुझमें बँधी हुई थी।
 
तात्पर्य
 स्वम् आत्मानम् अदस्तथेदम् से यह सूचित होता है कि जहाँ सामान्य लोगों को अपना शरीर अत्यन्त प्रिय लगता है, वहाँ गोपियाँ अपने शरीर को अत्यन्त दूर मानती थीं, जिस तरह समाधिस्थ योगी अपने शरीर को या उसके चारों ओर की सामान्य वस्तुओं को अपने से बहुत दूर मानता है। जब रात गये कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाते, तो गोपियाँ अपने तथाकथित पतियों तथा बच्चों के बारे में सबकुछ भूल कर कृष्ण के साथ जंगल में नृत्य करने चली जाती थीं। इन विवादास्पद बातों की स्पष्ट व्याख्या भगवान् कृष्ण नामक पुस्तक में श्रील प्रभुपाद ने की है। मुख्य विवेचना यह है कि भगवान् कृष्ण हर वस्तु के स्रोत हैं और गोपियाँ भगवान् की निजी शक्ति हैं। इस तरह अपनी ही प्रकट शक्तिरूपा गोपियों के साथ परम शक्तिशाली भगवान् का प्रेमाचार न तो कोई त्रुटि है, न अनैतिकता है, क्योंकि गोपियाँ ईश्वर की सृष्टि में सर्वाधिक सुन्दर तरुणियाँ हैं।
गोपियों को तनिक भी मोह नहीं है, क्योंकि कृष्ण के प्रति वे इतनी आकृष्ट हैं कि वे किसी चीज के बारे में सोचने की परवाह नहीं करतीं। चूँकि सारा जगत भगवान् कृष्ण के शरीर के भीतर स्थित है, अतएव जब गोपियाँ कृष्ण पर ध्यान एकाग्र करती हैं, तो उनको कोई क्षति नहीं होती। प्रगाढ़ प्रेम का स्वभाव है कि प्रिय के अतिरिक्त अन्य सारी वस्तुओं का बहिष्कार कर दिया जाता है। किन्तु भौतिक जगत में, जहाँ हम अपने राष्ट्र, परिवार या शरीर जैसी सीमित नश्वर वस्तु से प्रेम करना चाहते हैं, तो अन्य वस्तुओं के बहिष्कार का अर्थ अज्ञान होता है। किन्तु जब हमारा प्रेम हर वस्तु के उद्गम भगवान् पर केन्द्रित होता है, तो ऐसी एकाग्रता को अज्ञान या अल्पज्ञता नहीं माना जा सकता।

यहाँ पर समाधि प्राप्त मुनियों का उदाहरण यह दिखलाने के लिए दिया गया है कि एक ही वस्तु पर एकाग्रता है। अन्यथा गोपियों के भावमय प्रेम तथा योगियों के शुष्क चिन्तन की कोई तुलना नहीं है, क्योंकि योगी केवल यह जानने का प्रयत्न करते हैं कि वे अपने भौतिक शरीर नहीं हैं। चूँकि गोपियों के कोई भौतिक शरीर नहीं थे जिनसे विरक्त हुआ जाय और वे परम सत्य के साथ नाच रही थीं तथा आलिंगन कर रही थीं, अतएव गोपियों के उच्च पद की तुलना योगियों मात्र के पद से नहीं की जा सकती। यह कहा जाता है कि निर्विशेष ब्रह्म की अनुभूति के आनन्द की तुलना कृष्ण-प्रेम के आनन्दमय सागर के एक क्षुद्र अंश से भी नहीं की जा सकती। घनिष्ठ अनुरक्ति उस मजबूत रस्सी की तरह है, जो मन तथा हृदय को बाँधती है। हम भौतिक जीवन में नश्वर तथा मोहमय वस्तुओं से बँधे होते हैं, अतएव हृदय का ऐसा बन्धन महान् पीड़ा उत्पन्न करता है। किन्तु यदि हम अपने मन तथा हृदय को समस्त आनन्द तथा सौन्दर्य के आगार भगवान् कृष्ण से बाँध देते हैं, तो हमारे हृदय दिव्य आनन्द के सागर में असीम विस्तार करते हैं।

हमें यह समझ लेना चाहिए कि गोपियाँ किसी भी तरह से निर्विशेष ध्यान के प्रति उन्मुख नहीं थीं, जिसमें विविधतामय सृष्टि की सत्यता से इनकार किया जाता है। गोपियों ने किसी वस्तु से इनकार नहीं किया। उन्हें केवल कृष्ण से प्रेम था। वे अन्य कुछ भी नहीं सोच सकती थीं। उन्होंने भगवान् कृष्ण के ध्यान में बाधक हर वस्तु का बहिष्कार किया, यहाँ तक कि अपनी पलकों को भी कोसा जिनके झपकने से कृष्ण क्षण-भर के लिए उनकी दृष्टि से विलग हो जाते थे। श्रील रूप गोस्वामी ने कहा है कि भगवान् के सभी निष्ठावान भक्तों को चाहिए कि अपने जीवन से उस वस्तु को दूर करने का साहस जुटायें, जो भगवद्धाम की ओर बढऩे में बाधक होती है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥