श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 13

 
श्लोक
मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबला: ।
ब्रह्म मां परमं प्रापु: सङ्गाच्छतसहस्रश: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
मत्—मुझ; कामा:—चाहने वाले; रमणम्—मोहक प्रेमी को; जारम्—दूसरे की पत्नी का प्रेमी; अस्वरूप-विद:—मेरे वास्तविक पद को न जानते हुए; अबला:—स्त्रियाँ; ब्रह्म—ब्रह्म; माम्—मुझको; परमम्—परम; प्रापु:—प्राप्त किया; सङ्गात्— संगति से; शत-सहस्रश:—सैकड़ों हजारों में ।.
 
अनुवाद
 
 वे सैकड़ों हजारों गोपियाँ मुझे ही अपना सर्वाधिक मनोहर प्रेमी जान कर तथा इस तरह मुझे अत्यधिक चाहते हुए मेरे वास्तविक पद से अपरिचित थीं। फिर भी मुझसे घनिष्ठ संगति करके गोपियों ने मुझ परम सत्य को प्राप्त किया।
 
तात्पर्य
 अस्वरूपविद: शब्द सूचित करता है कि सुन्दर गोपियाँ कृष्ण के माधुर्य प्रेम में इतनी अधिक लीन थीं कि वे भगवान् के रूप में उनकी असीम शक्तियों से अपरिचित थीं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अस्वरूपविद: शब्द का यह अर्थ तथा इसके अतिरिक्त अन्य अर्थ भी दिये हैं। विद् का अर्थ “प्राप्त करना” भी होता है। इस तरह अस्वरूपविद: यह सूचित करता है कि भगवान् के अन्य भक्तों की तरह गोपियाँ सारूप्य मुक्ति प्राप्त करने की इच्छुक नहीं थीं। यदि गोपियों को भगवान् जैसा शारीरिक स्वरूप प्राप्त हो जाता, तो भगवान् किस तरह गोपियों के साथ नाचने और उनका आलिंगन करने की माधुर्य लीला कर पाते? चूँकि गोपियों को भगवान् की सेविकाओं के रूप
में अपने स्वरूपों की अनुभूति हो चुकी थी, अतएव स्वरूप शब्द उनके ही आध्यात्मिक शरीरों को सूचित कर सकता है। इस प्रकार अस्वरूपविद: का अर्थ होगा कि गोपियों ने अपने शारीरिक सौन्दर्य के विषय में कभी नहीं सोचा, जैसाकि भौतिकतावादी करते हैं। यद्यपि गोपियाँ भगवान् की सृष्टि में सर्वाधिक सुन्दर बालाएँ हैं, किन्तु उन्होंने अपने शरीर के विषय में न सोच कर सदैव भगवान् कृष्ण के दिव्य शरीर का ध्यान किया। यद्यपि हम गोपियों के उच्च माधुर्य भावों का अनुकरण नहीं कर सकते, किन्तु हम व्यावहारिक कृष्णभावनामृत के उत्कृष्ट उदाहरण को अपना सकते हैं। उन्होंने कृष्ण की शरण ग्रहण की और जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त की।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥