श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 14-15

 
श्लोक
तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम् ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च ॥ १४ ॥
मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम् ।
याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभय: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—इसलिए; त्वम्—तुम; उद्धव—हे उद्धव; उत्सृज्य—त्याग कर; चोदनाम्—वेदों के आदेशों को; प्रतिचोदनाम्—वेदांगों के आदेशों को; प्रवृत्तिम्—आदेश; च—तथा; निवृत्तिम्—निषेध; च—तथा; श्रोतव्यम्—सुनने योग्य; श्रुतम्—सुना हुआ; एव—निस्सन्देह; च—भी; माम्—मुझको; एकम्—अकेला; एव—वास्तव में; शरणम्—शरण; आत्मानम्—हृदय में परमात्मा; सर्व-देहिनाम्—समस्त बद्धजीवों का; याहि—जाओ; सर्व-आत्म-भावेन—एकान्तिक भक्ति से; मया—मेरी कृपा से; स्या:—होओ; हि—निश्चय ही; अकुत:-भय:—भय से रहित ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव हे उद्धव, तुम सारे वैदिक मंत्रों तथा वेदांगों की विधियों एवं उनके सकारात्मक तथा निषेधात्मक आदेशों का परित्याग करो। जो कुछ सुना जा चुका है तथा जो सुना जाना है, उसकी परवाह न करो। केवल मेरी ही शरण ग्रहण करो, क्योंकि मैं ही समस्त बद्धात्माओं के हृदय के भीतर स्थित भगवान् हूँ। पूरे मन से मेरी शरण ग्रहण करो और मेरी कृपा से तुम समस्त भय से मुक्त हो जाओ।
 
तात्पर्य
 श्री उद्धव ने भगवान् कृष्ण से सन्त-पुरुषों तथा मुक्तात्माओं के लक्षण पूछे थे और कृष्ण ने आध्यात्मिक उन्नति के विभिन्न स्तरों के रूप में उनका उत्तर दिया। उन्होंने अपने उत्तर में बताया कि जो व्यक्ति भगवान् कृष्ण को अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य समझ सकते हैं और जो प्रिय भक्त भगवान् कृष्ण को और उनकी भक्ति को अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य मानते हैं, उन दोनों में क्या अन्तर है। भगवान् कृष्ण ने यह भी बताया कि वे अपने प्रिय भक्तों के द्वारा तथा उन भक्तों की संगति करने वालों के द्वारा भी बन्दी बना लिये जाते हैं। भक्तों में से वृन्दावन की गोपियों को ऐसी शुद्ध भक्ति की अवस्था प्राप्त किये हुए बतलाया गया है कि भगवान् कृष्ण स्वयं अपने को निरन्तर उनका ऋणी अनुभव करते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार भगवान् कृष्ण ने पहले अपने प्रति गोपियों के प्रेम को रहस्यमय होने के कारण तथा अपने गुरुत्व के कारण अपने हृदय में छिपा रखा। किन्तु अन्त में भगवान् कृष्ण भी गोपियों के प्रगाढ़ प्रेम के प्रति मौन नहीं रह पाये, अतएव इन श्लोकों में उद्धव से भगवान् प्रकट करते हैं कि किस तरह गोपियाँ वृन्दावन में उनसे प्रेम करती थीं और किस तरह उन्हें पूर्णतया अपने वश में कर लिया था। भगवान् सुन्दर गोपियों के साथ गुप्त स्थानों में विहार करते और माधुर्य रागानुग स्नेह के कारण उनमें महान् प्रेम का आदान-प्रदान होता।
जैसाकि भगवान् ने भगवद्गीता में बतलाया है, मनुष्य भौतिक जगत का परित्याग करके अथवा सामान्य धार्मिक सिद्धान्तों का पालन करके जीवन-सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता। मनुष्य को वास्तविक रूप में भगवान् के स्वरूप को समझना चाहिए और उनके शुद्ध भक्तों की संगति में रह कर भगवान् को उनके आदि साकार रूप से प्रेम करना सीखना चाहिए। यह प्रेम माधुर्य, वात्सल्य, सख्य या दास्य रस में व्यक्त किया जा सकता है। भगवान् ने उद्धव को विस्तार से भौतिक जगत की दार्शनिक विश्लेषण पद्धति बतलाई और अब वे उद्धव से कहते हैं कि सकाम कर्म या मनोधर्म में समय नष्ट करना व्यर्थ है। वस्तुत: कृष्ण उद्धव को बता रहे हैं कि वे गोपियों के उदाहरण को आत्मसात् करें और व्रज की गोपियों के पदचिह्नों पर चलते हुए कृष्णभावनामृत में प्रगति करें। प्रकृति के क्रूर नियम जो व्याधि, जरा तथा मृत्यु थोपते हैं, इनसे असन्तुष्ट किसी भी बद्धजीव को यह समझना चाहिए कि भगवान् कृष्ण सारे जीवों को संसार की समस्याओं से उबार सकते हैं। उसे अवैध साम्प्रदायिक अनुष्ठानों, आदेशों या निषेधों में फँसने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्हें साक्षात् भगवान् कृष्ण-रूप श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह भगवान् कृष्ण की शरण ग्रहण करनी चाहिए। वैध भक्तियोग विधि के द्वारा मनुष्य को सरलता से आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त हो जाती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥