श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 16

 
श्लोक
श्रीउद्धव उवाच
संशय: श‍ृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर ।
न निवर्तत आत्मस्थो येन भ्राम्यति मे मन: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-उद्धव: उवाच—श्री उद्धव ने कहा; संशय:—सन्देह; शृण्वत:—सुनने वाले का; वाचम्—शब्द; तव—तुम्हारे; योग- ईश्वर—योगशक्ति के स्वामियों के; ईश्वर—स्वामी; न निवर्तते—बाहर नहीं जायेगा; आत्म—हृदय में; स्थ:—स्थित; येन— जिससे; भ्राम्यति—मोहग्रस्त रहता है; मे—मेरा; मन:—मन ।.
 
अनुवाद
 
 श्री उद्धव ने कहा : हे योगेश्वरों के ईश्वर, मैंने आपके वचन सुने हैं, किन्तु मेरे मन का सन्देह जा नहीं रहा है, अत: मेरा मन मोहग्रस्त है।
 
तात्पर्य
 इस स्कन्ध के दसवें अध्याय के प्रथम श्लोक में भगवान् ने यह कहा था कि मनुष्य को चाहिए कि उनकी शरण ग्रहण करके निष्काम भाव से वर्णाश्रम प्रणाली के अन्तर्गत अपने कर्तव्य करे।
उद्धव ने इस कथन का अर्थ यह लगाया कि कर्म-मिश्र भक्ति अर्थात् सकाम कर्मो की प्रवृत्ति के साथ भक्ति की संस्तुति की गई है। यह तथ्य है कि जब तक कृष्ण को सर्वस्व नहीं समझ लिया जाता, तब तक सामान्य संसारी कर्तव्यों से विरक्त हो पाना सम्भव नहीं है। हाँ, इससे अपने कर्मफल भगवान् को अर्पित करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। दसवें अध्याय के चौथे श्लोक में भगवान् ने संस्तुति की थी कि मनुष्य को सांसारिक कर्तव्यों से विरक्त होकर भगवान् के परम ज्ञान का विधिवत् अनुशीलन करना चाहिए। उद्धव ने इस उपदेश से यह समझा कि यह ज्ञान-मिश्र भक्ति को सूचित करने वाला है। दसवें अध्याय के ३५वें श्लोक से शुरू करके उद्धव ने भौतिक बन्धन तथा भौतिक जीवन से मोक्ष के विषय में जिज्ञासा की। भगवान् ने यह कहते हुए विस्तृत उत्तर दिया कि भक्ति के बिना दार्शनिक चिन्तन कभी पूर्ण नहीं हो सकता। ग्यारहवें अध्याय के श्लोक १८ में भगवान् पर श्रद्धा के महत्त्व को और श्लोक २३ में भक्ति की विस्तृत व्याख्या करते हुए इस पर बल दिया गया है कि मनुष्य को श्रद्धावान् होना चाहिए और भगवान् की महिमा का श्रवण एवं कीर्तन करना चाहिए। भगवान् इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भक्ति का विकास तथा भक्ति की पूर्णता भक्तों की संगति पर निर्भर करती है। ग्यारहवें अध्याय के २६वें श्लोक में उद्धव ने भक्ति के वास्तविक साधनों के विषय में तथा भक्ति की सिद्धि के लक्षणों के विषय में पूछताछ की। श्लोक ४८ में भगवान् कृष्ण ने यह कहा कि भक्ति ग्रहण किये बिना मोक्ष का प्रयास व्यर्थ है। मनुष्य को चाहिए कि भगवद्भक्तों की संगति करे और उनके चरण-चिह्नों का अनुगमन करे। अन्त में इस अध्याय के १४वें श्लोक में भगवान् ने सकाम कर्म तथा मनोकल्पना का स्पष्ट तिरस्कार किया है और श्लोक १५ में यह संस्तुति की है कि अपने हृदय से उनकी शरण ग्रहण करे।

जीवन-सिद्धि के विषय में ऐसे विस्तृत तथा शास्त्रीय उपदेश पाकर उद्धव मोहग्रस्त हो गये हैं और उनका मन संशयग्रस्त है कि वे क्या करें। भगवान् कृष्ण ने कई विधियाँ तथा उनके फल बतलाये हैं, जो एक ही लक्ष्य भगवान् कृष्ण तक ले जाने वाले हैं। इसलिए उद्धव चाहते हैं कि भगवान् कृष्ण साफ-साफ शब्दों में बतलायें कि क्या किया जाना चाहिए। अर्जुन ने भगवद्गीता के तृतीय अध्याय के प्रारम्भ में भगवान् से ऐसा ही अनुरोध किया है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार उद्धव यहाँ यह कह रहे हैं कि “हे मित्र कृष्ण! पहले तो आपने वर्णाश्रम प्रणाली के अन्तर्गत मुझसे सांसारिक कर्म करने के लिए संस्तुति की और उसके बाद यह सलाह दी कि मैं ऐसे कर्मों का बहिष्कार करके ज्ञान- मार्ग का अनुसरण करूँ। अब ज्ञान के मार्ग का बहिष्कार करके मुझे भक्तियोग में अपनी शरण में आने की संस्तुति कर रहे हैं। यदि मैं आपके निर्णय को मान लूँ, तो भविष्य में आप फिर से अपने पहले तथ्य पर आकर सांसारिक कर्म करने की संस्तुति कर सकते हैं। अपने मन की बात को प्रकट करने की अपनी निर्भीकता द्वारा उद्धव भगवान् कृष्ण से अपनी घनिष्ठ मित्रता प्रकट करते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥