श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 17

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
स एष जीवो विवरप्रसूति:
प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्ट: ।
मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्य रूपं
मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठ: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; स: एष:—साक्षात् वे; जीव:—सभी को जीवन देने वाले, भगवान्; विवर—हृदय के भीतर; प्रसूति:—प्रकट; प्राणेन—प्राण के साथ; घोषेण—ध्वनि की सूक्ष्म अभिव्यक्ति द्वारा; गुहाम्—हृदय में; प्रविष्ट:—प्रविष्ट हुए; मन:-मयम्—मन से अनुभव किये जाने वाले अथवा शिव जैसे महान् देवताओं के भी मन को वश में करते हुए; सूक्ष्मम्— सूक्ष्म; उपेत्य—स्थित होकर; रूपम्—स्वरूप; मात्रा—विभिन्न मात्राएँ; स्वर:—विभिन्न स्वर; वर्ण:—अक्षर की विभिन्न ध्वनियाँ; इति—इस प्रकार; स्थविष्ठ:—स्थूल रूप ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : हे उद्धव, भगवान् हर एक को जीवन प्रदान करते हैं और प्राण-वायु तथा आदि ध्वनि (नाद) के सहित हृदय के भीतर स्थित हैं। भगवान् को उनके सूक्ष्म रूप में हृदय के भीतर मन के द्वारा देखा जा सकता है, क्योंकि भगवान् हर एक के मन को वश में रखते हैं, चाहे वह शिवजी जैसा महान् देवता ही क्यों न हो। भगवान् वेदों की ध्वनियों के रूप में जो ह्रस्व तथा दीर्घ स्वरों तथा विभिन्न स्वरविन्यास वाले व्यंजनों से बनी होती हैं स्थूल रूप धारण करते हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने कृष्ण तथा उद्धव के मध्य हुई वार्ता पर अपनी टीका इस प्रकार दी है। उद्धव संशयग्रस्त तथा मोहग्रस्त थे, क्योंकि कृष्ण ने भक्ति, ज्ञान, त्याग, योग, तपस्या, पुण्यकर्म आदि विभिन्न विधियाँ बतलाई थीं। किन्तु ये सारी विधियाँ जीवों को भगवान् कृष्ण की शरण प्राप्त करने में सहायता प्रदान करने के निमित्त हैं। अन्तत: किसी वैदिक विधि को अन्य किसी प्रकार से नहीं समझना चाहिए। इस तरह कृष्ण ने सम्पूर्ण वैदिक प्रणाली को उचित क्रम में रखते हुए बतलाया। वस्तुत: कृष्ण को आश्चर्य हो रहा था कि उद्धव मूर्खतापूर्ण क्योंकर सोचते हैं कि उन्हें हर विधि का अभ्यास करना चाहिए जैसे कि हर विधि उन्हीं के निमित्त है? इसलिए भगवान् कृष्ण अपने भक्त को बताना चाहते हैं, “हे उद्धव! जब मैंने तुमसे यह कहा था कि सांख्य का अभ्यास किया जाय, पुण्यकर्म किये जाय, भक्ति आवश्यक है, योग-विधियों का पालन हो, तपस्या की जाय, तो मैं तुम्हारे माध्यम से सारे जीवों को उपदेश दे रहा था। मैं जो कह चुका हूँ, जो कह रहा हूँ और जो कुछ कहूँगा वह विभिन्न पदों पर स्थित सारे जीवों के लिए मार्गदर्शन के रूप में समझा जाना चाहिए। तुम यह कैसे सोच सकते हो कि तुम्हीं समस्त वैदिक विधियों का अभ्यास करने के लिए हो? जिस रूप में अभी तुम हो उसी रूप में मैं तुम्हें अपना शुद्ध भक्त मान रहा हूँ। तुम इन सारी विधियों को सम्पन्न करने के लिए नहीं हो।” इस तरह श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार भगवान् कृष्ण मृदु तथा उत्साहप्रद शब्दों से वैदिक विधियों की विविधता के पीछे छिपे गूढ़ार्थ को उद्धव को प्रकट करते हैं।
भगवान् कृष्ण ब्रह्मा के मुख से वेदों के रूप में प्रकट हुए। इस श्लोक का विवर-प्रसूति शब्द यह भी सूचित करता है कि ब्रह्माजी के शरीर के भीतर स्थित आधारादिचक्र के भीतर प्रकट होते हैं। घोषेण शब्द का अर्थ है “सूक्ष्म ध्वनि” और गुहां प्रविष्ट: शब्द भी सूचित करता है कि भगवान् आधारचक्र के भीतर प्रविष्ट होते हैं। भगवान् अन्य चक्रों के भीतर भी, यथा मणिपूरक चक्र तथा विशुद्धि चक्र में भी देखे जा सकते हैं। संस्कृत अक्षर दीर्घ तथा ह्रस्व स्वरों तथा उदात्त और अनुदात्त व्यञ्जनों से बने हैं। वैदिक ग्रंथों की विविध शाखाओं में इन ध्वनियों से भगवान् का स्थूल रूप प्रकट किया जाता है। भगवद्गीता के अनुसार ऐसे ग्रंथों में तीन गुणों का वर्णन मिलता है—त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। श्रील श्रीधर स्वामी बतलाते हैं कि माया के नियंत्रण के कारण भगवान् बद्धात्मा को ब्रह्माण्ड के अंशरूप में प्रतीत होते हैं। भगवान् पर काल्पनिक स्थूल तथा सूक्ष्म गुणों का आरोप अविद्या कहलाता है और ऐसी अविद्या से जीव अपने को अपने कर्मों का कर्ता मानने लगता है तथा कर्म बन्धन में बँध जाता है। इसलिए बद्ध आत्मा को शुद्ध करने के लिए वेदों में प्रवृत्ति मार्ग तथा निवृति का आदेश है। जब मनुष्य शुद्ध हो जाता है, तो वह सकाम कर्म की इस अवस्था का परित्याग कर देता है, क्योंकि शुद्ध भक्ति सम्पन्न करने में यह बाधक है। तब वह अचल श्रद्धा द्वारा भगवान् की पूजा कर सकता है। जिसने पूर्ण कृष्णभावनामृत विकसित कर लिया है, वह कर्मकाण्ड में प्रवृत्त नहीं होता। जैसा भगवद्गीता में कहा गया है—तस्य कार्यं न विद्यते।

श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार इस श्लोक को दूसरी तरह से भी समझा जा सकता है। जीव शब्द भगवान् कृष्ण का द्योतक है, जो वृन्दावनवासियों को जीवन प्रदान करने वाले हैं। विवर-प्रसूति बताता है कि यद्यपि भगवान् अपनी लीलाएँ बद्धजीवों की दृष्टि से परे वैकुण्ठ-लोक में नित्य करते रहते हैं, किन्तु इन्हीं लीलाओं को प्रदर्शित करने के लिए वे भौतिक जगत में भी प्रविष्ट होते हैं। गुहां प्रविष्ट: यह सूचित करता है कि ऐसी लीलाएँ प्रदर्शित करके भगवान् उन्हें समेट लेते हैं और ऐसी अप्रकट लीलाओं में प्रवेश करते हैं, जो बद्धजीवों के लिए प्रकट नहीं हैं। इस प्रसंग में मात्रा शब्द भगवान् की दिव्य इन्द्रियों का सूचक है और स्वर भगवान् की दिव्य ध्वनि तथा गायन का सूचक है। वर्ण भगवान् के दिव्य रूप का सूचक है। स्थविष्ठ: शब्द यह बतलाता है कि इस जगत में भगवान् उन भक्तों के लिए भी प्रकट होते हैं, जो कृष्णभावनामृत में बढ़े-चढ़े नहीं हैं और जिनकी दृष्टि पूरी तरह से शुद्ध नहीं हुई है। मनोमय बताता है कि भगवान् को जिस-तिस भाँति मन में रखना होता है। अभक्तों के लिए भगवान् कृष्ण सूक्ष्म हैं, क्योंकि उन्हें जाना नहीं जा सकता। इस तरह विभिन्न आचार्यों ने इस श्लोक की दिव्य ध्वनि के माध्यम से भगवान् कृष्ण की महिमा भिन्न भिन्न प्रकारों से बतलाई है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥