श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 18

 
श्लोक
यथानल: खेऽनिलबन्धुरुष्मा
बलेन दारुण्यधिमथ्यमान: ।
अणु: प्रजातो हविषा समेधते
तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह; अनल:—अग्नि; खे—काठ के भीतर रिक्त स्थान में; अनिल—वायु; बन्धु:—जिसकी सहायता; उष्मा— गर्मी; बलेन—दृढ़ता से; दारुणि—काठ के भीतर; अधिमथ्यमान:—रगड़ से जलाई जाने पर; अणु:—अत्यन्त सूक्ष्म; प्रजात:— उत्पन्न होती है; हविषा—घी के साथ; समेधते—बढ़ती है; तथा—उसी तरह; एव—निस्सन्देह; मे—मेरा; व्यक्ति:—अभिव्यक्ति; इयम्—यह; हि—निश्चय ही; वाणी—वैदिक ध्वनि ।.
 
अनुवाद
 
 जब काठ के टुकडों को जोर से आपस में रगड़ा जाता है, तो वायु के सम्पर्क से उष्मा उत्पन्न होती है और अग्नि की चिनगारी प्रकट होती है। एक बार अग्नि जल जाने पर उसमें घी डालने पर अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठती है। इसी प्रकार मैं वेदों की ध्वनि के कम्पन में प्रकट होता हूँ।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर भगवान् कृष्ण वैदिक ज्ञान का परम गुह्य अर्थ बतलाते हैं। वेद सर्वप्रथम सामान्य भौतिक कर्म को नियमित करते हैं और उनके फल को अनुष्ठानिक यज्ञों की दिशा में मोड़ कर कर्ता को भावी लाभ दिलाते हैं। किन्तु इन यज्ञों का असली उद्देश्य भौतिकतावादी कर्मी द्वारा अपने कर्मफल को श्रेष्ठ वैदिक सत्ता को अर्पित करने का अभ्यास कराना है। कुशल कर्मी धीरे-धीरे भौतिक भोग में रुचि लेना छोड़ कर स्वभावत: अपने पद पर दार्शनिक चिन्तन की उच्च अवस्था की ओर बढ़ता है। वर्धित ज्ञान से वह परम पुरुष की असीम महिमा से परिचित होता है और धीरे-धीरे दिव्य परम सत्य की भक्ति करने लगता है। भगवान् कृष्ण वैदिक ज्ञान के लक्ष्य हैं, जैसाकि भगवान् ने भगवद्गीता में कहा है—वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्य:। भगवान् धीरे धीरे वैदिक अनुष्ठान की सरणि में उसी तरह प्रकट होते हैं, जिस तरह काष्ठों को रगडऩे से धीरे धीरे अग्नि प्रकट होती है। हविषा समेधते द्वारा यह सूचित होता है कि वैदिक यज्ञ में लगातार प्रगति से धीरे धीरे आध्यात्मिक ज्ञानरूपी अग्नि जल उठती है, और हर एक को प्रकाशित करके सकाम कर्मपाश को नष्ट करती है।
भगवान् कृष्ण ने उद्धव को यह विस्तृत दिव्य ज्ञान सुनने के लिए सर्वाधिक योग्य व्यक्ति माना है, इसीलिए भगवान् कृपा करके उद्धव को उपदेश देते हैं, जिससे वे बदरिकाश्रम के मुनियों को प्रकाशित कर सकें और उनके जीवन-उद्देश्य को पूरा कर सकें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥