श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 19

 
श्लोक
एवं गदि: कर्म गतिर्विसर्गो
घ्राणो रसो द‍ृक् स्पर्श: श्रुतिश्च ।
सङ्कल्पविज्ञानमथाभिमान:
सूत्रं रज:सत्त्वतमोविकार: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; गदि:—वाणी; कर्म—हाथों का कर्म; गति:—पाँवों का कार्य; विसर्ग:—जननेन्द्रिय तथा गुदा के कार्य; घ्राण:—गन्ध; रस:—स्वाद; दृक्—दृष्टि; स्पर्श:—स्पर्श; श्रुति:—सुनना; च—भी; सङ्कल्प—मन का कार्य; विज्ञानम्—बुद्धि तथा चेतन का कार्य; अथ—साथ ही; अभिमान:—मिथ्या अहंकार का कार्य; सूत्रम्—प्रधान का कार्य; रज:—रजोगुण; सत्त्व—सतोगुण; तम:—तथा तमोगुण; विकार:—रूपान्तर ।.
 
अनुवाद
 
 कर्मेन्द्रियों के कार्य यथा वाक्, हाथ, पैर, उपस्थ एवं नाक, जीभ, आँख, त्वचा तथा कान ज्ञानेन्द्रियों के कार्य के साथ ही मन, बुद्धि, चेतना तथा अहंकार जैसी सूक्ष्म इन्द्रियों के कार्य एवं सूक्ष्म प्रधान के कार्य तथा तीनों गुणों की अन्योन्य क्रिया—इन सबों को मेरा भौतिक व्यक्त रूप समझना चाहिए।
 
तात्पर्य
 गदि शब्द द्वारा भगवान् वैदिक ध्वनि के रूप में अपनी अभिव्यक्ति के विषय में विवेचना समाप्त करते हैं और अन्य कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों के कार्यों, चेतना के सूक्ष्म कार्यों, प्रधान तथा प्रकृति के तीनों गुणों की अन्योन्य क्रिया का वर्णन करते हैं। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति समूचे जगत को भगवान् की शक्तियों की अभिव्यक्ति के रूप में देखता है। इसलिए भौतिक इन्द्रियतृप्ति के लिए कोई उचित स्थान नहीं रह जाता, क्योंकि प्रत्येक
वस्तु भगवान् का अंश है और उन्हीं की है। जो व्यक्ति सूक्ष्म तथा स्थूल भौतिक अभिव्यक्तियों में भगवान् के अंश को समझ सकता है, वह इस जगत में रहने की इच्छा त्याग देता है। आध्यात्मिक जगत में हर वस्तु नित्य, आनन्दमय तथा ज्ञानमय है। इस भौतिक जगत की एकमात्र विशेषता है कि यहाँ पर जीव अपने को स्वामी मानता है। किन्तु विवेकी व्यक्ति इस व्यामोह को त्याग कर माया के राज्य में कोई आकर्षण नहीं पाता, इसलिए वह भगवद्धाम वापस जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥