श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 20

 
श्लोक
अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि-
रव्यक्त एको वयसा स आद्य: ।
विश्लिष्टशक्तिर्बहुधेव भाति
बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
अयम्—यह; हि—निश्चय ही; जीव:—परम व्यक्ति जो अन्यों को जीवन देता है; त्रि-वृत्—तीन गुणों वाला; अब्ज—ब्रह्माण्ड रूपी कमल के फूल का; योनि:—स्रोत; अव्यक्त:—अप्रकट; एक:—अकेला; वयसा—कालक्रम से; स:—वह; आद्य:— नित्य; विश्लिष्ट—विभक्त; शक्ति:—शक्तियाँ; बहुधा—अनेक विभागों में; इव—सदृश; भाति—प्रकट होता है; बीजानि— बीज; योनिम्—खेत में; प्रतिपद्य—गिर कर; यत्-वत्—जिस तरह ।.
 
अनुवाद
 
 जब खेत में कई बीज डाले जाते हैं, तो एक ही स्रोत मिट्टी से असंख्य वृक्ष, झाडिय़ाँ, वनस्पतियाँ निकल आती हैं। इसी तरह सबों के जीवनदाता तथा नित्य भगवान् आदि रूप में विराट जगत के क्षेत्र के बाहर स्थित रहते हैं। किन्तु कालक्रम से तीनों गुणों के आश्रय तथा ब्रह्माण्ड रूप कमल-फूल के स्रोत भगवान् अपनी भौतिक शक्तियों को विभाजित करते हैं और असंख्य रूपों में प्रकट प्रतीत होते हैं, यद्यपि वे एक हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील वीरराघवाचार्य की टीका है कि कोई यह प्रश्न कर सकता है कि देवताओं, मनुष्यों, पशुओं, पौधों, ग्रहों इत्यादि से युक्त यह विराट ब्रह्माण्ड वास्तव में किसका है? अब भगवान् कृष्ण विराट ब्रह्माण्ड के स्रोत के विषय में किसी भी संशय का उच्छेदन करते हैं। त्रि-वृत् शब्द बतलाता है कि प्रकृति के तीनों गुण स्वतंत्र नहीं हैं, अपितु परम नियन्ता के अधीन हैं। वृत् प्रत्यय का अर्थ है वर्तनम्, अर्थात् भगवान् के भीतर तीनों गुणों का “अस्तित्व,” अब्ज-योनि शब्द में अब् “जल” का सूचक है और ज “जन्म” का। इस प्रकार अब्ज का अर्थ हुआ यह जटिल ब्रह्माण्ड जो गर्भोदक सागर में शयन कर रहे गर्भोदकशायी विष्णु से फूटता है। योनि अर्थात् “स्रोत” सूचक है भगवान् का, अत: अब्ज-योनि का अर्थ यह है कि भगवान् समस्त ब्रह्माण्ड के स्रोत हैं, निस्सन्देह भगवान् के भीतर ही सारी सृष्टि का जन्म होता है। चूँकि तीनों गुण भगवान् के अधीन हैं, अतएव भगवान् की
इच्छानुसार इस ब्रह्माण्ड-आवरण के भीतर भौतिक वस्तुओं का सृजन तथा संहार होता रहता है। अव्यक्त शब्द भगवान् के सूक्ष्म आध्यात्मिक स्वरूप को बतलाने वाला है, जो भौतिक सृष्टि के पूर्व अकेले विद्यमान रहता है। दिव्य होने के कारण भगवान् के आदि रूप का न तो जन्म होता है, न रूपान्तर, न मृत्यु होती है। यह शाश्वत है। कालक्रम से भगवान् की भौतिक शक्तियाँ विभक्त हो जाती हैं और शरीर, शारीरिक साज-सामग्री, इन्द्रिय-विषय, शारीरिक विस्तार, अहंकार तथा मिथ्या स्वामित्व के रूप में प्रकट होती हैं। इस तरह भगवान् अपनी जीव शक्ति का विस्तार करते हैं, जो मनुष्यों, देवताओं, पशुओं इत्यादि के असंख्य रूपों में प्रकट होती है। खेत में बोये गये बीजों के उदाहरण से हम यह जान सकते हैं कि एक ही स्रोत से असंख्य अभिव्यक्तियाँ होती हैं। इसी तरह यद्यपि भगवान् एक हैं, किन्तु अपनी विविध शक्तियों के माध्यम से, वे असंख्य रूपों में प्रकट होते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥