श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 21

 
श्लोक
यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं
पटो यथा तन्तुवितानसंस्थ: ।
य एष संसारतरु: पुराण:
कर्मात्मक: पुष्पफले प्रसूते ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
यस्मिन्—जिसमें; इदम्—यह ब्रह्माण्ड; प्रोतम्—चौड़ाई में बुना हुआ, बाना; अशेषम्—सम्पूर्ण; ओतम्—तथा लम्बाई में, ताना; पट:—वस्त्र; यथा—जिस तरह; तन्तु—धागों का; वितान—विस्तार; संस्थ:—स्थित; य:—जो; एष:—यह; संसार— भौतिक जगत रूपी; तरु:—वृक्ष; पुराण:—सनातन से विद्यमान; कर्म—सकाम कर्मों की ओर; आत्मक:—सहज भाव से उन्मुख; पुष्प—पहला परिणाम, फूल; फले—तथा फल; प्रसूते—उत्पन्न होने पर ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार बुना हुआ वस्त्र ताने-बाने पर आधारित रहता है, उसी तरह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड लम्बाई तथा चौड़ाई में भगवान् की शक्ति पर फैला हुआ है और उन्हीं के भीतर स्थित है। बद्धजीव पुरातन काल से भौतिक शरीर स्वीकार करता आया है और ये शरीर विशाल वृक्षों की भाँति हैं, जो अपना पालन कर रहे हैं। जिस प्रकार एक वृक्ष पहले फूलता है और तब फलता है, उसी तरह भौतिक शरीर रूपी वृक्ष विविध फल देता है।
 
तात्पर्य
 वृक्ष में फल आने के पूर्व फूल प्रकट होते हैं। इसी तरह पुष्प-फले शब्द, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, संसार के सुख-दुख को सूचित करने वाला है। भले ही मनुष्य का जीवन पुष्पित होता प्रतीत हो, किन्तु अन्तत: उसमें जरा, मृत्यु इत्यादि विपदाओं के कटु फल प्रकट होते हैं। भौतिक शरीर के प्रति अनुरक्ति, जिसकी प्रवृत्ति सदा इन्द्रियतृप्ति होती है, यही जगत का मूल कारण है, इसलिए यह संसार-तरु कहलाता है। भगवान् की बहिरंगा शक्ति का दोहन सनातन काल से चला आ रहा है, जैसाकि पुराण: कर्मात्मक: शब्दों से व्यक्त हुआ है। यह ब्रह्माण्ड भगवान् की मायाशक्ति का विस्तार है और यह सदैव उन्हीं पर आश्रित है, तथा उनसे अभिन्न है। इस सीधे-से ज्ञान से बद्धजीव माया के दुखी संसार में अन्तहीन भ्रमण करने से बच सकता है।
पुष्प-फले का अर्थ इन्द्रियतृप्ति तथा मोक्ष भी लगाया जा सकता है। संसार-तरु की अधिक व्याख्या अगले श्लोकों में की जायेगी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥