श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 22-23

 
श्लोक
द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनाल:
पञ्चस्कन्ध: पञ्चरसप्रसूति: ।
दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड-
स्त्रिवल्कलो द्विफलोऽर्कं प्रविष्ट: ॥ २२ ॥
अदन्ति चैकं फलमस्य गृध्रा
ग्रामेचरा एकमरण्यवासा: ।
हंसा य एकं बहुरूपमिज्यै-
र्मायामयं वेद स वेद वेदम् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
द्वे—दो; अस्य—इस वृक्ष के; बीजे—बीज; शत—सैकड़ों; मूल:—जड़ों के; त्रि—तीन; नाल:—डंठल; पञ्च—पाँच; स्कन्ध:—ऊपरी तना; पञ्च—पाँच; रस—रस; प्रसूति:—उत्पन्न करते हुए; दश—दस; एक—तथा एक; शाख:—शाखाएँ; द्वि—दो; सुपर्ण—पक्षियों के; नीड:—घोंसला; त्रि—तीन; वल्कल:—छाल; द्वि—दो; फल:—फल; अर्कम्—सूर्य; प्रविष्ट:— तक फैला हुआ; अदन्ति—खाते हैं; च—भी; एकम्—एक; फलम्—फल; अस्य—इस वृक्ष का; गृध्रा:—भौतिक भोग के लिए कामुक; ग्रामे—गृहस्थ-जीवन में; चरा:—सजीव; एकम्—दूसरा; अरण्य—जंगल में; वासा:—वास करने वाले; हंसा:—हंस जैसे व्यक्ति, साधु-पुरुष; य:—जो; एकम्—एक, परमात्मा; बहु-रूपम्—अनेक रूपों में प्रकट होकर; इज्यै:— पूज्य गुरुओं की सहायता से; माया-मयम्—भगवान् की शक्ति से उत्पन्न; वेद—जानता है; स:—ऐसा व्यक्ति; वेद—जानता है; वेदम्—वैदिक वाङ्मय के असली अर्थ को ।.
 
अनुवाद
 
 इस संसार रूपी वृक्ष के दो बीज, सैकड़ों जड़ें, तीन निचले तने तथा पाँच ऊपरी तने हैं। यह पाँच प्रकार के रस उत्पन्न करता है। इसमें ग्यारह शाखाएँ हैं और दो पक्षियों ने एक घोंसला बना रखा है। यह वृक्ष तीन प्रकार की छालों से ढका है। यह दो फल उत्पन्न करता है और सूर्य तक फैला हुआ है। जो लोग कामुक हैं और गृहस्थ-जीवन में लगे हैं, वे वृक्ष के एक फल का भोग करते हैं और दूसरे फल का भोग संन्यास आश्रम के हंस सदृश व्यक्ति करते हैं। जो व्यक्ति प्रामाणिक गुरु की सहायता से इस वृक्ष का एक परब्रह्म की शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में अनेक रूपों में प्रकट हुआ समझ लेता है, वही वैदिक वाङ्मय के असली अर्थ को जानता है।
 
तात्पर्य
 इस वृक्ष के दो बीज—पापमय तथा पुण्य कर्म हैं और सैकड़ों जड़ें जीवों की असंख्य भौतिक इच्छाएँ हैं, जो उन्हें भवसागर में जकड़े रखती हैं। तीन निचले तने तीन गुणों को बताते हैं और पाँच ऊपरी तने पाँच स्थूल तत्त्वों को बताते हैं। यह वृक्ष पाँच रस उत्पन्न करता है—ये हैं ध्वनि, रूप, स्पर्श, स्वाद तथा सुगंध। इसमें ग्यारह शाखाएँ हैं—पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन। दो पक्षियों ने, अर्थात् आत्मा तथा परमात्मा ने, इस वृक्ष में अपना घोंसला बना रखा है। तीन प्रकार की छालें हैं वात, पित्त, तथा कफ, जो शरीर के अवयव हैं। इस वृक्ष के दो फल हैं, सुख तथा दुख।
जो लोग सुन्दर स्त्रियों, धन तथा माया के विलासी पक्षों का भोग करने का प्रयास करते हैं, उन्हें दुख रूपी फल प्राप्त होता है। यह जान लेना चाहिए कि स्वर्गलोक में भी चिन्ता तथा मृत्यु हैं। जिन लोगों ने भौतिक लक्ष्यों का परित्याग कर दिया है और आध्यात्मिक प्रकाश के मार्ग पर हैं, वे सुख रूपी फल भोगते हैं। जो व्यक्ति प्रामाणिक गुरु की सहायता लेता है, वह यह समझ सकता है कि यह विशाल वृक्ष अद्वितीय भगवान् की बहिरंगा शक्ति की अभिव्यक्ति मात्र है। यदि कोई व्यक्ति भगवान् को समस्त वस्तुओं के कारण रूप में देख सकता है, तो उसका ज्ञान पूर्ण होता है। अन्यथा यदि वह वैदिक अनुष्ठानों में या भगवान् के ज्ञान के बिना वैदिक चिन्तन में फँस जाता है, तो उसे जीवन-सिद्धि प्राप्त नहीं हो पाती।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥