श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 24

 
श्लोक
एवं गुरूपासनयैकभक्त्या
विद्याकुठारेण शितेन धीर: ।
विवृश्‍च्‍य जीवाशयमप्रमत्त:
सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार (मेरे द्वारा प्रदत्त ज्ञान से); गुरु—गुरु की; उपासनया—उपासना या पूजा से; एक—शुद्ध; भक्त्या—भक्ति से; विद्या—ज्ञान की; कुठारेण—कुल्हाड़ी से; शितेन—तेज; धीर:—ज्ञान के द्वारा स्थिर रहने वाला; विवृश्च्य—काट कर; जीव—जीव का; आशयम्—सूक्ष्म शरीर (तीन गुणों से उत्पन्न उपाधियों से पूर्ण); अप्रमत्त:—आध्यात्मिक जीवन में अत्यन्त सतर्क; सम्पद्य—प्राप्त करके; च—तथा; आत्मानम्—परमात्मा को; अथ—तब; त्यज—त्याग दो; अस्त्रम्—सिद्धि प्राप्त करने के साधन को ।.
 
अनुवाद
 
 तुम्हें चाहिए कि तुम धीर बुद्धि से गुरु की सावधानी पूर्वक पूजा द्वारा शुद्ध भक्ति उत्पन्न करो तथा दिव्य ज्ञान रूपी तेज कुल्हाड़ी से आत्मा के सूक्ष्म भौतिक आवरण को काट दो। भगवान् का साक्षात्कार होने पर तुम उस तार्किक बुद्धि रूपी कुल्हाड़े को त्याग दो।
 
तात्पर्य
 चूँकि उद्धव को भगवान् कृष्ण का साक्षात् सान्निध्य प्राप्त था, अतएव उन्हें बद्धजीव जैसी मनोवृत्ति बनाये रखने की आवश्यकता नहीं थीं। इस तरह जैसाकि यहाँ पर सम्पद्य चात्मानम् शब्दों द्वारा बताया गया है, उद्धव स्वयं वैकुण्ठ में भगवान् के चरणकमलों की सेवा कर सके। उद्धव ने इस विस्तृत वार्ता के प्रारम्भ में ही इस सुअवसर के लिए प्रार्थना की थी। जैसाकि गुरुपासनयैकभक्त्या द्वारा बतलाया गया है, प्रामाणिक गुरु की पूजा करके शुद्ध भक्ति प्राप्त की जा सकती है। यहाँ यह नहीं कहा गया है कि कोई शुद्ध भक्ति या अपने गुरु का परित्याग कर दे। प्रत्युत विद्याकुठारेण द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य को इस अध्याय में कृष्ण द्वारा वर्णित भौतिक जगत का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। उसे यह समझ लेना चाहिए कि भौतिक सृष्टि का हर पक्ष भगवान् की मायाशक्ति का विस्तार है। ऐसा ज्ञान जगत रूपी वृक्ष की जड़ों को काटने के लिए तेज कुल्हाड़ी का काम करता है। इस तरह तीन गुणों से उत्पन्न कठोर सूक्ष्म शरीर भी खण्ड खण्ड किया जा सकता है और मनुष्य अप्रमत्त, अर्थात् कृष्णभावनामृत में विवेकी और सतर्क बन जाता है।
इस अध्याय में कृष्ण ने स्पष्ट बतलाया है कि वृन्दावन की गोपिकाएँ जीवन के प्रति वैश्लेषिक दृष्टिकोण में रुचि नहीं रखती थीं। वे तो केवल कृष्ण से प्रेम करती थीं और उनके अतिरिक्त कुछ भी नहीं सोच सकती थीं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह शिक्षा दी है कि उनके सारे भक्त उच्च कोटि का निष्काम भगवत्प्रेम उत्पन्न करने के लिए व्रज-बालाओं के पदचिह्नों का अनुसरण करें। भगवान् कृष्ण ने भौतिक जगत के स्वभाव की विस्तृत व्याख्या इसीलिए की है, जिससे इस जगत का भोग करने का प्रयास कर रहे बद्धजीव इस ज्ञान रूपी कुल्हाड़े से संसार रूपी वृक्ष को काट सकें। सम्पद्य चात्मानम् से यह सूचित होता है कि ऐसे ज्ञान से युक्त व्यक्ति को फिर शरीर नहीं मिलता, क्योंकि उसने पहले से भगवान् को प्राप्त कर रखा है। ऐसे व्यक्ति को इस माया-सृष्टि के अपने ज्ञान को लगातार परिष्कृत करते हुए माया के राज्य में इधर-उधर विचरण नहीं करना चाहिए। जिसने कृष्ण को सर्वस्व मान लिया है, वह भगवान् की सेवा का नित्य आनन्द भोग सकता है। इस जगत में रहते हुए भी, उसका इससे कोई नाता नहीं रहता और इसका निषेध करने की वैश्लेषिक विधियों को वह त्याग देता है। इसीलिए उद्धव से भगवान् कहते हैं, त्यजास्त्रम् “तुम वैश्लेषिक ज्ञान रूपी कुल्हाड़ी को त्याग दो, जिससे तुमने अपने स्वामित्व भाव तथा भौतिक जगत में निवास को काट डाला है।”
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध के अन्तर्गत “वैराग्य तथा ज्ञान से आगे” नामक बारहवें अध्याय के श्रील भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के विनीत सेवकों द्वारा विरचित तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥