श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 3-6

 
श्लोक
सत्सङ्गेन हि दैतेया यातुधाना मृगा: खगा: ।
गन्धर्वाप्सरसो नागा: सिद्धाश्चारणगुह्यका: ॥ ३ ॥
विद्याधरा मनुष्येषु वैश्या: शूद्रा: स्त्रियोऽन्त्यजा: ।
रजस्तम:प्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगे युगे ॥ ४ ॥
बहवो मत्पदं प्राप्तास्त्वाष्ट्रकायाधवादय: ।
वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषण: ॥ ५ ॥
सुग्रीवो हनुमानृक्षो गजो गृध्रो वणिक्पथ: ।
व्याध: कुब्जा व्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्‍यस्तथापरे ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
सत्-सङ्गेन—मेरे भक्तों की संगति से; हि—निश्चय ही; दैतेया:—दिति के पुत्र; यातुधाना:—असुरगण; मृगा:—पशु; खगा:— पक्षी; गन्धर्व—गन्धर्वगण; अप्सरस:—स्वर्गलोक की वेश्याएँ; नागा:—सर्प; सिद्धा:—सिद्धलोक के वासी; चारण—चारण; गुह्यका:—गुह्यक; विद्याधरा:—विद्याधर लोक के वासी; मनुष्येषु—मनुष्यों में से; वैश्या:—व्यापारी लोग; शूद्रा:—श्रमिक; स्त्रिय:—स्त्रियाँ; अन्त्य-जा:—असभ्य लोग; रज:-तम:-प्रकृतय:—रजो तथा तमोगुणों से बँधे हुए; तस्मिन् तस्मिन्—उसी उसी प्रत्येक में; युगे युगे—युग में; बहव:—अनेक जीव; मत्—मेरे; पदम्—धाम को; प्राप्ता:—प्राप्त हुए; त्वाष्ट्र—वृत्रासुर; कायाधव—प्रह्लाद महाराज; आदय:—इत्यादि; वृषपर्वा—वृषपर्वा नामक; बलि:—बलि महाराज; बाण:—बाणासुर; मय:— मय दानव; च—भी; अथ—इस प्रकार; विभीषण:—रावण का भाई विभीषण; सुग्रीव:—वानरराज सुग्रीव; हनुमान्—महान् भक्त हनुमान; ऋक्ष:—जाम्बवान; गज:—गजेन्द्र नामक भक्त हाथी; गृध्र:—जटायु गृद्ध; वणिक्पथ:—तुलाधार नामक बनिया; व्याध:—धर्म व्याध; कुब्जा—कुब्जा नामक वेश्या, जिसकी रक्षा कृष्ण ने की; व्रजे—वृन्दावन में; गोप्य:—गोपियाँ; यज्ञ पत्न्य:—यज्ञकर्ता ब्राह्मणों की पत्नियाँ; तथा—उसी प्रकार; अपरे—अन्य ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक युग में रजो तथा तमोगुण में फँसे अनेक जीवों ने मेरे भक्तों की संगति प्राप्त की। इस प्रकार दैत्य, राक्षस, पक्षी, पशु, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक तथा विद्याधर जैसे जीवों के साथ साथ वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ तथा अन्य निम्न श्रेणी के मनुष्य मेरे धाम को प्राप्त कर सके। वृत्रासुर, प्रह्लाद महाराज तथा उन जैसे अन्यों ने मेरे भक्तों की संगति के द्वारा मेरे धाम को प्राप्त किया। इसी तरह वृषपर्वा, बलि महाराज, बाणासुर, मय, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवान, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार, धर्मव्याध, कुब्जा, वृन्दावन की गोपियाँ तथा यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की पत्नियाँ भी मेरा धाम प्राप्त कर सकीं।
 
तात्पर्य
 भगवान् ने यह दिखाने के लिए कि किस तरह वे अपने शरणागतों के वश में होते हैं, वृन्दावन की गोपियों जैसे भक्तों तथा बाणासुर जैसे असुरों का उल्लेख किया है। यह ज्ञात है कि यहाँ पर उल्लिखित गोपियों तथा अन्य भक्तों को शुद्ध कृष्ण-प्रेम प्राप्त हुआ था, जबकि असुरों को केवल मोक्ष प्राप्त हुआ था। कई असुर भगवद्भक्तों की संगति से शुद्ध हुए थे और अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण कार्यों में भगवान् की भक्ति को स्वीकार किया था। किन्तु प्रह्लाद तथा बलि महाराज जैसे महान् भक्त भक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते और इसे ही वे अपने प्राण के तुल्य मानते हैं। फिर भी सुधरे हुए असुरों का भी उल्लेख किया गया है, जिससे श्रीमद्भागवत के पाठक भगवद्भक्तों की संगति से मिलने वाले अपार लाभ को समझ सकें।
वृत्रासुर असुर अपने पूर्वजन्म में पवित्र राजा चित्रकेतु था और उसने श्री नारद मुनि, श्री अंगिरा मुनि तथा भगवान् संकर्षण का सान्निध्य प्राप्त किया था। हिरण्यकशिपु के पुत्र होने से प्रह्लाद महाराज दैत्य समझे जाते हैं। फिर भी जब वे अपनी माता कयाधू के गर्भ में थे, तो उन्हें ध्वनि के माध्यम से नारद मुनि की संगति प्राप्त हुई थी। वृषपर्वा असुर को उसकी माता ने जन्म देते ही त्याग दिया था। किन्तु वह किसी मुनि द्वारा पाला जाकर भगवान् विष्णु का भक्त बना। बलि महाराज ने अपने पितामह प्रह्लाद महाराज की तथा भगवान् वामन देव की भी संगति प्राप्त की थी। बलि महाराज का पुत्र बाणासुर अपने पिता तथा शिवजी की संगति से रक्षा प्राप्त कर सका। वह भगवान् कृष्ण की संगति में भी आया, जब उन्होंने उसके एक हजार हाथों में से दो को छोडक़र शेष हाथ काट दिये, जिन्हें शिवजी ने वर के रूप में प्रदान किया था। भगवान् कृष्ण की महिमा समझ लेने पर बाणासुर भी महान् भक्त बन गया। मय दानव ने पाण्डवों के लिए सभाभवन तैयार किया और भगवान् कृष्ण की संगति में भी आया और अन्त में भगवान् की शरण ग्रहण की। विभीषण रावण का भाई था और पवित्र स्वभाव का असुर था। उसने हनुमान तथा रामचन्द्र की संगति की।

सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवान तथा गजेन्द्र ऐसे पशुओं के उदाहरण हैं, जिन्होंने भगवान् की कृपा प्राप्त की। जाम्बवान् या ऋक्षराज एक वानर जाति का सदस्य था। उसे भगवान् कृष्ण की संगति तब प्राप्त हुई थी जब उसने स्यमंतक मणि के लिए उनसे युद्ध किया था। गजेन्द्र हाथी ने अपने पूर्व जीवन में भक्तों की संगति की थी और अपने इस जीवन के अन्त में भगवान् द्वारा बचाया गया था। जटायु पक्षी ने, जिसने अपना प्राण देकर भगवान् रामचन्द्र की सहायता की, श्री गरुड़ तथा महाराज दशरथ और रामलीला में अन्य भक्तों की भी सहायता की थी। उसने सीता तथा रामचन्द्र से भेंट की थी। श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार गन्धर्वों, अप्सराओं, नागों, सिद्धों, चारणों, गुह्यकों तथा विद्याधरों ने भक्तों से जिस तरह की संगति की वह बहुत प्रमुख न थी, इसलिए उसके उल्लेख की आवश्यकता नहीं है। वणिकपथ एक वैश्य है, जिसकी कथा महाभारत में जाजलि मुनि के अभिमान के प्रसंग में उल्लिखित है।

धर्मव्याध, एक अहिंसक व्याध, की कथा वराह पुराण में वर्णित है, जिसमें भक्तों की संगति की महत्ता बताई गई है। अपने पूर्व जीवन में वह ब्रह्म राक्षस बन गया था, किन्तु अन्त में उसका उद्धार हो गया। पूर्व कलियुग में उसकी संगति वासु नामक वैष्णव राजा से हुई थी। कुब्जा को भगवान् की प्रत्यक्ष संगति प्राप्त हुई। वह अपने पूर्वजन्म में श्री नारद मुनि के सान्निध्य में थी। वृन्दावन की गोपियों ने अपने पूर्वजन्मों में साधु-पुरुषों की सेवाएँ की थीं। भक्तों के साथ प्रचुर संगति के फलरूप वे अगले जन्म में वृन्दावन में गोपियाँ बनीं और वहाँ पर अवतरित मुक्त गोपियों की संगति में आईं। उनकी संगति तुलसी देवी या वृन्दा देवी से भी थीं। यज्ञकर्ता ब्राह्मणों की पत्नियों को कृष्ण द्वारा भेजी गई फूल-माला तथा सुपारी बेचने वाली स्त्रियों की संगति प्राप्त हुई थी, जिनसे उन्होंने भगवान् कृष्ण के विषय में सुना था।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥