श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 7

 
श्लोक
ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमा: ।
अव्रतातप्ततपस: मत्सङ्गान्मामुपागता: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
ते—वे; न—नहीं; अधीत—अध्ययन करके; श्रुति-गणा:—वैदिक वाङ्मय; न—नहीं; उपासित—पूजा किया हुआ; महत्- तम:—महान् सन्त; अव्रत—व्रत के बिना; अतप्त—बिना किये; तपस:—तपस्या; मत्-सङ्गात्—मेरे तथा मेरे भक्तों की संगति से; माम्—मुझको; उपागता:—उन्होंने प्राप्त किया ।.
 
अनुवाद
 
 मैंने जिन व्यक्तियों का उल्लेख किया है, उन्होंने न तो वैदिक वाङ्मय का गहन अध्ययन किया था, न महान् सन्तों की पूजा की थी, न कठिन व्रत या तपस्या ही की थी। मात्र मेरे तथा मेरे भक्तों की संगति से, उन्होंने मुझे प्राप्त किया।
 
तात्पर्य
 जैसाकि पहले उल्लेख हुआ है, वैदिक वाङ्मय का अध्ययन श्रुति मंत्रों की शिक्षा देने वालों की पूजा, व्रत तथा तपस्या करना इत्यादि ऐसी सहायक विधियाँ हैं, जो भगवान् को प्रसन्न करने वाली हैं। किन्तु इस श्लोक में भगवान् पुन: बतलाते हैं कि ऐसी सारी विधियाँ भगवान् तथा उनके भक्तों की संगति करने की मुख्य विधि से गौण हैं। मनुष्य अन्य विधियों से भगवान् तथा उनके भक्तों की संगति प्राप्त कर सकता
है, जिससे जीवन की सिद्धि मिल सकती है। मत्-संगात् शब्द को सत्- संगात् भी पढ़ा जा सकता है, जिसका भी वही अर्थ निकलता है। मत्-संगात् पाठ में मत् से यह भी अर्थ निकलता है “जो मेरे हैं” अर्थात् भक्त। श्रील श्रीधर स्वामी उल्लेख करते हैं कि शुद्ध भक्त अपनी ही संगति से कृष्णभावनामृत में प्रगति कर सकता है, क्योंकि अपने कार्यों तथा चेतना से संगति करने से ही वह भगवान् से संगति करता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥