श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 8

 
श्लोक
केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मृगा: ।
येऽन्ये मूढधियो नागा: सिद्धा मामीयुरञ्जसा ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
केवलेन—शुद्ध; हि—निस्सन्देह; भावेन—प्रेम से; गोप्य:—गोपियाँ; गाव:—वृन्दावन की गाएँ; नगा:—वृन्दावन के जड़ प्राणी यथा यमलार्जुन वृक्ष; मृगा:—अन्य पशु; ये—जो; अन्ये—अन्य; मूढ-धिय:—जड़ बुद्धि वाले; नागा:—वृन्दावन के सर्प, यथा कालिय; सिद्धा:—जीवन की सिद्धि पाकर; माम्—मेरे पास; ईयु:—आये; अञ्जसा—अत्यन्त सरलता से ।.
 
अनुवाद
 
 गोपियों समेत वृन्दावन के वासी, गौवें, अचर जीव यथा यमलार्जुन वृक्ष, पशु, जड़ बुद्धि वाले जीव यथा झाडिय़ाँ तथा जंगल और सर्प यथा कालिय—इन सबों ने मुझसे शुद्ध प्रेम करने के ही कारण जीवन की सिद्धि प्राप्त की और इस तरह आसानी से मुझे प्राप्त किया।
 
तात्पर्य
 यद्यपि असंख्य जीवों ने भगवान् तथा उनके भक्तों की संगति से मोक्ष प्राप्त किया, किन्तु ऐसे अनेक पुरुषों ने तपस्या, दान, चिन्तन इत्यादि जैसी अन्य विधियाँ भी अपनाईं। किन्तु जैसाकि हम कह चुके हैं, ये विधियाँ गौण हैं। किन्तु वृन्दावन के वासी यथा गोपियाँ कृष्ण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं जानती थीं और उनके जीवन का सारा उद्देश्य कृष्ण से प्रेम करना था, जैसाकि केवलेन हि भावेन शब्दों से सूचित होता है। यहाँ तक कि वृक्ष, झाडिय़ाँ तथा गोवर्धन पर्वत भगवान् कृष्ण से प्रेम करते थे। भगवान् श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध (१०.१५.५) में अपने भाई श्री बलदेव को बतलाते हैं— अहो अमी देववरामरार्चितं पदाम्बुजं ते सुमन:फलार्हणम्।
नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मनस् तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम् ॥

“हे बलदेव! देखो न! ये वृक्ष किस तरह अपनी शाखाएँ झुकाकर आपके उन चरणकमलों को नमस्कार कर रहे हैं, जो देवताओं द्वारा भी पूज्य हैं। हे भ्राता! आप परमेश्वर हैं, इसीलिए इन वृक्षों ने आपकी भेंटस्वरूप फलों तथा फूलों को उत्पन्न किया है। यद्यपि जीव तमोगुण के कारण वृक्ष के रूप में जन्म लेता हैं, किन्तु वृन्दावन में इस तरह जन्म लेकर, ये वृक्ष आपके चरणकमलों की सेवा करके अपने जीवन का सारा अंधकार नष्ट कर रहे हैं।”

यद्यपि अनेक जीवों ने अनेक प्रकार से भगवान् तथा उनके भक्तों की संगति के द्वारा भगवान् कृष्ण की कृपा प्राप्त की है, किन्तु जो भगवान् कृष्ण को सर्वस्व मानते हैं, वे आध्यात्मिक साक्षात्कार की सर्वोच्च विधि को प्राप्त होते हैं। इसलिए भगवान् ने इस श्लोक में मिश्र विधियों से सिद्धि पाने वालों की चर्चा न करके वृन्दावन के शुद्ध भक्तों की प्रशंसा की है, जिनमें गोपियाँ सर्वप्रमुख हैं, जो कृष्ण के अतिरिक्त और कुछ जानती ही नहीं। वृन्दावनवासी कृष्ण के साथ अपने सम्बन्धों से इतने सन्तुष्ट रहते थे कि उन्होंने मनोधर्म या सकाम कर्म द्वारा अपनी प्रेमाभक्ति को दूषित नहीं होने दिया। गोपियों ने भगवान् कृष्ण की सेवा माधुर्य रस में की, जबकि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार गौवों ने वात्सल्य रस में कृष्ण से प्रेम किया, क्योंकि गौवें बालक कृष्ण के लिए सदैव दूध देती थीं। गोवर्धन पर्वत तथा अन्य पर्वत जैसे जड़ पदार्थ कृष्ण से सखा के रूप में प्रेम करते थे और वृन्दावन के सामान्य पशु, वृक्ष तथा झाडिय़ाँ कृष्ण से दास्यरस में प्रेम करते थे। कालिय जैसे सर्प भी इसी रस में प्रेम करते थे, इन सबों ने भगवान् कृष्ण की प्रेमाभक्ति का आस्वाद करने के पश्चात् भगवद्धाम प्राप्त किया। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार वृन्दावन के इन सारे वासियों को नित्य मुक्तात्माएँ मानना चाहिए जैसाकि सिद्धा शब्द द्वारा व्यक्त हुआ है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥