श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  »  श्लोक 9

 
श्लोक
यं न योगेन साङ्ख्येन दानव्रततपोऽध्वरै: ।
व्याख्यास्वाध्यायसन्न्यासै: प्राप्नुयाद् यत्नवानपि ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
यम्—जिनको; न—नहीं; योगेन—योग द्वारा; साङ्ख्येन—दार्शनिक चिन्तन द्वारा; दान—दान; व्रत—व्रत; तप:—तपस्या; अध्वरै:—अथवा वैदिक कर्मकाण्ड द्वारा; व्याख्या—अन्यों से वैदिक ज्ञान की विवेचना द्वारा; स्वाध्याय—वेदों का निजी अध्ययन; सन्न्यासै:—अथवा संन्यास ग्रहण करके; प्राप्नुयात्—प्राप्त कर सकता है; यत्न-वान्—महान् प्रयास से; अपि—भी ।.
 
अनुवाद
 
 योग, चिन्तन, दान, व्रत, तपस्या, कर्मकाण्ड, अन्यों को वैदिक मंत्रों की शिक्षा, वेदों का निजी अध्ययन या संन्यास में बड़े-बड़े प्रयास करते हुए लगे रहने पर भी मनुष्य, मुझे प्राप्त नहीं कर सकता।
 
तात्पर्य
 यहाँ भगवान् कृष्ण बतलाते हैं कि कोई परम सत्य तक पहुँचने के लिए कितना ही गम्भीर प्रयास क्यों न करें, भगवान् की संगति प्राप्त कर पाना अत्यन्त कठिन है। वृन्दावनवासी यथा गोपियाँ तथा गौवें भगवान् कृष्ण के साथ सदैव रहती थीं, अतएव उनकी संगति सत्संग कहलाती है। जो कोई भगवान् के साथ ठीक से रहता है, वह सत् अर्थात् नित्य बन जाता है, अतएव ऐसे व्यक्ति की संगति अन्य लोगों को तुरन्त ही भक्ति प्रदान कर सकती है। चान्द्रायण नामक तप में चन्द्रमा के घटने के साथ भोजन की मात्रा प्रतिदिन एक एक कौर घटाई जाती है और चन्द्रमा के बढऩे के साथ साथ प्रतिदिन एक एक कौर बढ़ाई जाती है। इसी तरह अनेक कष्टप्रद कर्मकाण्ड हैं और संस्कृत के कठिन वैदिक मंत्र हैं, जो अन्यों को सिखलाये जा सकते हैं। ये कठिन कार्य तब तक जीवन की परम सिद्धि नहीं प्रदान कर सकते जब तक उसे भगवद्भक्तों की अहैतुकी कृपा प्राप्त न हो। श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध (१.२-८) में कहा गया है—
धर्म: स्वनुष्ठित: पुंसां विष्वक्सेनकथासु य:।

नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥

“अपने पद के अनुसार व्यक्ति द्वारा किये गये वृत्तिपरक कार्य यदि भगवान् के सन्देश के प्रति आकर्षण उत्पन्न नहीं कर पात तो ये व्यर्थ के श्रम होते।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥