श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 12: वैराग्य तथा ज्ञान से आगे  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में वृन्दावनवासियों की पवित्र संगति तथा उनके शुद्ध प्रेम की सर्वोत्कृष्टता की महिमा का वर्णन हुआ है।
सन्त-भक्तों की संगति से भौतिक जीवन के प्रति आत्मा की अनुरक्ति नष्ट होती है और इससे भगवान् कृष्ण तक वश में हो जाते हैं। न तो योग, सांख्य दर्शन, सामान्य धार्मिक कृत्य, शास्त्रों का अध्ययन, तपस्या, त्याग, इष्टा तथा पूर्तम् के कार्य, दान, उपवास, अर्चापूजा, गुप्त मंत्र, तीर्थस्थानों का भ्रमण, न ही बड़े या छोटे विधि-विधानों के पालन से ऐसा फल मिल सकता है। प्रत्येक युग में असुर, दैत्य, पक्षी तथा पशु होते रहे हैं, जो रजो तथा तमोगुणी थे और मनुष्यों में भी व्यापारी, स्त्रियाँ, मजदूर तथा अछूत श्रेणी के लोग थे, जो वैदिक शास्त्र का अध्ययन नहीं कर सकते थे। तो भी भक्तों की संगति के शुद्धीकरण प्रभाव से वे सभी भगवद्धाम प्राप्त कर सके। किन्तु ऐसी साधु-संगति के बिना योग, सांख्य अध्ययन, दान, व्रत तथा संन्यास-आश्रम में उद्यमशील लोग भगवान् को पाने में असमर्थ रहते हैं।

व्रज की तरुणियाँ, भगवान् कृष्णचन्द्र के असली स्वरूप से अज्ञानी रहने के कारण, उन्हें अपना आनन्ददाता जारपति मानती थीं। फिर भी श्रीकृष्ण के साथ अपनी निरन्तर संगति के कारण वे परम- पूर्ण सत्य प्राप्त कर सकीं, जिसे ब्रह्मा जैसे बड़े बड़े देवता तक प्राप्त नहीं कर पाते। वृन्दावन की तरुणियों ने भगवान् कृष्ण के प्रति प्रगाढ़ अनुराग प्रदर्शित किया, जिससे उनके साथ होने के आनन्द से अभिभूत उनके मन उनके साथ बिताई गई सारी रात को एक क्षण का भी अंश मानती थीं। किन्तु जब अक्रूर श्रीकृष्ण को बलराम समेत मथुरा ले गये, तो गोपियों ने उनके बिना प्रत्येक रात्रि को देवताओं के कल्प के समान बिताया। भगवान् कृष्ण के बिछोह से पीडि़त वे यह कल्पना न कर सकीं कि उनकी वापसी के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु उन्हें सन्तोष प्रदान कर सकती है। यह ईश्वर के प्रति गोपियों के शुद्ध प्रेम की अद्वितीय श्रेष्ठता है।

उद्धव को ये उपदेश दे चुकने के बाद श्रीकृष्ण ने उद्धव को यह सलाह दी कि परम सत्य प्राप्त करने के लिए श्रुतियों तथा स्मृतियों में बताये गये धर्म-अधर्म के सारे विचारों को त्यागकर, वे वृन्दावन की स्त्रियों की तरह शरण ग्रहण करें।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥