श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयेन्मन: ।
अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
भूत-सूक्ष्म—सूक्ष्म तत्त्वों के; आत्मनि—आत्मा में; मयि—मुझमें; तत्-मात्रम्—अनुभूति के सूक्ष्म तात्विक रूपों पर; धारयेत्— एकाग्र करे; मन:—मन को; अणिमानम्—अणिमा नामक सिद्धि; अवाप्नोति—प्राप्त करता है; तत्-मात्र—सूक्ष्म तत्त्वों में; उपासक:—पूजा करने वाला; मम—मेरा ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति अपने मन को समस्त सूक्ष्म तत्त्वों में व्याप्त मेरे सूक्ष्म रूप में एकाग्र करके मेरी पूजा करता है, वह अणिमा नामक योग-सिद्धि प्राप्त करता है।
 
तात्पर्य
 अणिमा सूचक है अपने को छोटे-से-छोटा बनाने की शक्ति और किसी भी वस्तु के भीतर प्रवेश करने की सामर्थ्य का। भगवान् परमाणुओं तथा सूक्ष्म कणों के भीतर हैं और जो व्यक्ति भगवान् के उस सूक्ष्म रूप में अपने मन को ठीक से एकाग्र करता है, वह अणिमा नामक योगशक्ति प्राप्त करता है, जिससे मनुष्य पत्थर जैसे सघन पदार्थ के भीतर भी प्रवेश कर सकता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥