श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
महत्यात्मनि य: सूत्रे धारयेन्मयि मानसम् ।
प्राकाम्यं पारमेष्ठ्यं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मन: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
महति—महत्-तत्त्व में; आत्मनि—परमात्मा में; य:—जो; सूत्रे—सकाम कर्मों की शृंखला से जाना जाने वाला; धारयेत्— एकाग्र करे; मयि—मुझमें; मानसम्—मानसिक कार्य; प्राकाम्यम्—प्राकाम्य नामक सिद्धि; पारमेष्ठ्यम्—सर्वोत्तम; मे—मुझसे; विन्दते—प्राप्त करता है या भोगता है; अव्यक्त-जन्मन:—उससे जिसके प्राकट्य को इस जगत में अनुभव नहीं किया जा सकता ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति सकाम कर्मों की शृंखला को अभिव्यक्त करने वाले महत् तत्त्व की उस अवस्था के परमात्मा रूप मुझमें अपनी सारी मानसिक क्रियाएँ एकाग्र करता है, वह अव्यक्त रूप मुझसे प्राकाम्य नामक सर्वोत्तम योग-सिद्धि प्राप्त करता है।
 
तात्पर्य
 श्रील वीरराघव आचार्य बतलाते हैं कि सूत्र शब्द यह सूचित करने के लिए प्रयुक्त हुआ है कि महत् तत्त्व मनुष्य के सकाम कर्मों को उसी तरह धारण करता है, जिस प्रकार डोरा रत्नों को बाँधे रखता है। इस तरह महत् तत्त्व की आत्मा रूप भगवान् में स्थिर ध्यान से, मनुष्य प्राकाम्य नामक सर्वोत्कृष्ट सिद्धि पा सकता है। अव्यक्त-जन्मन: सूचित करता है कि भगवान् अव्यक्त या आध्यात्मिक आकाश से प्रकट होते हैं अथवा उनका जन्म अव्यक्त है। जब तक कोई भगवान् के दिव्य रूप को स्वीकार नहीं कर लेता, तब तक प्राकाम्य या कोई अन्य सिद्धि प्राप्त करने की सम्भावना नहीं रहती।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥