श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
यो वै मद्भ‍ावमापन्न ईशितुर्वशितु: पुमान् ।
कुतश्चिन्न विहन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो (योगी); वै—निस्सन्देह; मत्—मुझसे; भावम्—स्वभाव; आपन्न:—प्राप्त किया गया; ईशितु:—परम शासक से; वशितु:—परम नियन्ता से; पुमान्—पुरुष (योगी); कुतश्चित्—किसी प्रकार से; न विहन्येत—विचलित नहीं हो सकता; तस्य—उसका; च—भी; आज्ञा—आदेश; यथा—जिस तरह; मम—मेरा ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति ठीक से मेरा ध्यान करता है, वह परम शासक तथा नियन्ता होने का मेरा स्वभाव प्राप्त कर लेता है। तब मेरे ही समान उसका आदेश किसी भी तरह से व्यर्थ नहीं जाता।
 
तात्पर्य
 भगवान् के आदेश से ही सम्पूर्ण सृष्टि घूमती है। जैसाकि भगवद्गीता (९.१०) में कहा गया है—

मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्।

हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥

“हे कुन्ती-पुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरी अध्यक्षता में कार्य करती है, जिससे सारे चर तथा अचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। उसके शासन में यह जगत बारम्बार सृजित और विनष्ट होता रहता है।” इसी तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने आदेश दिया है कि सारे विश्व के लोग कृष्णभावनामृत को ग्रहण करें। भगवान् के निष्ठावान भक्तों को चाहिए कि महाप्रभु के आदेश को विश्व-भर में दुहरायें। इस तरह वे ऐसे आदेश देने के भगवान् के योग-ऐश्वर्य में सहभागी हो सकते हैं जिनका कभी निराकरण नहीं हो सकता।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥