श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
अग्‍न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपु: ।
मद्योगशान्तचित्तस्य यादसामुदकं यथा ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
अग्नि—आग; आदिभि:—इत्यादि (सूर्य, जल, विष इत्यादि) के द्वारा; न—नहीं; हन्येत—चोट पहुँचाया जा सकता है; मुने:—चतुर योगी के; योग-मयम्—योग-विज्ञान में पूरी तरह अनुशीलित; वपु:—शरीर; मत्-योग—मेरी भक्ति से; शान्त— शान्त किया गया; चित्तस्य—चित्त वाले का; यादसाम्—जलचरों के; उदकम्—जल; यथा—जिस तरह ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह जलचरों के शरीरों को जल से चोट नहीं पहुँचती, उसी प्रकार जिस योगी की चेतना मेरी भक्ति से शान्त हुई रहती है और जो योग-विज्ञान में पूर्णतया विकसित होता है, उसका शरीर अग्नि, सूर्य, जल, विष इत्यादि से क्षतिग्रस्त नहीं किया जा सकता।
 
तात्पर्य
 समुद्र में रहने वाले जीवों को जल से कभी चोट नहीं पहुँचती, प्रत्युत जल के भीतर वे जीवन का आनन्द लेते हैं। इसी तरह, जो व्यक्ति योग-युक्तियों में दक्ष होता है उसके लिए हथियारों, अग्नि, विष इत्यादि के आक्रमणों से अपने को बचा लेना एक खिलवाड़ होता है। प्रह्लाद महाराज पर उसके पिता ने इन सभी विधियों से वार किया था, किन्तु पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होने के कारण उन्हें चोट नहीं पहुँची। भगवद्भक्तगण भगवान् कृष्ण की कृपा पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं क्योंकि भगवान् योगेश्वर हैं और उनमें अनन्त योगशक्ति रहती है। चूँकि भक्तगण भगवान् कृष्ण से जुड़े होते हैं, अतएव उनमें अपने प्रभु, अपने रक्षक भगवान् में पहले से उपस्थित शक्तियों को अलग से विकसित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

यदि कोई व्यक्ति मध्य समुद्र में गिर जाय तो वह तुरन्त डूब जाता है, किन्तु उन्हीं तरंगों में मछली क्रीड़ा करते हुए सुख का अनुभव करती है। इसी प्रकार भवसागर में पतित बद्धजीव अपने पापों में डूबते रहते हैं जबकि भक्तगण इस जगत को भगवान् की शक्ति मानते हुए भगवान् कृष्ण की प्रेमाभक्ति में लग कर आनन्दमय लीलाओं का भोग करते हैं।

 
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