श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 2: नौ योगेन्द्रों से महाराज निमि की भेंट  » 
 
 
 
 
संक्षेप विवरण:  इस अध्याय में नारद मुनि महाराज निमि तथा नौ योगेन्द्रों के बीच हुई वार्ता को श्रद्धालु तथा जिज्ञासु वसुदेव को सुनाकर भागवत धर्म की शिक्षा देते हैं। भगवान् कृष्ण...
 
श्लोक 1:  श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे कुरुश्रेष्ठ, भगवान् कृष्ण की पूजा में संलग्न रहने के लिए उत्सुक नारद मुनि कुछ काल तक द्वारका में रहते रहे, जिसकी रक्षा गोविन्द सदैव अपनी बाहुओं से करते थे।
 
श्लोक 2:  हे राजन्, इस भौतिक जगत में बद्धजीवों को जीवन के पग-पग पर मृत्यु का सामना करना पड़ता है। इसलिए बद्धजीवों में ऐसा कौन होगा, जो बड़े से बड़े मुक्त पुरुष के लिए भी पूज्य भगवान् मुकुन्द के चरणकमलों की सेवा नहीं करेगा।
 
श्लोक 3:  एक दिन देवर्षि नारद वसुदेव के घर आये। उनकी उपयुक्त सामग्री से पूजा करके, सुखपूर्वक बिठाने तथा सादर प्रणाम करने के बाद वसुदेव इस प्रकार बोले।
 
श्लोक 4:  श्री वसुदेव ने कहा : हे प्रभु, जिस तरह पिता का आगमन उसके बच्चों के लिए लाभप्रद होता है, उसी तरह आपका आगमन सारे जीवों के लाभ के लिए है। आप उनमें से जो अत्यन्त दुखियारे हैं तथा साथ ही साथ वे जो उत्तमश्लोक भगवान् के पथ पर अग्रसर हैं, उनकी विशेष रूप से सहायता करते हैं।
 
श्लोक 5:  देवताओं के कार्यकलापों से जीवों को दुख तथा सुख दोनों प्राप्त होते हैं, किन्तु अच्युत भगवान् को अपनी आत्मा मानने वाले, आप जैसे महान् सन्तों के कार्यों से समस्त प्राणियों को केवल सुख ही प्राप्त होता है।
 
श्लोक 6:  जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे भेंट (उपहार) के अनुसार देवताओं से वैसा ही फल पाते हैं। देवतागण कर्म के उसी तरह अनुचर हैं, जिस तरह मनुष्य की छाया मनुष्य की अनुचर है, किन्तु साधुगण सचमुच ही पतितों पर दयालु होते हैं।
 
श्लोक 7:  हे ब्राह्मण, यद्यपि मैं आपके दर्शन मात्र से सन्तुष्ट हूँ, तो भी आपसे मैं उन कर्तव्यों के विषय में पूछना चाहता हूँ, जो भगवान् को आनन्द प्रदान करने वाले हैं। जो भी मर्त्य प्राणी इनके विषय में श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, वह समस्त प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है।
 
श्लोक 8:  इस पृथ्वी पर मैंने अपने पूर्वजन्म में मुक्तिप्रदाता भगवान् अनन्त की पूजा तो की, किन्तु मैं सन्तान का इच्छुक था, अतएव मैंने उनकी पूजा मुक्ति के लिए नहीं की थी। इस तरह मैं भगवान् की माया से मोहग्रस्त था।
 
श्लोक 9:  हे प्रभु, आप सदैव अपने व्रत पर खरे उतरते हैं। कृपया मुझे स्पष्ट आदेश दें, जिससे आपकी दया से मैं अपने को इस संसार से आसानी से मुक्त कर सकूँ, जो अनेक संकटों से पूर्ण है और हमें सदैव भय से बाँधे रहता है।
 
श्लोक 10:  शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्, देवर्षि नारद अत्यन्त बुद्धिमान वसुदेव के प्रश्नों से अतीव प्रसन्न हुए। चूँकि वे प्रश्न भगवान् के दिव्य गुणों का स्मरण कराने वाले थे, अतएव उन्हें कृष्ण का स्मरण हो आया। अत: नारद ने वसुदेव को इस प्रकार उत्तर दिया।
 
श्लोक 11:  श्री नारद ने कहा : हे सात्वत-श्रेष्ठ, तुमने ठीक ही भगवान् के प्रति जीव के शाश्वत कर्तव्य के विषय में मुझसे पूछा है। भगवान् के प्रति ऐसी भक्ति इतनी शक्तिशाली होती है कि इसके करने से सारा विश्व पवित्र हो सकता है।
 
श्लोक 12:  भगवान् के प्रति की गई शुद्ध भक्ति आध्यात्मिक रूप से इतनी प्रबल होती है कि ऐसी दिव्य सेवा के विषय में मात्र सुनने, सुनकर इसकी महिमा का गायन करने, इसका ध्यान करने, आदरपूर्वक तथा श्रद्धापूर्वक इसे स्वीकार करने या अन्यों की भक्ति की प्रशंसा करने से, वे मनुष्य भी तुरन्त शुद्ध हो जाते हैं, जो देवताओं से तथा अन्य सारे जीवों से घृणा करते हैं।
 
श्लोक 13:  आपने आज मुझे अपने प्रभु, परम आनन्दमय भगवान् नारायण का स्मरण करा दिया। परमेश्वर इतने कल्याणमय हैं कि जो कोई भी उनका श्रवण एवं कीर्तन करता है, वह पूरी तरह से पवित्र बन जाता है।
 
श्लोक 14:  भगवान् की भक्तिमय सेवा की व्याख्या करने के लिए मुनियों ने महात्मा राजा विदेह तथा ऋषभ-पुत्रों के मध्य हुई वार्ता का प्राचीन इतिहास सुनाया है।
 
श्लोक 15:  स्वायम्भुव मनु को महाराज प्रियव्रत नामक पुत्र हुआ और प्रियव्रत के पुत्रों में से आग्नीध्र था, जिससे नाभि उत्पन्न हुआ। नाभि का पुत्र ऋषभदेव कहलाया।
 
श्लोक 16:  श्री ऋषभदेव को भगवान् वासुदेव का अंश माना जाता है। उन्होंने इस जगत में उन धार्मिक सिद्धान्तों का प्रसार करने के लिए अवतार लिया था, जिनसे जीवों को चरम मोक्ष प्राप्त होता है। उनके एक सौ पुत्र थे, वे सभी वैदिक ज्ञान में पारंगत थे।
 
श्लोक 17:  भगवान् ऋषभदेव के एक सौ पुत्रों में से सबसे ज्येष्ठ भरत थे, जो भगवान् नारायण के प्रति पूर्णतया समर्पित थे। भरत की ख्याति के कारण ही यह लोक अब महान् भारतवर्ष के नाम से विख्यात है।
 
श्लोक 18:  राजा भरत ने सारे भौतिक आनन्द को क्षणिक तथा व्यर्थ मानते हुए इस जगत का परित्याग कर दिया। अपनी सुन्दर युवा पत्नी तथा परिवार को छोडक़र उन्होंने कठोर तपस्या द्वारा भगवान् की पूजा की और तीन जन्मों के बाद भगवद्धाम प्राप्त किया।
 
श्लोक 19:  ऋषभदेव के शेष पुत्रों में से नौ पुत्र भारतवर्ष के नौ द्वीपों के शासक बने। और उन्होंने इस लोक पर पूर्ण आधिपत्य जमाया। शेष इक्यासी पुत्र द्विज ब्राह्मण बन गये और उन्होंने सकाम यज्ञों (कर्मकाण्ड) के वैदिक मार्ग का शुभारम्भ करने में सहायता की।
 
श्लोक 20-21:  ऋषभदेव के शेष नौ पुत्र अत्यन्त भाग्यशाली मुनि थे, जिन्होंने परम सत्य के ज्ञान का विस्तार करने के लिए घोर परिश्रम किया। वे नंगे रहकर इधर-उधर विचरण करते थे और आध्यात्मिक विज्ञान में अतीव दक्ष थे। इनके नाम थे—कवि, हविर्, अन्तरीक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्र ुमिल, चमस तथा करभाजन।
 
श्लोक 22:  ये मुनि, समस्त ब्रह्माण्ड को इसके सारे स्थूल तथा सूक्ष्म पदार्थों सहित, भगवान् के प्राकट्य के रूप में तथा आत्मा से अभिन्न देखते हुए पृथ्वी पर विचरण करते थे।
 
श्लोक 23:  नवों योगेन्द्र मुक्तात्माएँ हैं, जो देवताओं, सिद्धों, साध्यों, गन्धर्वों, यक्षों, मानवों तथा किन्नरों एवं सर्पों के लोकों में मुक्त भाव से विचरण करते हैं। उनके मुक्त विचरण को कोई संसारी शक्ति रोक नहीं सकती और वे अपनी इच्छानुसार मुनियों, देवदूतों, शिवजी के भूत-प्रेत अनुयायियों, विद्याधरों, ब्राह्मणों तथा गौवों के लोकों में विचरण कर सकते हैं।
 
श्लोक 24:  एक बार वे अजनाभ में (पृथ्वी का पूर्ववर्ती नाम) महाराजा निमि के यज्ञ में पहुँचे, जो महर्षियों की देखरेख में सम्पन्न किया जा रहा था।
 
श्लोक 25:  हे राजन्, तेज में सूर्य की बराबरी करने वाले उन भगवद्भक्तों को देखकर वहाँ पर उपस्थित सबके सब—यज्ञ सम्पन्न करने वाले, ब्राह्मण तथा यज्ञ की अग्नियाँ भी—सम्मान में उठकर खड़े हो गये।
 
श्लोक 26:  राजा विदेह (निमि) समझ गये कि नवों मुनि भगवान् के परम भक्त थे। इसलिए उनके शुभ आगमन से अत्याधिक प्रफुल्लित होकर उन्होंने उन्हें उचित आसन प्रदान किया और उचित ढंग से पूजा की, जिस तरह कोई भगवान् की पूजा करता है।
 
श्लोक 27:  दिव्य आनन्द से विभोर होकर राजा ने विनयपूर्वक अपना शीश झुकाया और तब नौ मुनियों से प्रश्न पूछना शुरू किया। ये नवों महात्मा अपने ही तेज से चमक रहे थे और इस प्रकार से ब्रह्मा के पुत्रों अर्थात् चार कुमारों के समान प्रतीत हो रहे थे।
 
श्लोक 28:  राजा विदेह ने कहा : मैं सोचता हूँ कि आप मधु असुर के शत्रु-रूप में प्रसिद्ध भगवान् के निजी संगी हैं। दरअसल, भगवान् विष्णु के शुद्ध भक्त ब्रह्माण्ड-भर में किसी स्वार्थवश नहीं, अपितु समस्त बद्धजीवों को पवित्र करने के निमित्त विचरण करते रहते हैं।
 
श्लोक 29:  बद्धजीवों के लिए मनुष्य-शरीर प्राप्त कर पाना सबसे अधिक कठिन है और यह किसी भी क्षण नष्ट हो सकता है। किन्तु मैं सोचता हूँ कि जिन्होंने मनुष्य-जीवन प्राप्त कर भी लिया है, उनमें से विरले ही उन शुद्ध भक्तों की संगति प्राप्त कर पाते हैं, जो वैकुण्ठ के स्वामी को अत्यन्त प्रिय हैं।
 
श्लोक 30:  अतएव हे अनघो, मैं आपसे पूछता हूँ कि कृपा करके मुझे यह बतायें कि परम कल्याण क्या है? इस जन्म-मृत्यु के जगत में शुद्ध भक्तों के साथ आधे क्षण की भी संगति किसी मनुष्य के लिए अमूल्य निधि है।
 
श्लोक 31:  यदि आप यह समझें कि मैं इन कथाओं को ठीक तरह से सुनने में समर्थ हूँ, तो कृपा करके बतलायें कि भगवान् की भक्ति में किस तरह प्रवृत्त हुआ जाता है? जब कोई जीव भगवान् को अपनी सेवा अर्पित करता है, तो भगवान् तुरन्त प्रसन्न हो जाते हैं और बदले में शरणागत व्यक्ति को अपने आपको भी दे डालते हैं।
 
श्लोक 32:  श्री नारद ने कहा : हे वसुदेव, जब महाराज निमि नव-योगेन्द्रों से भगवद्भक्ति के विषय में पूछ चुके, तो उन साधु-श्रेष्ठों ने राजा को उसके प्रश्नों के लिए धन्यवाद दिया और यज्ञ सभा के सदस्यों तथा ब्राह्मण पुरोहितों की उपस्थिति में उससे स्नेहपूर्वक कहा।
 
श्लोक 33:  श्री कवि ने कहा : मैं मानता हूँ कि जिसकी बुद्धि भौतिक क्षणभंगुर जगत को ही मिथ्यापूर्वक आत्मस्वरूप मानने से निरन्तर विचलित रहती है, वह अच्युत भगवान् के चरणकमलों की पूजा द्वारा ही अपने भय से मुक्ति पा सकता है। ऐसी भक्ति में सारा भय दूर हो जाता है।
 
श्लोक 34:  अज्ञानी जीव भी परमेश्वर को सरलता से जान पाते हैं, यदि वे उन साधनों को अपनाएँ, जिन्हें भगवान् ने स्वयं निर्दिष्ट किया है। भगवान् ने जो विधि संस्तुत की है, वह भागवतधर्म अथवा भगवान् की भक्ति है।
 
श्लोक 35:  हे राजन्, जो व्यक्ति भगवान् के प्रति इस भक्तियोग को स्वीकार कर लेता है, वह इस संसार में अपने मार्ग पर कभी कोई बड़ी भूल नहीं करेगा। यदि वह अपनी आँखें बन्द करके दौड़ लगा लो, तो भी वह न तो लडख़ड़ाएगा न पतित होगा।
 
श्लोक 36:  बद्ध जीवन में अर्जित विशेष स्वभाव के अनुसार मनुष्य अपने शरीर, वचन, मन, इन्द्रिय, बुद्धि या शुद्ध चेतना से, जो कुछ करता है उसे यह सोचते हुए परमात्मा को अर्पित करना चाहिए कि यह भगवान् नारायण की प्रसन्नता के लिए है।
 
श्लोक 37:  जब जीव भगवान् की बहिरंगा माया शक्ति में लीन होने के कारण भौतिक शरीर के रूप में गलत से अपनी पहचान करता है, तब भय उत्पन्न होता है। इस प्रकार जीव जब भगवान् से मुख मोड़ लेता है, तो वह भगवान् के दास रूप में अपनी स्वाभाविक स्थिति को भी भूल जाता है। यह मोहने वाली भयपूर्ण दशा माया द्वारा प्रभावित होती है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भगवान् की अनन्य भक्ति में लगना चाहिए। और गुरु को ही अपना आराध्यदेव तथा अपना प्राणधन स्वीकार करना चाहिए।
 
श्लोक 38:  यद्यपि भौतिक जगत का द्वैत अन्तत: विद्यमान नहीं रहता, किन्तु बद्धजीव अपनी बद्ध बुद्धि के प्रभाववश इसे असली अनुभव करता है। कृष्ण से पृथक् जगत के काल्पनिक अनुभव की तुलना स्वप्न देखने तथा इच्छा करने से की जा सकती है। जब बद्धजीव रात में इच्छित या भयावनी वस्तु का सपना देखता है अथवा जब वह जो कुछ चाहता है या जिससे दूर रहना चाहता है उनका दिवास्वप्न देखता है, तो वह ऐसी वास्तविकता को जन्म देता है, जिसका अस्तित्व उसकी कल्पना से परे नहीं होता। मन की प्रवृत्ति इन्द्रियतृप्ति पर आधारित विविध कार्यों को स्वीकार करने तथा उन्हें बहिष्कृत करने की होती है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को मन पर नियंत्रण रखना चाहिए और वस्तुओं को कृष्ण से पृथक् देखने के भ्रम से इसे अलग रखना चाहिए। जब मन इस तरह वश में हो जायेगा, तो उसे वास्तविक निर्भीकता का अनुभव होगा।
 
श्लोक 39:  जिस बुद्धिमान व्यक्ति ने अपने मन को वश में कर लिया है और भय पर विजय प्राप्त कर ली है, उसे पत्नी, परिवार, राष्ट्र जैसे भौतिक वस्तुओं के प्रति सारी आसक्ति को त्याग देना चाहिए और निर्द्वन्द्व होकर चक्रपाणि भगवान् के पवित्र नामों का श्रवण और कीर्तन करते हुए मुक्त भाव से विचरण करना चाहिए। कृष्ण के पवित्र नाम सर्वमंगलकारी हैं, क्योंकि वे उनके दिव्य जन्म तथा बद्धजीवों के मोक्ष के लिए इस जगत में किये जाने वाले उनके कार्यों का वर्णन करने वाले हैं। इस तरह भगवान् के पवित्र नामों का विश्व-भर में गायन होता है।
 
श्लोक 40:  भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करने से मनुष्य भगवत्प्रेम की अवस्था को प्राप्त करता है। तब भक्त भगवान् के नित्य दास रूपी व्रत में स्थिर हो जाता है और क्रमश: भगवान् के किसी एक नाम तथा रूप के प्रति अत्यधिक अनुरक्त हो उठता है। जब उसका हृदय भावमय प्रेम से द्रवित होता है, तो वह जोर-जोर से हँसता या रोता है अथवा चिल्लाता है। कभी कभी वह उन्मत्त की तरह गाता और नाचता है, क्योंकि वह जन-मत के प्रति उदासीन रहता है।
 
श्लोक 41:  भक्त को चाहिए कि किसी भी वस्तु को भगवान् कृष्ण से पृथक् नहीं देखे। शून्य, अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, सूर्य तथा अन्य नक्षत्र, सारे जीव, दिशाएँ, वृक्ष तथा अन्य पौधे, नदियाँ तथा समुद्र इनमें से भक्त को जिस किसी का भी अनुभव हो, उसे वह कृष्ण का अंश माने। इस प्रकार सृष्टि के भीतर विद्यमान हर वस्तु को भगवान् हरि के शरीर के रूप में देखते हुए भक्त को चाहिए कि भगवान् के शरीर के सम्पूर्ण विस्तार के प्रति नमस्कार करे।
 
श्लोक 42:  जिस व्यक्ति ने भगवान् की शरण ग्रहण कर ली है, उसके लिए भक्ति, भगवान् का प्रत्यक्ष अनुभव तथा अन्य वस्तुओं से विरक्ति—ये तीनों एक साथ वैसे ही घटित होते हैं, जिस तरह भोजन करने वाले व्यक्ति के लिए प्रत्येक कौर में आनन्द, पोषण तथा भूख से छुटकारा—ये सभी एकसाथ और अधिकाधिक होते जाते हैं।
 
श्लोक 43:  हे राजन्, जो भक्त अच्युत भगवान् के चरणकमलों की पूजा सतत प्रयत्नशील रहकर करता है, वह अचल भक्ति, विरक्ति तथा भगवान् का अनुभवगम्य ज्ञान प्राप्त करता है। इस प्रकार सफल भगवद्भक्त को परम आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त होती है।
 
श्लोक 44:  महाराज निमि ने कहा : अब कृपया मुझे भगवद्भक्तों के विषय में विस्तार से बतलायें। वे कौन से सहज लक्षण हैं, जिनके द्वारा मैं अत्यन्त बढ़े-चढ़े, मध्यम स्तर के तथा नवदीक्षित भक्तों में अन्तर कर सकूँ? वैष्णव के लाक्षणिक धार्मिक कर्तव्य क्या हैं? और वह कैसे बोलता है? आप विशेष रूप से उन लक्षणों तथा गुणों का वर्णन करें, जिनसे वैष्णवजन भगवान् के प्रिय बनते हैं।
 
श्लोक 45:  श्री हविर् ने कहा : सर्वाधिक उत्कृष्ट भक्त हर वस्तु के भीतर समस्त आत्माओं के आत्मा भगवान् कृष्ण को देखता है। फलस्वरूप वह हर वस्तु को भगवान् से सम्बन्धित देखता है और यह समझता है कि प्रत्येक विद्यमान वस्तु भगवान् के भीतर नित्य स्थित है।
 
श्लोक 46:  द्वितीय कोटि का भक्त, जो मध्यम अधिकारी कहलाता है, भगवान् को अपना प्रेम अर्पित करता है, वह भगवान् के समस्त भक्तों का निष्ठावान मित्र होता है, वह अज्ञानी व्यक्तियों पर दया करता है जो अबोध है और उनकी उपेक्षा करता है, जो भगवान् से द्वेष रखते हैं।
 
श्लोक 47:  जो भक्त मन्दिर में अर्चाविग्रह की श्रद्धापूर्वक पूजा में लगा रहता है, किन्तु अन्य भक्तों के प्रति या सामान्य जनता के प्रति उचित रीति का आचरण नहीं करता, वह प्राकृत भक्त अर्थात् भौतिकतावादी भक्त कहलाता है और निम्नतम पद पर स्थित माना जाता है।
 
श्लोक 48:  इन्द्रिय-विषयों में लगे रहकर भी, जो इस सम्पूर्ण जगत को भगवान् विष्णु की शक्ति के रूप में देखता है, वह न तो विकर्षित होता है, न हर्षित। वह निस्सन्देह, भक्तों में सबसे महान् होता है।
 
श्लोक 49:  इस भौतिक जगत में मनुष्य का भौतिक शरीर सदैव जन्म तथा मृत्यु के अधीन रहता है। इसी तरह प्राण को भूख तथा प्यास सताते हैं, मन सदैव चिन्तित रहता है, बुद्धि उसके लिए लालायित रहती है, जिसे प्राप्त नहीं किया जा सकता और ये सारी इन्द्रियाँ भौतिक प्रकृति से निरन्तर संघर्ष करते रहने से अन्तत: थक जाती हैं। जो व्यक्ति भौतिक जगत के अपरिहार्य दुखों से मोहग्रस्त नहीं होता और भगवान् के चरणकमलों के स्मरण मात्र से उन सबसे अलग रहता है, उसे ही भागवत-प्रधान अर्थात् भगवान् का अग्रणी भक्त कहा जाता है।
 
श्लोक 50:  जिसने एकमात्र भगवान् वासुदेव की शरण ले रखी है, वह उन सकाम कर्मों से मुक्त हो जाता है, जो भौतिक काम-वासना पर आधारित हैं। वस्तुत: जिसने भगवान् के चरणकमलों की शरण ले रखी है, वह भौतिक इन्द्रियतृप्ति को भोगने की इच्छा से भी मुक्त हो जाता है। उसके मन में यौन-जीवन, सामाजिक प्रतिष्ठा और धन का भोग करने की योजनाएँ उत्पन्न नहीं हो सकतीं। इस प्रकार वह भागवतोत्तम अर्थात् सर्वोच्च पद को प्राप्त भगवान् का शुद्ध भक्त माना जाता है।
 
श्लोक 51:  उच्च कुल में जन्म तथा तपोमय एवं पुण्यकर्मों का निष्पादन निश्चय ही किसी को अपने ऊपर गर्व जताने वाले हैं। इसी तरह, यदि समाज में किसी को प्रतिष्ठा मिलती है, क्योंकि उसके माता-पिता वर्णाश्रम की सामाजिक प्रणाली में अत्यधिक आदरित हैं, तो वह और भी ज्यादा पागल हो जाता है। किन्तु यदि इतने उत्तम भौतिक गुणों के उपरांत भी कोई व्यक्ति अपने भीतर तनिक भी गर्व का अनुभव नहीं करता, तो उसे भगवान् का सर्वाधिक प्रिय सेवक माना जाना चाहिए।
 
श्लोक 52:  जब भक्त उस स्वार्थमयी धारणा को त्याग देता है, जिससे मनुष्य सोचता है कि “यह मेरी सम्पत्ति है और वह पराई है” तथा जब वह अपने ही भौतिक शरीर से सम्बद्ध आनन्द अथवा अन्यों की असुविधाओं के प्रति उदासीनता से कोई वास्ता नहीं रखता, तो वह पूरी तरह शान्त तथा तुष्ट हो जाता है। वह अपने आपको उन जीवों में से एक मानता है, जो समान रूप से भगवान् के भिन्नांश हैं। ऐसा तुष्ट वैष्णव भक्ति के सर्वोच्च आदर्श पर स्थित माना जाता है।
 
श्लोक 53:  भगवान् के चरणकमलों की खोज ब्रह्मा तथा शिव जैसे बड़े बड़े देवताओं द्वारा भी की जाती है, जिन्होंने भगवान् को अपना प्राण तथा आत्मा स्वीकार कर रखा है। भगवान् का शुद्ध भक्त उन चरणकमलों को किसी भी अवस्था में नहीं भूलता। वह भगवान् के चरणकमलों की शरण एक क्षण के लिए भी नहीं—आधे क्षण के लिए भी नहीं—छोड़ पाता भले ही बदले में उसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का शासन तथा ऐश्वर्य-भोग का वर क्यों न मिले। भगवान् के ऐसे भक्त को वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ मानना चाहिए।
 
श्लोक 54:  जो लोग भगवान् की पूजा करते हैं, उनके हृदयों को भौतिक कष्ट रूपी आग भला किस तरह जलाती रह सकती है? भगवान् के चरणकमलों ने अनेक वीरतापूर्ण कार्य किये हैं और उनके पाँव की अँगुलियों के नाखून मूल्यवान मणियों सदृश लगते हैं। इन नाखूनों से निकलने वाला तेज चन्द्रमा की शीतल चाँदनी सदृश है, क्योंकि वह शुद्ध भक्त के हृदय के भीतर के कष्ट को उसी तरह दूर करता है, जिस तरह चन्द्रमा की शीतल चाँदनी सूर्य के प्रखर ताप से छुटकारा दिलाती है।
 
श्लोक 55:  भगवान् बद्धजीवों के प्रति इतने दयालु हैं कि यदि वे जीव अनजाने में भी उनका नाम लेकर पुकारते हैं, तो भगवान् उनके हृदयों में असंख्य पापों को नष्ट करने के लिए उद्यत रहते हैं। इसलिए जब उनके चरणों की शरण में आया हुआ भक्त प्रेमपूर्वक कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करता है, तो भगवान् ऐसे भक्त के हृदय को कभी भी नहीं छोड़ पाते। इस तरह जिसने भगवान् को अपने हृदय के भीतर बाँध रखा है, वह भागवत-प्रधान अर्थात् अत्यधिक उच्चस्थ भक्त कहलाता है।
 
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